blogid : 15302 postid : 1340794

कोविड 19 : हम नहीं सुधरेंगे

Posted On: 29 Apr, 2020 Politics में

Voice of SoulJust another Jagranjunction Blogs weblog

amarsin

70 Posts

116 Comments

जिस प्रकार कोरोना वायरस ने पूरे विश्व की नाक में दम किया हुआ है। जहां एक ओर इस बीमारी के कारण करोड़ों लोग अपनी जान से हाथ धो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विश्व की आर्थिक स्थिति भी बद से बदतर होती जा रही है। जिसमें मुख्य रूप से मध्यम वर्गीय लोग पिस रहे हैं क्योंकि वो बेचारे तो त्रिशंकु की भांति बीच में लटके हैं, जिसे नीचे से ऊपर की ओर धकेला जा रहा है जिससे थोड़ा बहुत जान पड़ता है कि वो अमीर हैं, वहीं दूसरी ओर से ऊपर से लतियाये जाते हैं कि अभी तुम इस काबिल नहीं कि अमीरों की सोहबत कर सको। इनका दर्द तो किसी को नहीं दिखता और यह हैं भी इसी काबिल! आखिर क्यों न लतियाया जाये इनको?

 

 

 

महामारी और मंदी के इस दौर में भी गरीब और अमीर दोनों अपने-अपने काम में लगे हैं। वहीं यह मध्यम वर्गीय सबसे अधिक सोशल साईटस पर एक्टिव रहते है। जो कभी फेसबुक पर तो कभी टिकटाॅक पर तरह-तरह के कारनामें करते मिलते हैं। हद तो तब हो जाती है, जब यह इन सबसे बोर होकर बेखौफ अपनी साईकिल और मोटरसाईकिल निकाल शहर की सड़कों धूम मचाने निकल पड़ते हैं। जिन्हें थोड़ी ही देर में समझ पड़ता है कि यहां डाॅन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं बल्कि बहुत आसान है। जब अगले ही चैक पर पुलिस उन्हें धर पकड़ती है, फिर कभी यह मुर्गा बनते है तो कभी पुलिस द्वारा प्रदान की जाने वाली स्पेशल फ्री टैटू सर्विस लेकर घर पहुंचते हैं। इतना सब होने के बाद भी भी यह गरीब और अमीर का मिक्सचर गमीर फिर भी हार नहीं मानता। आखिर न सुधरने का मजा ही कुछ और है, जो भी सुधारने को आयेगा, उसे भी जब तक अपने जैसा न बना दें, तब तक चैन की सांस न लें। यही तो सबसे बड़ी खासियत है इस प्रजाति की।

 

 

अब बात करते हैं अपने मोहल्ले के नेता लंपट चाचा की। जो राजनीति के बहुत ही मंजे हुए खिलाड़ी हैं। कब, कहां और कैसे क्या दांव खेलना है, वह तो खूब जानते हैं। गरीबों और अमीरों से तो खूब पटती है अपने चाचा लंपट की लेकिन अपने गमीर तो इन्हें फूटी आंख नहीं सूहाते। बेशक वोट के टाईम थोड़ा बहुत इन्हें भाव देना पड़ता है लेकिन चचा को असल में चंदा देने वाले अमीर और झंडा लगाने वाले गरीब ही ज्यादा भाते हैं। बीच वाले तो बेचारे लंपट चाचा का चिकना चुपड़ा भाषण सुनकर ताली ही बजा सकते हैं। फिर वो मूंग और मसूर की दाल, जिनके पास न माल है और न ही वो टेढ़ी चाल जो चाचा लंपट को भाती है।

 

 

कोरोना की महामारी का इतना तो फायदा हुआ है कि गली में घूमने वाले मुस्टंडो का लड़कियों को छेड़ना कम हो गया है और शाम में गलियों में डोलने वाले शराबियों के दर्शन थोड़ा दुर्लभ हो गये लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। आखिर न सुधरने की कसम जो खा रखी है। जब घर में खाने को दाने नहीं, ऐसी स्थिति में भी पीने का शौंक रखने वाले ब्लैक में शराब गटक लेने में कोई गुरेज नहीं करते, खाना तो भाई साहब सरकार द्वारा चलाये लंगर में भी खाया जा सकता है। इनका तो कहना है कि नेताओं को इस समय में घर में खाली बैठे सस्ते राशन के साथ सस्ती शराब भी मुहैया करायी जानी चाहिए।

 

 

 

जनाब कोरोना के इस दौर में मोहल्ले से बाहर निकल कर जरा राजनीति की शाही गलियों की ओर नजर तो दौड़ाओ। आखिर वहां भी तो एक बढ़कर एक धुरंधर बैठे हैं। जो महामारी के इस माहौल में भी अपनी गिद्ध दृष्टि से यह भांपने में लगे हैं कि कैसे यहां पर भी अपनी दुकान को चमकाया जाये, नाम कमाया जाये और माल बनाया जाये। यह देश का बहुत बड़ा दुखांत है कि हमें ऐसे-ऐसे चंपक नेता मिले हैं जिनमें तरह-तरह की कलाएं मौजूद हैं। कोई लूटने में एक्सपर्ट है तो मनोरंजन कराने में, कोई बयानबाजी का खिलाड़ी है तो कोई जनता को मूर्खतापूर्ण बातों द्वारा भड़का लड़वाने में माहिर।

 

 

इन सबमें अपने चंपक नेताओं की भी कोई गलती नहीं। आखिर हम ही लोगों ने तो इनको तख्तोताज में बिठाया है। हम अक्सर इनके लच्छेदार वादों के झांसे में आने का बहाना बनाकर अपनी न सुधरने वाली आदत को कभी नहीं देखते, जब चंदा देने और झंडा लगाने में मिलने वाली शाम को शराब और कबाब के चंद टुकड़ों की रंगीनियों में डूब जाना जनता को जब तक पसंद है और हम न सुधरेंगे वाला मिजाज़ जब तक हमारी रगों में शामिल है, तब तक देश को इन्हीं चंपक और लंपट चाचाओं के भरोसे रहना ही होगा।

 

 

 

 

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग