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जरूरत है खुदा की हमें, काफि़र के कुफ्र की नहीं.....

Posted On: 6 Sep, 2016 Others में

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amarsin

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दिले नादां कहता है, कभी काफिर बनकर तो देख,
तुझे मजा न दिला दूं तो फिर कहना।
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बन बैठा काफिर शैतां के कहने पर जब-जब,
रोया ज़ार-ज़ार खूँ के आँसू दिल मेरा तब-तब।
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मिल न सका वो सूकूं दिल को कभी,
किया था वायदा जो देने का कुफ्र ने कभी।
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तोड़ देना वायदा तो फितरत है उसकी,
धोखे में रखकर मिलाना जरूरत है उसकी।
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न रहा हूं खुद सुकूं से कभी, न रहने दूंगा तुझको,
कहा कुफ्र ने अड़कर, यही चाहत है मेरी।
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जिन्दगी जो तेरी जन्नत न बना दी तो कहना,
आखि़रात में तुझे इज्जत न दिला दी तो कहना।
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दिले नादां कहता है, कभी काफिर बनकर तो देख,
तुझे मजा न दिला दूं तो फिर कहना।
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तेरे बहकावे अब हमें फिर गिरने न देंगे,
नज़र है खुदा पर, जिक्र से उसे फिरने न देंगे।
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जरूरत है खुदा की हमें, काफिर के कुफ्र की नहीं,
दिले नादां की अब सुनता कौन है…..

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