एक अंजाना हाथ का सहारा हम अपने पीछे अपनो को छोङ जाते हे। यादों को संजोकर एक नई दुनिया में आ जाते हे।अपरचित हे सब मन के विचारो को समझना दूर यहाँ तो सबसे मिलते हे पहली बार ,बडी कठिन हे डगर दुल्हन के लिए।दुल्हन की पीणा की वृथा तो कोई नहीं समझता सबकी नजर तो इस पर होती हे कि दुल्हन मायके से क्या क्या लाई है? वारातियो की खातिरदारी कैसी हुई ?बस इसी की चर्चा होती रहती हे अगर ससुराल के मुताबिक वरातियो के स्वागत में कमी रह जायें या दहेज की कमी रह जायें तो दुल्हन पर शब्दो का पृहार सुरू हो जाते हे।दुल्हन अपनी वृर्था किससे गये एक तो अजनवी लोगो के बीच अपनी अठखेली दुनियाँ छोङ कर आई हे सिर्फ एक व्यकित पर विश्वास करके यही हर मुश्किल पथ मेरा सहारा बनेगा,मेरा दुख को साझा करेगा।जिस तरह बच्चा वचपन में ऊगली थामे नन्हे पग बङाता था कही गिर न जाये ये एहसास पिता कराता था।आज अपने जीवन साथी से आस करती हे कि हमें हर मुश्किल से बाहर निकाल लेगे।अगर ये सब उसकी सोच से उलट हो तो दुल्हन का हाल चर्कव्यूह में फँसे अभिमन्यू के समान हे जिसका निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।मायके जाकर अपनी व्यर्था सुनाये तो समाज का डर हे उसकी और बहिनो से शादी कोण करेगा। समाज में इज्जत डूब जायेगी इसी के कारण बहुत शी नव विवाहित नारिया ससुराल की यातनाये सहती रहती जिसका परिणाम यह होता हे कि दुनिया के नजारे देखने से पहले आखे हमेशां हमेशा के लिए बं द हो जाति हे।कही दहेज की भेट चङ जाति हे कि इतना मजबूर किया जाता हे खुद इस दुनियाँ में सास लेना मुश्किल लगता हे और आत्महत्या कर लेती हे।दुल्हन ने जिसका हाथ थामकर नई दुनिया की सुरूआत की हे ।वो जीवन साथी हर घङी उसके साथ हे तो माता पिता को लगता हे कि बहु ने जाणे कैसा जादु किया हे कि मेरा बेटा मेरा नहि बल्कि बहु के बस में हे।ऐसा क्यो सोचते है?चाहे हम कितने आगे नीकळ जायें पर सोच तो तुच्छ हे।ये क्यो नहीं सोचते हे कि एक वेटी अपने माता पिता, भाई बन्धु,अपनो को छोङकर हाथ थामकर आई हे अपने नये परिवार को अपनाने तो उसका साथ देना चाहिए ना कि बात बात पर ताने देने चाहिए कि यही सिखाया हे तेरी मा ने।आखिर ऐसा क्यो होता है?बहु को बार बार माता पिता के ताने दिये जाते हे तो वो भी सास ससुर को अपने माता पिता दर्जा नहीं दे पाती।पीछे पीछे डुकरिया डोकर,हर किसी से बुराई करने लगती हे कि सास ससुर से इतना बैर हो जाता हे कि एक नजर देखना भी अच्छा नहीं लगता हे।हद तो ये हो जाति हे दोनो लोग एक दूसरे की मृत्यु की दुआ करते हे।ये कहते अक्सर सुना हे सबको मृत्यु आती हे इन डोकर डुकरिया की कब आयेगी।सास ससुर ये कहते हे मेरा ही नसीब खराब था सो ये पल्ले पङी हे मेरे वेटे के लिए एक से एक लख पति के घर रिस्ते आ रहे थे।मेरी ही तकदीर फूटी हे जो इससे पाला पला हे।ये कब मरे मेरा इससे पीछा छूटे ।आज भी यही सोच हे आखिर क्यो बहु को वेटी नहीं समझते?बहु भी सास ससुर को माता पिता नहीं मान पाती?और घर में लडाई का माहोल हर पल बना रहता हे।आज सोच बदलने की जरूरत हे तबी हम सुनहरे भविष्य की कल्पना को साकार होते देख सकते हे कि सास ससुर को माता पिता की भाति हर बात बताना ।उनके दर्द को समझना। बहु को वेटी की भाति स्नेह देना  ।एक साथ वेट कर किस्से सुनाना सुनना।पर्दा की दीवार को गिराना हर खुशी गम को मिल वाटना।क्या ऐसा होगा या हर अखबार मे झगडे के किस्से ही मिलेगे एक और वेटी दहेज की भेट चङी।सोचो सोच बदलो देश बदलेगा।