blogid : 14295 postid : 1154643

पत्थर की इक नाव बनी थी और रेत की थी वह नदिया रामलुभाया जिसमें बैठे अपना चप्पू चला रहे थे

Posted On: 13 Apr, 2016 Others में

Achyutam keshvamहम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

achyutamkeshvam

104 Posts

250 Comments

अच्युतं केशवम की कविता
पत्थर की इक नाव बनी थी
और रेत की थी वह नदिया
रामलुभाया जिसमें बैठे
अपना चप्पू चला रहे थे

हमने देखीं रंगबिरंगी
कई मजारें देशभक्ति की
जिन्दा पीर भटकते जिनमें
अंट-शंट बलबला रहे थे.
पत्थर की इक नाव बनी थी
और रेत की थी वह नदिया
रामलुभाया जिसमें बैठे
अपना चप्पू चला रहे थे .

पूजा के दीपक की गर्मी
पत्थर को पिंघलाती होती!
जग कहता ठाकुर की आँखों
में आंसू छलछला रहे थे.
पत्थर की इक नाव बनी थी
और रेत की थी वह नदिया
रामलुभाया जिसमें बैठे
अपना चप्पू चला रहे थे .

दिल जिसके मानी दर्पण था
अब वह दर्पन चटक गया है
जिसमें तेरे -मेरे साझे
कुछ सपने कुलबुला रहे थे.
पत्थर की इक नाव बनी थी
और रेत की थी वह नदिया
रामलुभाया जिसमें बैठे
अपना चप्पू चला रहे थे .

अब हँस लें रोलें या गालें
ये इनपर निर्भर करता है
थी उड़ान की उमर ,परों को
खुद ये चकुले जला रहे थे .
पत्थर की इक नाव बनी थी
और रेत की थी वह नदिया
रामलुभाया जिसमें बैठे
अपना चप्पू चला रहे थे .

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग