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कुलदीपक ही क्यों ...(कांटेस्ट)

Posted On: 28 Mar, 2017 Others में

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Alka

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जाने कब ये समाज लड़के लड़की के भेदभाव से ऊपर उठेगा |ये सच है की परिवर्तन की बयार चल पड़ी है |
बहुत कुछ सुधार हुआ है बहुत कुछ अभी बाकी है|कमोवेश चाहे उच्च शिक्षित हो या कम शिक्षित सभी को कुलदीपक चाहिए ही चाहिए |
पर अब महिलाएं भी कुछ हद तक तैयार कर रही हैं खुद को इस लड़ाई के लिए |

बात उस समय की है जब वह दोबारा माँ बनने वाली थी |उसकी पहली बेटी दो या ढाई वर्ष की थी |उस समय वह मेरे सामने वाले फ्लैट में रहती थी |एक मन मोहन मुस्कान अपने होंठों पर सदैव रखे वह पहली ही नजर में किसी को भी आकर्षित कर लेती थी |निशि नाम था उसका |मुझेहमेशा ही दिलके करीब लगती |उस समय उसकी उम्र यही कोई २६ साल की थी |उसके पति आई आई टी पास इंजिनियर थे और एक पब्लिक सेक्टर में काफीऊँचे पद पर थे |उसके स्वसुर भी रिटायर्ड प्रोफ़ेसर थे |सासु माँ भी ग्रैजुएट थी |

मुझे उनके परिवार को देखकर बहुत अच्छा लगता था |वो अक्सर खाली समय में मेरे पास आकर बैठ जाती थी |
एक दिन वो मेरे पास आकर बैठ गई |उस दिन उसकी आँखें वैसी चंचल न थी जैसी हमेशा हुआ करती थी |
मैंने सोचा शायद गर्भावस्था इसकी वजह है उससे पूछा क्या हुआ निशि तू ठीक है न ||डॉ. को बराबर दिखा रही है न |
उसने खाली खाली आँखों से मेरी तरफ देखा | और बोली |उसकी आवाज जैसे मीलों दूर से आ रही थी |

उसने कहा -दीदी ये लोग इतने पढ़े लिखे होकर भी ऐसे विचार रखते हैं मैंने सोचा भी नहीं था |पता है ये लोग मुझे कर रहे है
की मैं अल्ट्रासाउंड करा लूँ जिससे ये पता लग सके की मेरे गर्भ में बेटा है या बेटी |ये तो ठीक नहीं है न |मेरी आत्मा मुझे
इसकी स्वीकृति नहीं देती |पर मैं उनके विरुद्ध कैसे जाऊं|

मैं आश्चर्य चकित थी की इतना उच्चशिक्षित परिवार और ऐसी सोच |मैंने पूछा क्या तुम्हारे पति और स्वसुर भी ऐसा ही कह रहे है |उसने कहा -हाँ दी और डबडबाई आँखों से मेरी और देखने लगी |मैंने उसे हिम्मत रखने को कहा और समझाया की वो वही करे जो उसकी आत्मा गवारा करे |पर कहने और करने में बहुत फर्क होता है |कुछ देर बाद वो अपने घर चली गई |

मन कुछ भारी हो गया |मैं सोचने लगी जब ये उच्च शिक्षित लोग अयेसे वर्ताव कर सकते है तो फिर बिना पढ़े लिखे लोगों के बारे में क्या कहा जाये |मैंने उसकीसासु माँ से बात करनी चाही पर उन्होंने इसे अपना व्यक्तिगत मामला कहकर मुझे इसमें न पड़ने की सख्त सलाह दी |मैंने अपने पति से इस बारे में बात की |मैं बहुत व्यथित थी उन दिनों |

इस बीच मैं कुछ काम से दूसरे शहर अपनी माँ के पास चली गई |लौटकर जब उसे मिली तो वो खुश नजर आई |मैंने पूछा अल्ट्रा साउंड में बेटा निकला क्या जो इतनी खुश है |उसने बताया -नहीं दी है तो बेटी ही |और ये लोग तो एबॉर्शन कराने मुझे क्लीनिक भी ले गए थेपर ओ टी .में मैंने अपनी आत्मा की सुनी और डॉ. से साफ़ कह दिया मैं इस बच्चीकी हत्या नहीं होने दूंगी चाहे मुझे अपनी बेटियों को अकेले ही क्यों न पालना पड़े |मेरे लिए यही बेटे बेटी होंगे |

मैंने निशि को ख़ुशी से बाहों में भर लिया | जानती हूं हर महिला निशि नहीं हो सकती |पर निशि जैसी हर महिला की हिम्मत के साथ उसके परिवार की सोच में बदलाव जरुरी हैऔर यही वक्त की मांग है |

अलका ..

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