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सूखे पत्ते

Posted On: 25 Feb, 2011 Others में

sahity kritiman ke udgaaron ki abhivyakti

alkargupta1

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सूर्योदय से पहले की अरुणिमा सुरमई चादर पर अपने पैर पसार चुकी थी | नई सुबह के प्रकाश की रश्मियाँ भी गवाक्षों से झांकने की तैयारियां कर रहीं थीं| कुछ अलसाई व नेत्र निमीलन सी मैंने गुनगुनी धूप का आनंद लेने के लिए कमरे के दरवाज़े और सभी खिड़कियाँ खोल दीं और क्षण भर में किरणों का स्वर्णिम उजास सर्वत्र विकीर्ण हो गया !

हर दिन की तरह आज भी पीले से पड़े हुए कुछ सूखे पत्ते तोड़ने की खड़….खड़…टक…टक की ध्वनि मेरे कानों से टकराई | घर के सामने वाले बगीचे में एक बहुत बड़ा कोई जंगली वृक्ष था| हर रोज़ वह उस पेड़ के पास आती थीं और एक-एक करके पीले से पड़े हुए सूखे पत्तों को तोड़ते हुए उन्हें मैं देखती थी | आज फिर उन्होंने वही पीले पड़े हुए अर्ध शुष्क पत्ते तोड़े और उन पर पडी धूल को अपनी साड़ी से पोंछ-पोंछ कर अच्छी तरह से पकड कर अपनी मुट्ठी में दबाये हुए धीरे-धीरे चलकर पार्क में पडी हुई एक बेंच पर बैठ गईं और वहां आते-जाते लोगों को देखने लगी | चूंकि यही समय इसी पार्क में मेरे प्रातः भ्रमण का भी होता था इसलिए मैं भी इसी समय अपने घर से बाहर निकल पडी टहलने के लिए | आज कुछ ज़्यादा ही चक्कर ले लिए थे इसलिए थकान सी महसूस होने लगी तो सोचा कि दस मिनट नरम-नरम घास पर धीरे-धीरे चला जाए थकान दूर हो जायेगी | मैं धीरे-धीरे चलने लगी जैसे ही मैं उनकी बेंच के पास से गुज़रती और उनकी ओर नज़रें घुमाती ऐसा लगता था जैसे वो अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए हों ! मैं पल भर उनकी बेंच के पास ठिठकी उन्होंने मेरी ओर देखा………मैं उनके और करीब आ गयी……मुझे अपने पास आता देखकर थोड़ा मुस्कराई….बस हल्की सी मुस्कान……उस शुष्क चेहरे पर फीकी सी मुस्कान……उनकी सूनी आँखें शायद मुझे कुछ बताना चाह रही हों……!

`ट..ह..ल…..रही…… हो….’ कि..त..नी..देर तक और ..ट..ह..लो..गी….? ‘ बहुत ही धीमी और अस्फुट से शब्द सुनाई पड़े | प्रश्न भरी आँखों से उन्होने मेरी ओर देखा फिर कुछ रुक कर बोली-‘ कहाँ…..और….कितना…..!’ उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि लगा बहुत ही मुश्किल से बोल पा रही हों….!
`जी माँजी, बस थोड़ी देर और दो चक्कर लगा कर अभी आती हूँ |’ मैंने कहा और आगे बढ़ गयी !चलते-चलते अनेक प्रश्न भी मेरे ज़हन में उतरते जा रहे थे……आखिर ये मांजी इन सूखे हुए पत्तों को न जाने क्यों हर रोज़ तोड़ती हैं……?क्या करती होंगी…..?क्या वे अपने घर मैं अकेली ही रहती हैं……?इसी समय ही हर दिन वह क्यों आती हैं…….? क्या इन्हें ये पीले पड़े हुए सूखे पत्ते बहुत अच्छे लगते हैं…….?इन पत्तों की सुन्दरता तो अब जा चुकी है…..अब तो ये पीले पड़ कर सूखने के कगार पर आ चुके हैं ! हर कोई तो सुन्दर फूल तोड़ता है…..हरी-हरी पत्तियां तोड़ता है……! भला ये क्या करेंगी इन सूखे हुए पत्तों का……अब तो ये नैसर्गिक सौन्दर्य विहीन हो चुके हैं…….! ऐसे कितने ही प्रश्नों के भार तले मैं लदी जा रही थी…..साथ ही चलने के गति भी मंथर पड़ गयी…….! अकस्मात् ही पार्क में क्रिकेट खेल रहे बच्चों के शोर से मेरी तन्द्रा भंग हो गयी | देखा- वह अभी भी उसी बेंच पर बैठी हुई हैं…..मानो कहीं कुछ खो गया है उसे अपनी नज़रों से ढूँढ रही हो…….!मैं भी कुछ देर आराम करने के लिए उनके पास आकर बैठ गयी…..उनकी ओर देखा– वही भीनी सी मुस्कान…..शांत सौम्य चेहरा….वात्सल्यमयी आँखें….अद्भुत कांति से देदीप्यमान मुख……दुर्बल काया ने मेरा स्वागत किया हो……….!बहुत ही प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखा जैसे आशीर्वाद देना चाह रही हों…..! मेरे कपड़ों ( सलवार, कुरता व दुपट्टा ) को अपनी लम्बी उँगलियों से स्पर्श किया और बोलीं- `अच्छा है| ‘
दु
पट्टे को अपने हाथ में लेकर बहुत प्रसन्न हुईं…..`.तुम्हारी…. ड्रेस….. बहुत….. ही…. अच्छी…. है | ‘ रुक-रुक कर बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपना वाक्य पूरा किया |
`थैंक्स !’ मैंने कहा |
`आवश्यकता नहीं है यह सब कहने की| ‘ अपनी तर्जनी उंगली के संकेत द्वारा यही कहना चाह रही थी…… !
तत्काल ही उनके चेहरे के भाव पढ़ कर मैंने आसानी से यह अनुमान लगा लिया था कि उन्हें मेरी ड्रेस – सलवार , कुरता और दुपट्टा बहुत पसंद था साथ ही इस छोटे से शब्द `थैंक्स’ ने उन्हें बहुत ही आह्लादित कर दिया था|
तत्पश्चात अपनी साड़ी का स्पर्श किया और कहा – `कितनी अच्छी है ! ‘
`जी , बहुत अच्छी लग रही है| ‘ मैंने कहा
पल भर बाद मेरी मांग में पड़े सिन्दूर तथा माथे की बिंदी को तर्जनी उंगली द्वारा बड़े ही हौले से स्पर्श किया और धीरे धीरे बोलीं- ` बहुत सुन्दर हैं ये ! ‘ मानो वह अपनी अस्फुट मूक भाषा में भारतीय नारी के सौन्दर्य को बताना चाह रही हो……..! मेरा मन भी ये शब्द सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ !
मैं भी उनके बारे मैं कुछ जानना चाह रही थी | “ आपका घर कहाँ है?” मैंने पूछा
“मेरा….कोई….घर …नहीं…. है!उन्होंने रुक-रुक कर उत्तर दिया |
“तो फिर आप कहाँ रहतीं हैं ?” पुनः मैंने पूछना चाहा हालांकि वो ज्यादा नहीं बोल पा रहीं थी……..बड़ी मुश्किल से ही उत्तर दे पा रहीं थी | मुंह से कुछ नहीं बोली अपने हाथ से सामने की ओर केवल संकेत करके यह बताना चाह रहीं थी — “वो सामने वाली बिल्डिंग में मैं रहती हूँ | ” क्षण भर बाद वे उठी….. और फिर बैठ गयी| मेरा हाथ अपने हाथ में बड़े प्यार से लिया…….शायद उठने के लिए मेरे हाथ का सहारा लेना चाह रही हों………धीरे से उनके हाथ को पकड़कर मैंने बेंच से उठाया……उठी और धीरे-धीरे सामने वाले बिल्डिंग की ओर चलने लगी…..एक नज़र से मेरी ओर देखा…..आगे की ओर सिर हिलाया….जैसे मुझे भी अपने साथ चलने का आग्रह कर रही थी……मैंने भी उनका दिल नहीं दुखाया और उनका हाथ पकड़े-पकड़े साथ-साथ चल दी !
थोड़ी दूर चले ही थे कि सामने ही एक महिला माँजी के बिलकुल करीब आती दिखाई दी…..अस्त-व्यस्त से बाल….सिर पर साड़ी का पल्लू…..सांवला रंग…..तीखे नयन-नख्श….साधारण सी साड़ी……सब कुल मिलाकर लग रहा था कि यह उनके घर काम करने वाली कोई बाई ही होगी……और अपने साथ उन्हें ले जाने के लिए आई हो…..! जैसे ही वह समीप आई कुछ रुकी उनका हाथ मुझसे छुडा कर अपने साथ धीरेधीरे ले जाने लगी……
“ क्या नाम है तुम्हारा ?” मैंने पूछा
“ चंद्रकली ” महिला बोली
“ इन्हें लेने आई हो? ” मैंने कहा
उस महिला ने तुरंत उत्तर दिया- “जी साब , क्योकि ये अपने आप चल नहीं पाती न इसलिए ” वे दोनों आगे की ओर बढ़ गयी और मैं थोड़ा पीछे ही रुक गयी…….जब उन्होने मुझे अपने साथ आते हुए न देखा तो बोलीं- “ आओ…. न….. मेरे……साथ ” जैसे ही चंद्रकली ने उनकी आवाज़ सुनी तो उसके चहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता की रेखाएं उभर आईं….कभी मेरे ओर देखती और कभी उन माँजी की ओर……चंद्रकली तुरंत बोली- “ मेम साब , माँजी केते सालन बाद आज बोली हैं हम तो इनकी बोली आज तक कबहुँ नाय सुनी ….सच्ची में हम तो आज बहुत ही खुस हैं….इनकी बोली सुनके हमें केतो नीक लागतु है बताय नहीं सकत हैं आपको …….! “ क्यों ऐसी क्या बात है ” कुछ और जानने की उत्सुकता हुई मुझ में…..
“मेम साब , जे माँजी तो कछु बोलती ही नाय थी अपने घर पे……बस हर बखत गुमसुम सी एक ही जगह पे बइठी रहत थी आज पहली बार हमने तो इनकी बोली सुनी…. आप न मेम साब , इनके साथ रोज ही बैइठा करो जे बहुत ही अची हैं………! “ “ये किसके पास रहती हैं ?” मैंने चंद्रकली से पूछा
“ अपनी बिटिया के पास रहती हैं |” उसने उत्तर दिया |तीनों ही साथ-साथ चलते जा रहे थे उनकी बिल्डिंग के समीप पहुँच चुके थे……..ये चंचल मन और बहुत कुछ जानने की इच्छा कर रहा था……!

मुस्काती आँखों से उन्होंने मेरी ओर देखा…….कह रहीं थी…..देखो, पांचवी मंजिल पर मेरा घर है….. लिफ्ट से तीनों पांचवी मंजिल पर पहुँच गए…..द्वार खुला और बाहर आ गए……वे मुझे अपने घर की ओर ले जा रहीं थीं……जैसे ही घर के दरवाज़े पर पहुंचे…..चंद्रकली ने कॉल बेल दबाई…..सुन्दर सी लड़की ने दरवाज़ा खोला………मुस्कराता चेहरा…..रंग गेंहुआ….छोटे-छोटे खुले हुए बाल….अपनी माँ जैसी शक्ल….सब कुल मिलाकर वह आकर्षक देह की स्वामिनी लग रही थी !
“आइये , आंटी ! ” उसने अन्दर बुलाया और अपने ड्राईंगरूम में ले गयी…..सामने के ही सोफे पर मैं बैठ गयी और उन वृद्धा ने अपने साथ लाये हुए उन पत्तों को एक कांच की ट्रे में बहुत संभाल कर रख दिए और खुद भी मेरे ही पास बैठ गयी……लड़की ने चंद्रकली को घर की साफ़-सफाई के साथ अन्य काम भी करने के लिए कहकर वहां से जाने को कहा…….!

ड्राईंग रूम की साज-सज्जा बहुत ही आकर्षक थी हर चीज़ बहुत ही करीने से रखी गयी थी……..मेरी नज़रें कुछ और ही ढूँढ रहीं थी…….. अकस्मात् ही मेरी दृष्टि सामने ही दीवार पर टंगी एक तस्वीर पर अटक गयी…. अनुमान लगाया हो ..न..हो ये तस्वीर इन्ही वृद्धा की ही होगी अपने पति के साथ…… जब मेरी नज़रें उस तस्वीर को देख रहीं थी……|

.“आंटी, मैं रुचिता हूँ….मेरे पति स्टेट बैंक में मैनेजर हैं…..मेरा तीन साल का एक बेटा है……और जो यह फोटो आप देख रहीं हैं न मेरी मम्मी की है…..ये अपने समय में बहुत ही सुन्दर थीं….आज भी ये बहुत अच्छी हैं….और इनका मन तो और भी सुन्दर है….. जब मैं कॉलेज जाती थी , मेरी मम्मी बहुत अच्छा स्वादिष्ट खाना पकाती थी…. तरह -तरह की डिश बनाना और खिलाना बहुत अच्छा लगता था मेरी सभी सहेलियां और सभी लोग इनके खाने की प्रशंसा करते थे……और मेरे पापा को तो और किसी के हाथ का खाना पसंद ही नहीं आता था…..सिलाई….कढाई..बुनाई भी करती थी…! मेरे पापा भी बहुत अच्छे हैं मुझे बहुत प्यार करते हैं….. वह यहाँ एक मल्टी नेशनल कंपनी में मैनेजिंग डाइरेक्टर थे……कंपनी ने उन्हें किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में चार वर्ष पूर्व छह महीने के लिए इंग्लैंड भेजा था…….वहां से वह हर सप्ताह मम्मी और मुझ से बात करते थे……एक बार बीच में केवल दस दिनों के लिए अवकाश पर आये थे वह……मेरे लिए बहुत सुन्दर ड्रेसेज और मम्मी के लिए भी मेकप का सामान और भी बहुत सारी चीज़ें लाये थे ……फिर अवकाश समाप्त होने के बाद वापस इंग्लैंड चले गए…..छह माह भी गुज़र गए प्रोजेक्ट की अवधि भी समाप्त हो गयी….पापा भी वापस नहीं आये…..और फोन भी आने बंद हो गए……मुझे मेल भी करना छोड़ दिया…….उनकी बहुत याद आती थी…… मेरी मम्मी बहुत ही परेशान होती थी…..और उनके सही सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी करती रहती थी…..” फिर अकस्मात् ही एक वर्ष बाद किसी विदेशी महिला के साथ घर आये …..उसकी पाश्चात्य वेश-भूषा….अंग्रेज़ी भाषा.थी….. वह महिला पापा के साथ हर जगह उनकी छाया बनकर रहती थी……..पापा अपने ही कार्यों में व्यस्त रहते थे….मम्मी ने हम दोनों को समझते देर न लगी……बहुत विरोध किया पर उन्होने हम लोगों की एक न सुनी…….मम्मी को बहुत अच्छा नहीं लगा था…….एक दिन मम्मी पापा में काफी कहा-सुनी हो गयी……..उसके बाद पापा उस विदेशी महिला के साथ घर छोड़कर इंग्लैंड लौट गये…… बस तभी से मम्मी ने सबसे बात करना छोड़ दिया…..हर समय ऐसे ही गम सुम सी बैठी रहती हैं……इन्हें कुछ भी काम करना अच्छा नहीं लगता…..थोड़ा सा खाना खाती हैं….न हंसती-बोलती हैं……बस बगीचे में घंटों बैठी रहती हैं…..पेड़ों से पीले पड़े सूखे-सूखे पत्ते तोड़कर लाती हैं और उन्हें बहुत ही संभाल कर रखती हैं…..न जाने क्यों ऐसा करती हैं कुछ भी मेरी समझ में नहीं आता….. आंटी…….!

रुचिता ,बिना रुके ही इतना सब कुछ बोल गयी और मैं मूक श्रोता बनी हुई थी…..वाचाल रुचिता ने मुझे बोलने का अवसर ही नहीं दिया .कभी उसकी मम्मी की ओर देखती तो कभी कमरे की दीवारों को ताकती…… इसी बीच उसका बेटा भी रोता हुआ आ गया…..शायद उसे भूख लग रही थी…..मैंने भी घड़ी देखी- `अरे , बहुत देर हो गयी…..अच्छा अब चलती हूँ….कहकर भारी मन से उठी माँजी को प्रणाम किया और कमरे से बाहर निकली तेज़ कदमों से अपने घर की ओर चलने लगी…………..!

वही पेड़ मेरे सामने था जिसके पीले व शुष्क पत्ते तोड़कर अपने हाथों में बहुत संभाल कर रखती थीं……….चलते-चलते अनेक उत्तरित व अनुत्तरित प्रश्नों के भँवर जाल में फंस गयी……………..हरे पत्तों को क्यों नहीं तोड़ती थी…….?पीले-से कुछ सूखे हुए पत्तों को ही क्यों तोड़ती थीं……? कहीं ऐसा तो नहीं…..एकदम सूख कर पृथ्वी पर न गिर जाएँ…….उन्हें वह गिरने न देना चाहती हों………. इन शुष्क पत्तों को वायु अपनी तीव्र गति से कहाँ उड़ाकर ले जाएगी नहीं पता………शायद इसलिए……… पास में ही बॉल खेल रहे छोटे बच्चों की बॉल से मेरा पैर टकराया……मैंने बॉल उठाई उन्हें दी और अपने घर आ गयी ……..उन्हीं सूखे पत्तों की टक….टक….खड़…खड़…..की आवाज़ कानों में मानो सदैव के लिए समा गयी हो………..!

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