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`` प्रेम बहती हुई नदी की धार है! --- valentine contest ''

Posted On: 4 Feb, 2011 Others में

sahity kritiman ke udgaaron ki abhivyakti

alkargupta1

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जागरण मंच पर १ फरवरी से सर्वत्र प्यार की वर्षा शुरू हो गयी है ! और अब थमने का नाम ही नहीं ले रही है…….और थमे भी क्यों ? क्योंकि इसकी रिमझिम रिमझिम करती ये फुहारें देश विदेश के सुदूर कोनों कोनों तक जो पहुँच चकी हैं और कोई भी अपने को इन फुहारों से बचा नहीं पाया…….! हर किसी को अपनी आर्द्रता से सिक्त कर भाव विभोर कर दिया है…..! इसीलिये तो ये नहीं थम रहीं हैं और थमना भी नहीं चाहिए…….! प्रेम-वर्षा संबंधी विभागाधिकारियों ( जा. जं.) द्वारा मिली सूचनानुसार १४ फरवरी को ये फुहारें अपना अंतिम रूप ले लेंगी……..! और हर किसी के अंतर में अपनी अमिट छाप छोड़ कर मानव मन को आह्लादित करेंगी……! इन फुहारों ने तो मुझे भी नहीं छोड़ा और बहुत ही सुन्दर से इस ढाई आखर ‘ प्रेम ‘ पर अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लोभ को संवरण न कर सकी और लेखनी भी उद्यत हो गयी अपने मनोभावों को मंच पर सभी के साथ साझा करने के लिए……….!

यह छोटा सा ढाई अक्षर वाला ‘ प्रेम ‘ शब्द इतना गूढ़ है कि इसकी गूढ़ता को समझना थोड़ा बहुत कुछ मुश्किल सा ही है अन्यथा तो इन ईर्ष्या, द्वेष ,बैर जैसे आदि भावों की उत्पत्ति ही न होती……| इस संसार में प्यार की भावना हर प्राणी जगत में सर्वत्र व्याप्त है | प्रेम की इस सर्व व्यापी भावना से साधारण मानव तो क्या राजे -महाराजे और ऋषि मुनि तक स्वयं को असंपृक्त नहीं कर सके…….! कृष्ण-राधा , विश्वामित्र- मेनका ,दुष्यंत -शकुन्तला आदि के प्रेम-प्रसंग सर्वविदित ही है यहाँ तक कि इस दुर्दमनीय भावना से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के महान जननायक भी अछूते नहीं रहे | नेपोलियन -जेसेफीन , आइन्स्टाइन-मिलेवा आदि न जाने कितने प्रेम प्रसंग……! इन प्रेम आख्यानों से पूरा साहित्य भरा पडा है | अधिकांशतः लोक कथाओं का मूल आधार ही स्त्री – पुरुष प्रेम प्रसंग ही होते हैं……..और ये इतने चर्चित हैं कि इनकी गूँज आज भी जीवित है……..! इनके प्रेम-प्रसंग वासना मुक्त पवित्र और अनन्य प्रेम के ज्वलंत उदाहरण हैं…….लैला-मजनूं ( वर्त्तमान समय के आधुनिक लैला मजनूँ नहीं ) शीरीं-फरहाद, यूसुफ़ और जुलेखा आदि……..!

अगर हम विचार करें तो आज भी प्रेम का वही स्वरूप है उसमें गरिमा है ,पवित्रता है और वह वासनामुक्त भी है |

प्रेम शब्द बड़ा ही कोमल मधुर व रोमांच भरा है | इसका कोई भी शरीर , अवयव या आकार नहीं होता है लेकिन साहित्य-शास्त्र के आचार्यों ने ऐसा माना है कि इसका केवल एक रंग —‘ लाल ‘ ही होता है ! क्या रक्त जैसा लाल ? अरे , आप सब डरें नहीं यह रंग रक्त जैसा लाल नहीं बल्कि प्रातः काल सूर्योदय से पहले की अरुणिमा जैसा उजास ! पवित्र और मधुर भावना जगाने वाला भाव ! यह रंग उस समय स्पष्ट देखा जा सकता है प्रेमीजनों ( ये प्रेमी जन कोई भी हो सकते हैं…..माता-पिता, भाई-बहन, दो बहन ,दो भाई ,लड़का-लड़की, युवक-युवती या पति-पत्नी या अन्य कोई प्राणी जीव ) के चेहरों पर जब वे एक दूसरे के सामने आते हैं या उनके सामने उन्हीं के प्रेम की चर्चा की जाती है ! वैसे जो भी हो यह प्रेम भाव हृदय का सर्वाधिक सुन्दर ,अति कोमल व मधुरतम भाव माना जाता है ! और इस प्रेम भाव के साथ जब श्रद्धा का भाव भी जुड़ जाता है तब एक नई भावोत्पत्ति हो जाती है जिसे भक्ति-भाव कहा जाता है और शायद इसीलिये प्रेम को पूजा माना जाता है………! प्रेम की राह बड़ी ही कठिन और निराली है………! इसमें अहंकार ,लोभ ,व स्वार्थ को कोई स्थान नहीं है त्याग , समर्पण की भावना का ही समावेश है…….वही प्रेम सच्चा ,उच्च और महान है……. !

प्रेम का केंद्र जड़ चेतन कोई भी प्राणी या पदार्थ बन सकता है इसका क्षेत्र बड़ा ही विस्तृत है इसलिए इसे व्यापक तत्त्व के रूप में ही माना जाता है ! प्रेम के संसार मे अपने-पराये का, उंच-नीच का भेद बिलकुल ही नहीं रहता | प्रेम की खातिर लोगों को तप व त्याग करते तो देखा ही जाता है यहाँ तक कि प्राणों का बलिदान भी करते हुए देखा जा सकता ……! यह एक ऐसी अनोखी राह है जिस पर चलकर ‘ जियो ओर जीने दो ‘ जैसी मानवीय भावना जन्म लेती है और इसी दृष्टि से प्रेम गर्व से जीना मरना सिखाता है हर विपत्ति को सहन करने की शक्ति देता है…….|

प्रेम एक नशा भी है और चूंकि नशा आदमी को उन्मत्त और अँधा भी बना देता है शायद इसी कारण प्रेम को अंधा भी कहा जाता है अर्थात आँखें बंद करके , उन्मत्तता के साथ मग्न होकर प्रेम पंथ पर बढ़ जाने वाला व्यक्ति अतः यह राह और इसके राही दोनों ही बड़े ही निराले कहे गए हैं | आज भी न जाने कितने ही लोग इस राह पर चलने का दम भरते हैं , परन्तु वासना और स्वार्थों की बाहरी फिसलन पर ही फिसल कर रह जाया करते हैं………! इस निराले पंथ पर तो चलने के लिए सम्पूर्ण समर्पण त्याग और बलिदान का उत्साही भाव कि जो सब कुछ भुला दे…….! याद रहने दे केवल प्रेम का रूप और इसका नाम……! बस और कुछ भी नहीं…….!

प्रेम एक अद्वितीय जीवन संगीत है जिसमें मधुर स्वर लहरियां हैं और जब यह किसी के भी जीवन में संगी-साथी के रूप में प्रवेश करता है तो वहाँ जीवन संगीत समाप्त हो जाता है और बच जाते हैं टूटे-फूटे अवयवों के रूप में प्रेम प्रकरण जो अतीत के पृष्ठों में अंकित होकर वर्तमान समय में साध्य और हृदय तंत्रियों से से जुड़े तारों की गाँठ को तोड़ कर दो प्रेमियों को इस संसार के भ्रमजाल में छोड़ जाते हैं…………! अपवादों की भी कमी नहीं है ये हर क्षेत्र में होते हैं……. !

ये प्रेम तो बहती हुई ऐसी एक नदी है जिसके बहाव में तैरने वाले के हाथ में मोती, सीप, शंख, कंकड़, अनमोल रत्न आदि न जाने क्या-क्या चीज़ें आती हैं………! इस नदी में तैरते-तैरते एक किनारे पर दो प्रेमी जीवों का मिलन हो जाता है और फिर प्रारम्भ हो जाता है जीवन का एक नया अध्याय…….!

कितनी भी पाबंदियां क्यों न हों , बाधाएं व रुकावटें भी क्यों न आयें लेकिन वे दो हृदयों के मिलन को कदापि नहीं रोक सकती हैं………! प्यार की जीत होती है……वह तो कभी हारता ही नहीं……..हार कर भी प्यार जीतता ही है………..! यह प्रेम शाश्वत है………..! प्रेम की इस नदी में डुबकी लगाने पर इसकी मिठास ,सुगंध और भीनी-भीनी महक सच में कैसी है क्या होती है वाकई बयां करने वाली नहीं होती……….!

परखिये आप सब भी मेरे इन विचारों को अपने अमोल स्नेह की कसौटी पर और मुझे भी अवगत कराइए………..!

धन्यवाद !

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