blogid : 5350 postid : 574

कुछ क्षणिकाएं!

Posted On: 15 Oct, 2012 Others में

badalte rishteJust another weblog

akraktale

64 Posts

3054 Comments

नादान

बचपन में पापा कहते थे

समझ न सका तब,था बचपन,

पापाजी ने जब समझाया

समझ गया है मेरा मन,

पैसे पेड़ों पर नहीं उगते हैं/

लोकतंत्र

लोकतंत्र,जनता के लिए

जनता के द्वारा जन शासन,

नाना से माता तक आया

अब बारी पोते कि आयी

बेटे का असमय हुआ निधन/

कालाधन

बार बार प्रश्न उठता था,

कैसे बनाया काला धन,

कई दिनों से सोच रहा था

क्या कोल खदानों में रक्खा था ?

जो करवा रहे अवैध खनन/

कलयुगी रावण

लूले लंगड़े बहुत परेशां है

हो गये उनके अंग गबन,

शामिल उनके दर्द हुआ तो,

देखा जुल्मी इक रावण,

दस शीश ग्रीवा पर रख घूम रहा था,

सर्वोच्च दिखी उसकी  गर्दन/

विडम्बना

समाचार पढ़ा अखबारों में,

होंगे करोड़पति लाखों कल को,

मै सोच रहा था मन ही मन,

लिख देता इक यह भी पंक्ति,

और करोड़ों होंगे निर्धन/

कांग्रेस

अंतिम साँसे बुढिया की,

छूटे प्राण तो करूँ दफ़न,

जीवन बिताया कैसों संग,

ग्रसित बीमारियों लगा ग्रहण,

हुस्न दीवाने फिर भी थामे,

बेशर्मी के ये सम्बन्ध,

मन बस इक अभिलाषा है,

छूटे साथ ओढा दूँ कफ़न/

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग