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सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देतीं.......(व्यंग)

Posted On: 5 May, 2012 Others में

Guru Jiहजारों मंजिलें होंगी, हजारों कारवां होंगे.... निगाहें हम को ढूंढेंगी, न जाने हम कहाँ होंगे.......

Ajay Kumar Dubey

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सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देतीं……. नहीं सो पा रहे हैं…रात छत पर तारों को टुकुर-टुकुर निहारते ही बीत जा रही है…. बहुत ही कष्ट है भईया….एक तो ये ससुरे मच्छर, ऊपर से यह चिल्ल- पों….. गर्मी अलग से…. रातों की नींद ही उड़ गयी है भाई….हम तो सोच-सोच के हलकान हुए जा रहे हैं कि अब का होगा….यह जो मंज़र मेरी आँखों के सामने घूम रहा है , उसको देख कर ही दिमाग चकरा जा रहा है. गला सूखने लग रहा है…..अभी तक तो सब ठीक ही था, सब जी-खा रहे थे लेकिन अब कुछ-कुछ गड़बड़ लगने लगा है…..

पहले तो मान लीजिये अन्ना जी ही भ्रष्टाचार को उखाड़ने पर तुले थे, हम भी सोचा करते थे…. ,बुजुर्ग हैं….बुढौती का असर है . कुछ दिन बडबड़ायेंगे फिर शांत हो जायेंगे, जैसा की अक्सर होता है. वैसे भी आज-कल बुजुर्गों की बात पर कौन ध्यान देता है. इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया……हम तो हम, हमारे यहाँ बहुत बड़े-बड़े घाघ बैठे हैं, देश तो देश पूरी दुनिया पचा जाएँ …डकार तक न मारें ….. हम भी निश्चिन्त थे. कान में तेल डाले सुने जा रहे थे…..जैसे हमारे परधानमंत्री जी सुना करते हैं, या देखा करते हैं…..

हम भी सोचते थे कि जब तक इन लोगों का आशीर्वाद है तब तक तो हमारा क्या , हमारे किसी भी भाई-बंधू का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला…..जिंदगी ऐसे ही आराम से चलती रहेगी…सब मिल-बाँट के कमाते-खाते रहेंगे…आखिर हमने इनको गद्दी पर बिठाया काहें था…भईया कुछ तुम लूटो… कुछ हम लूटें… यह अलग बात है की तुम मोटा लूटते हो……नेता हो या व्यापारी चाहें हो सरकारी कर्मचारी सभी तो लूटने पर लगे हुए हैं…..हम ही हैं जो थोड़े से संतोष कर लेते हैं…. आखिर ज्ञानी-जन कहते हैं कि नहीं…. “संतोषम परम सुखं”…. जब आवे संतोष धन सब धन धूरि सामान…… हम भी निश्चिन्त थे ….. कुछ नहीं होने वाला, न भ्रष्टाचार ख़तम होगा और न ही हम जैसे भ्रष्टाचारी……

अन्ना जी तक तो ठीक था, अब रामदेव जी भी हनुमान जी की तरह लंका में कूद पड़े…..हम भ्रष्टाचार मिटा कर रहेंगे….कला धन वापस ला कर रहेंगे…. राम-राज्य लायेंगे….. और भी न जाने क्या-क्या करेंगे….. तब भी हम को कौनो चिंता नहीं हुयी…अन्ना जी हुंकार भरते हैं तो भरते रहें, स्वामी जी अलख जागते हैं तो जागते रहें …..हमारे आका भी अकल के कच्चे थोड़े है…. बड़ों-बड़ों को गच्चा दे जाएँ……

पहले तो दोनों जन अलग-अलग कूद-फांद मचाये थे….अब एक साथ आ गए हैं.. कह रहे है कि एक साथ आन्दोलन करेंगे…जन-जाग्रति लायेंगे….भ्रष्टाचार मिटा कर रहेंगे…… यहीं से हमारी चिंता बढ़ने लगी…. सोचने लगे का अब भ्रष्टाचार ख़तम हो जायेगा….?.ई भ्रष्टाचार ख़तम हो जायेगा तो हमारा का होगा…..?.हमारी तो छोडिये, उनका का होगा जो यह मानते हैं , रिश्वत लेना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है…हमारी खानदानी परंपरा है……हमारे लाखों दलाल बंधुओं का का होगा ……जो काम ले- दे कर घर बैठे ही करा देते थे…….आंदोलन के चलते रिश्वत प्रथा बंद हो गई, तो लोगों के काम कैसे होंगे……? बैंक..कचहरी…रेल….जैसे सभी कार्यालय के लोग यदि रिश्वत लेना बंद कर देंगे तो उनका जीना दुश्वार ही होगा, हमारा भी जीना हराम हो जायेगा…अब कौन बैंक में…रेल में …..लाइन लगाएगा….सारी की सारी आराम-तलबी ख़तम हो जाएगी…… अब कैसे होंगे सारे काम……..?
हम तो मान लीजिये अपनी ही दाल-रोटी की सोचते है. उनका का होगा , जिनको हमने अपना आका बना दिया है….इस देश की जिम्मेदारी सऊंप दी….. चलिए कुछ तो देश छोड़ कर भाग जायेंगे, बाकियों को तो जेल होने लगेगी…..देश की सारी जेलें हमारे इन्हीं आकाओं से भर जाएँगी…..
अब आप सब ही बताईये , हमारी चिंता जायज़ है कि नहीं… मेरे जैसे ठलुए लोग इतने बड़े परिवर्तन को कैसे बर्दास्त कर सकते हैं…हम अपनी परंपरा को कैसे तोड़ सकते हैं…..
बहुत दिन से यह चिंता सताए जा रही है, आप सब के सामने नहीं रख पा रहा था. अब रखी है. हमारी ई चिंता के निस्तारण का….समाधान का…. कौनो उपाय ….? हमारी ई चिंता को दूर करने का कष्ट करें, ताकि हम तो चैन से सो ही सकें, हमरे सगे-सम्बन्धी भी चैन से सो सकें………

एक निवेदन और भी….मैं ठहरा एक मूरख…., गंवार….मनई. सब कुछ सीखा लेकिन होशियारी नहीं सीख पाए….गली-गलौज, दंद-फंद से दूर ही रहना पसंद करते हैं….प्रेम की चाहत रखते हैं और प्रेम ही बांटते हैं…..जो भी बोलते हैं खरी बोलते है…. जिसको मेरी बात अच्छी लगे तो वाह-वाह….. नहीं तो पतली गली से निकल लेना…..चाहने वाले और भी हैं……मंजिलें और भी हैं…….

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