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चिंता डायन खाय जात है..........!!

Posted On: 7 Jan, 2011 Others में

sahity kritiman ke udgaaron ki abhivyakti

alkargupta1

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31 दिसंबर की रात्रि के प्रथम प्रहर से ही वर्ष २०११ दस्तक दे रहा था और हम सभी को आगाह कर रहा था कि अब समय आ चुका है ….2010 को अलविदा कहें तथा उसके आगाज़ की तैयारी में पलक पाँवड़े बिछाए रहें……. !
अब समूचे संसार ने उसे विदा कर दिया है और १ जनवरी के उगते हुए सूरज की अरुणिमा युक्त किरणों के साथ २०११ में पूर्णरूपेण प्रवेश कर चुके हैं ! प्रथम भोर तो रसानंद की तरंगों से तरंगित थी …..आगामी सुबहों का कुछ नहीं पता कैसी होंगी …..कैसा होगा यह २०११ …..क्या कुछ नया होगा …..या फिर कुछ और …..! परिवार…. समाज…..राष्ट्र……सभी के लिए अच्छा ही होगा…..या फिर बहुत अच्छा ……! हर्ष विषाद मिश्रित चिंता तो शायद हम सभी के ज़हन में हो रही होगी …… पर एक भय भी समाया हुआ है कि गत वर्ष तो महँगाई डायन खा गयी……….और अभी भी हम सभी के पीछे साये की तरह चक्कर काट रही है……. ! कहीं इस वर्ष चिंता डायन ना खा जाए………. | इसका शिकार होने से पहले ही कुछ करते हैं….. हम सब चिंता ही क्यों करें इस चिंता को छोड़ कुछ अच्छा करने की चेष्टाएँ ही क्यों न की जाएँ ,,,! जिसका फल मीठा हो और उस चिंता मुक्ति फल के रसानंद का हर कोई पान करे…….! भला हम सब चिंता के पात्र क्यों बनते हैं ? क्या है यह चिंता ? आइये थोड़ा बहुत जानने का प्रयत्न करते हैं और उससे मुक्त होने के उपाय भी खोजने की कुछ चेष्टा करते हैं |
चिंता मन की एक सूक्ष्म वृत्ति , दृष्टिकोण या स्वभाव ही है | चिंता करने से मनुष्य की स्मृति दुर्बल हो जाती है उसका विवेक धीमा पड़ जाता है व निर्णय शक्ति भी ठीक तरह से काम नहीं कर पाती | उसके कार्य में तन्मयता का अभाव हो जाता है और विपरीत परिणाम हो जाते हैं |
आज हर व्यक्ति चिंताओं के सागर में गोते लगा रहा है| कोई गोते लगाकर ऊपर आ जाता है और कोई गोते ही गोते लगाता रहता है ऊपर नहीं आ पाता और अन्दर ही अन्दर कहीं विलीन हो जाता है……..|
विद्यार्थी को अपने परीक्षा परिणाम की चिंता रहती है,तो माता -पिता को संतान के भविष्य की, निर्धनों को रोटी कमाने की चिंता है तो धनवानों को चिंता है कि वे अपना धन सही जगह इन्वेस्ट करें अथवा कि उनका काला धन पकड़ा न जाए | हमारे राजनीतिज्ञों को चिंता है कि वे किसी प्रकार शासन सत्ता की बागडोर अपने ही हाथों में लें |इस जागरण मंच पर भी अनेकों चिंताएं पायी गयी हैं अच्छा लिखने की चिंता , लेख के फीचर्ड होने की चिंता , अधिक टिप्पणी मिलने की चिंता तो शतक बनाने की चिंता  ( अपने सुधी पाठकों व लेखकों से मेरा नम्र निवेदन है कि इस प्रसंग को कोई भी व्यक्तिगत रूप से ना लें चूंकि हर क्षेत्र में चिंताएं पायी जाती हैं और हम सब इस मंच से सम्बन्ध रखते हैं इसलिए इसका थोड़ा सा ज़िक्र करना मैंने उचित समझा ) इस तरह यह चिंता आज सर्वत्र ही व्यापक रूप से व्याप्त है | प्रश्न उठता है कि इन चिंताओं की जंजीरों से कैसे मुक्ति मिले ?
यदि हम गंभीरता से मनन करें तो इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि मनुष्य चिंता तब करता है जब वह संदिग्ध मनः स्थिति में होता है या किसी न किसी प्रकार के अहित अथवा कुछ भी अनिष्ट होने की आशंका होती है | जैसे विद्यार्थी सोचता है कि अगर उसका परीक्षा परिणाम अच्छा नहीं हुआ तो बड़ा ही अहित हो जाएगा और एक बेरोजगार व्यक्ति यही सोच -सोच कर दुखी होता है कि अगर उसे शीघ्र ही कोई रोज़गार न मिला तो बड़ा अनिष्ट हो जाएगा…….एक निर्धन यह सोचता है कि आज उसने जितना पैसा कमाया उतने पैसे से वह अपने परिवार की दो जून की रोटी भी जुटा पायेगा या नहीं इसी तरह की न जाने कितनी और चिंताओं से नकारात्मक और असंदिग्ध मिश्रित विचार तरंगें उत्पन्न होती हैं तथा वातावरण और मनुष्य के मन को विकृत कर प्रायः वही परिणाम उत्पन्न कर देतीं हैं जो कि चिंतित मनुष्य शुभ या हितकर नहीं मानता | अतः हमें चाहिए कि कभी भी अशुभ या अनिष्ट की चिंता न करें……..बल्कि अपना तथा दूसरों का सदैव शुभ चिन्तक ही बनें रहें क्योंकि शुभ सोचने या चाहने से शुभ ही परिणाम होता है ……..|
चिंता तो ‘चिता’ सदृश होती है….. | मृतक की देह को जब अग्नि दी जाती है तब उसे दाह का अनुभव ही नहीं होता क्योंकि तब वह देह चेतना शून्य होती है लेकिन जीवित मनुष्य की देह को चिंता की दाह का अनुभव अवश्य होता है , इसलिए हम सभी को मानसिक मृत्यु रूपी चिंता से तो बच कर ही रहना चाहिए |
यहाँ कबीर दास जी का यह दोहा प्रासंगिक लगता है …….
चिंता ऐसी डाकिनी काट कलेजा खाय |
वैद बिचारा क्या करे कहाँ तक दवा लगाय ||
इस चिंता की बीमारी एक बार अगर लग गयी तो वह व्यक्ति को अन्दर तक बिलकुल खोखला कर देती है फिर तो डॉक्टर ,वैद्य ,हकीम दवा देते-देते इलाज करते-करते थक जायेंगे उनका मरीज़ तो ठीक होने से रहा फिर तो इन बेचारों के धैर्य का बाँध तो टूट ही जाएगा न………….इनके पास भी इस बीमारी की कोई दवा नहीं है |
एक चिंता दूसरी चिंता को जन्म देती है उसका आदर करती है…….. हमारे मस्तिष्क को अव्यवस्थित सा कर देती है मन की शान्ति को भी भंग करती है…………. |
हमें चाहिए कि अच्छा सोचने व अच्छा करने की चेष्टा तो करें किन्तु चिंता तो कदापि न करें….. हम सभी यही सोचते हैं ( किंचित विरले ही होंगे जो नहीं सोचते हैं ) कि पता नहीं क्या होगा ?…..और फिर इस चिंता से चिंतित होने लगते हैं|परन्तु इस ‘ डायन ‘ ( यह भी मनुष्य को दीमक की तरह अन्दर ही अन्दर खा जाती है ) से चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह तो निश्चित ही है कि होगा वही जो हमारे वर्तमान कर्मों तथा गत काल में किये गए कर्मों के फलस्वरूप होना होगा|
तब फिर जो दृश्य सामने आया ही नहीं तो फिर उसकी चिंता ही क्यों की जाए……….! समझना चाहिए कि यह संसार एक नाट्यशाला है जो कुछ यहाँ हो रहा है उसे हम एक दृश्य की तरह देख रहे हैं यह दृश्य समाप्त होने के बाद भविष्य रूपी परदे पर जो दृश्य आयेगा उसे भी देख लेंगे उसकी अभी से चिंता क्यों करें ……..जितना हो सके उतना दूर ही रहें इस चिंता डायन से ……….अन्यथा तो राम भरोसे ……सबसे अच्छा यही होगा कि हम अपने वर्तमान को ही सवाँरे वर्तमान के साथ साथ भविष्य भी सुधर जाएगा अन्यथा भविष्य की चिंता से वर्तमान भी अपना सुनहरा अवसर खो देगा…………! तो आइये २०११ में वर्ष भर चिंता मुक्ति के फल का रसास्वादन करते रहें !!

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