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तंत्र का राज, गण गौण

Posted On: 27 Jan, 2016 Others में

रैन बसेराहक बात, बुलन्द आवाज

M. Afsar Khan

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आजाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना ने गणतंत्र की भावना को प्रबल बनाया। गणतंत्र की भावना ने मुल्क के आम नागरिक को बावकार जीने का हक दिया है। हमारा मुल्क संघीय ढाँचे का लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। इस लोकतंत्रात्मक गणराज्य की विशेषता चुनी हुई, संविधान के अंतर्गत शासन करने वाली उत्तरदायी सरकार से है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को मंजूरी मिलने के बाद मुल्क के आम नागरिकों को खुली हवा में जीने का हक हासिल हुआ। इसलिए हर साल 26 जनवरी को देश में गणतंत्र दिवस पूरी अकीदत और शान से मनाया जाता है। गणतंत्र दिवस हमारी शासन प्रणाली, हमारे संविधान का स्मरण करा देता है और नये संकल्पों की ओर उन्मुख होने को प्रवृत्त करता है। अगर देखा जाए तो आजादी के 68 साल से ज्यादा का अरसा गुजर जाने के बाद भी हम आज तक गणतंत्र की मूल भावना को समझ पाने में नाकाम रहे हैं! गणतंत्र का एक मतलब शासन या सरकार में जनता की हिस्सेदार से भी है। मुल्क में लोकतंत्र की स्थापना के बाद सत्ता में नागरिकों को भागीदारी तो मिली मगर आम आदमी को शासन में हिस्सेदारी मिली की नहीं ये कह पाना बेमानी साबित होगा। हमें तो स्वच्छ शासन चाहिए, मानव कल्याण चाहिए, समाज का विकास चाहिए एवं भेद-भाव रहित समाज चाहिए। अगर गणतंत्र में नागरिकों को कुछ अधिकार मिला है तो महज वोट देने का ना कि सत्त में पूर्ण हिस्सेदारी का, या यूं कह लें कि गांधी जी के पूर्ण स्वराज की स्थापना का सपना आजादी के 68 साल बाद भी किसी मृगमरिचीका से कम नहीं।
गणतंत्र ने भारतीय लोकतंत्र को हर पांच साल में चुनावी त्यौहार का सौगात तो दिया मगर इस त्यौहार में गण को जो हासिल होना चाहिए शायद उस पर आज भी तंत्र हाबी दिखता है। संसद हो या विधानसभायें वहां पहुंचने वाले सदस्यों को गण की आवाज बुलन्द करनी चाहिए मगर आज हालात ये हैं कि तंत्र की शोर में गण मौन नजर आता है। आखिर गण क्या करे पांच साल तक उसे जो मौन रहना पड़ता है? संसद या विधानसभाओं में इस बात पे तो चर्चा होती है कि फलां की सरकार में भुखमरी, मंगाई व बेरोजगारी है मगर इस बात पर ईमानदार चर्चा कभी नहीं होती कि इन समस्याओं का निस्तारण कैसे किया जाए। इसका एक खास वजह है कि सदन में जाने के बाद ये लोग गण से माननीय हो जाते हैं तथा इन्हें आराम तलब व ऐश्वर्य भरे जीवन की लत सी लग जाती है! माननीय बनने के बाद इनका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक हो जाता है कि किसी जुगत से अपना आगामी जिन्दगी को सुख-सुविधाओं के अम्बार से भर लिया जाए। यही भावना तंत्र को गण से अलग कर देता है तथा ऐसे में गण बदहाल जिन्दगी जीने को बाध्य होता है। स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु राजनैतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक आजादी का होना भी लाजमी है। आर्थिक आजादी का मूल मंत्र आर्थिक विकेन्द्रीकरण तथा आत्मनिर्भरता है। सरकारी आंकड़ेबाजी से हट कर देखें तो आज भी हमारे समाज में 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग मूलभूत जरूरतों से वंचित है। अर्थव्यवस्था का विशाल भण्डार चन्द लोगों के हाथों में है, जिसकी वजह से अनेक गम्भीर समस्याओं मसलन गरीबी, बेकारी, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति आदि बढ़ी है। इसलिए लोग गणतंत्र के जश्न से ज्यादा भूख के ताण्डव से जूझने में मशगूल हैं।

सियासत का हालिया चेहरा लोगों के जख्मों पर मरहम की जगह नमक लगाता दिख रहा है। आमजन के विकास के लिए बनने वाली सैकड़ों, अरबों करोडों की योजनाओं में भ्रष्टाचार का पलीता यही नुमाइंदे लगाते नजर आ रहे हैं! एक तरफ जहां लोग भूख की आग में जल रहे हैं तो दूसरी तरफ कमीशन की काली कमाई से इन राजनेताओं के आलीशान महल और कोठियां आबाद हैं! गरीबी, भुखमारी का नारा देकर ये जनता को साल दर साल ठगते आ रहे हैं मगर विकास के नाम पर ढाक के तीन पात के सिवा आज तक कुछ नहीं नजर आता। जिस मुल्क में नागरिकों की हिस्सेदार चुनाव में सिर्फ वोट डालने तक महदूद हो, वहां गणतंत्र के मायने व मतलब निकालना कितना अहम माना जाएगा? सफेदपोश राजनेताओं की राजसी ठाठ के बाद आज नौकरशाहों की हालत भी किसी रसूखदारों से कम नहीं। इनके दरबारों की चक्कर लगाकर देश का गण खुद को बौना समझने लगा है। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उन्ही की सुनी जाती है जो आम नहीं खास माने जाते हैं! आम को तो यहां से तसल्लीकुन बातों से टरका दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों की चक्कर लगाते-लगाते ये लोग घनचक्कर हो जाते हैं। इंसाफ के लिए सालों-साल दर-दर की ठोकरें खाकर गण मौन साधने पर मजबूर हो जाता है।
इस बात से कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता कि संविधान के निर्माताओं ने मुल्क के आम नागरिकों को ऐसा लोकतांत्रिक संविधान दिया है, जिसमें सभी सम्प्रदाय, धर्म व समुदाय के लोगों को भेद-भाव रहित बराबरी का हक मिला है। मगर संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से आम नागरिक आज भी महरूम नजर आता है जबकि सफेदपोश सियासतदां संविधान के लचीलेपन का लाभ लेकर बड़े से बड़े कारनामें अंजाम दे जाते हैं! शायद यही वजह है की लोकतंत्र में अपराधतंत्र का बोलबाला होता जा रहा है। ऐसे लोग ही जनतंत्र की पवित्र मन्दिर में जाकर गणतंत्र का मखौल उड़ाते नजर आते हैं। गणतंत्र की मूल भावना को सभी को समझना बेहद लाजमी है चाहे वो सियासतदां हों, नौकरशाह या आमजन। सर्वाजनिक स्थलों, सरकारी कार्यालयों या स्कूलों में तिरंगा फहराकर व बच्चों में मिठाईयां बांटकर तथा जय हिन्द का नारा लगाने भर से गणतंत्र का हक अदा नहीं हो सकता। ऐसा करके हम गणतंत्र दिवस तो मना सकते हैं मगर गण को तंत्र में शामिल किये बिना गणतंत्र का कोई मतलब नहीं निकलने वाला। गणतंत्र दिवस हमें संविधान की याद दिलाता और नये संकल्पों की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा देता है। स्वच्छ शासन, भेद-भाव रहित समाज एवं मानव कल्याण के लिए हमें तत्पर रहना होगा। हमें मुल्क की एकता और अखण्डा के लिए खुद का सर्वत्र कुर्बान करने के लिए सदैव तैयार रहना होगा। तभी जाकर हम गणतंत्र की मूल भावना का आदर कर सकेगे।

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