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ये आँखें ....

Posted On: 7 Feb, 2016 Others में

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Alka

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ये आँखें ,
बहुत कुछ कहती अनकहा
बींध जाती हैं कही आत्मा मन को ..

कहीं कुछ चुभ जाता है अंतस में
सोचता है ये विवश मन
क्या यही ईश्वर नियति है ,

कहीं पर ढेरों है कपडे .
और शय्या ,और भोजन,
और अनेकों स्वर्ग से सुख

कहीं पर तन पर न कपङे
जमीं शय्या और न भोजन
है अगर तो माँ का साया साथ इनके

ये आँखें ,
कहती है शायद
हम उसी ईश्वर की संताने है लेकिन ,
भेद कितना मेरे और औरों के जीवन में है देखो

मेरी आँखे
देखती है स्वप्न एक फिर ,
भरे इन आँखों में कोई नया सपना ,
हाथ एक एक मिल के हम आगे बढ़ाएं ,
करें फिर साकार इन आँखों का सपना

करें फिर साकार इन आँखों का सपना .

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