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कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली

Posted On: 29 Apr, 2019 Common Man Issues में

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ANAND MOHAN MISHRA

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आजकल ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ की बात हर जगह की जाती है। जिससे भी बात करते हैं – सभी ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के पक्ष में ही बात करते हुए दिखाई देते हैं। बात भी सही है – शिक्षकों की जरूरतें तथा भूमिका बदल गयी हैं। पहले शिक्षक समाज-सुधारक की भूमिका में रहते थे लेकिन अब शिक्षकों की भूमिका पेशेवर हो गयी है। बच्चे पढ़ें अथवा न पढ़ें – अब शिक्षकों को कोई मतलब नहीं रहता है। केवल अध्यापन पर ही शिक्षक अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। समय के साथ वह भी जरुरी है क्योंकि शिक्षकों की चुनौतियाँ बढ़ गयी हैं। अब यदि छात्र को कुछ भी जरा-सा बोल दिया जाए तो अभिभावक समेत समस्त समाज उस अध्यापक के खिलाफ हो जाता है। तो इस बदलते परिस्थिति में अपने आप को ढालने के लिए ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली का सहारा लेना ही श्रेष्ठ हो जाता है। इसको इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि पहले चिकित्सक बीमार को देखकर ही बीमारी का इलाज बता देते थे। लेकिन आजकल इतने प्रकार के जाँच लिख दिए जाते हैं तथा उन जाँच के प्रतिवेदन के आधार पर ही चिकित्सक उस बीमार व्यक्ति को दवा देते हैं या इलाज शुरू करते हैं। तो हम कह सकते हैं कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन निश्चित रूप से, ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ ने हमारे अध्ययन – अध्यापन  के क्षेत्र में घुसपैठ कर लिया है लेकिन इसका शिक्षा पर क्या असर पड़ेगा? क्या यह शिक्षकों की मदद करेगा  या उन्हें अपाहिज बना देगा?

वास्तव में, ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’  कक्षा निर्देश से अलग नहीं होता है, लेकिन इस कक्षा निर्देश को ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’  कई तरीकों से बढ़ाता है। हमारी शिक्षा प्रणालियों में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के कुछ लाभों को देखेंगे।

चेतनारोपण: एक शिक्षक के लिए यह जानना बहुत मुश्किल हो सकता है कि उसकी कक्षा में हर छात्र की जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए? मंदबुद्धि छात्रों, उन्नत छात्रों, आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों और दिव्यांगों को सीखने के लिए समान पहुंच की आवश्यकता होती है। ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली से  आसानी से प्रत्येक छात्र की व्यक्तिगत सीखने की जरूरतों को अनुकूल बना सकते हैं और उनकी ताकत और कमजोरियों के आधार पर निर्देश को लक्षित कर सकते हैं। शिक्षकों के लिए अर्थहीन काम करना कम हो जाएगा और छात्रों के लिए अधिक सार्थक सीखने का अनुभव हो सकता है। शिक्षक छात्रों के हित को देखते हुए पाठ्यक्रम को पढ़ा सकेंगे।

अनुशिक्षण : ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली का प्रयोग तो पहले से ही अनुशिक्षण में चल रहा है। शिक्षक के साथ बुद्धिमत्ता अनुशिक्षण प्रणाली एक छात्र के सीखने की शैली और उसके मन के अनुकूल समर्थन और निर्देश देने के लिए मौजूद ज्ञान का अनुमान अथवा पता लगा सकता है। छात्रों को जब भी आवश्यकता पड़ेगी ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली का उपयोग कर सकते हैं।

श्रेणीकरण: यह यकीनन सबसे थकाऊ शिक्षण कार्यों में से एक है और पाठ योजना और पेशेवर विकास जैसे अधिक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण कार्यों से समय निकालता है। मशीनें अब इतनी उन्नत हो गई हैं कि वे उत्तर कुंजी के साथ परीक्षा का परिणाम का श्रेणीकरण बहुत जल्दी कर सकते हैं; वे इस बारे में तथ्य संकलित कर सकते हैं कि छात्रों ने कैसा प्रदर्शन किया और यहां तक ​​कि निबंध जैसे अधिक सार मूल्यांकन का भी श्रेणीकरण किया। छात्रों का श्रेणीकरण स्वचालित हो जाएगा।छात्रों की प्रतिक्रिया: ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली आकलन में छात्र के प्रदर्शन के आधार पर पाठ्यक्रम सामग्री में अनुदेश अंतराल की पहचान कर सकता है । उदाहरण के लिए, यदि छात्रों का एक महत्वपूर्ण वर्ग गलत तरीके से किसी प्रश्न का उत्तर देता है, तो ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली उन विशिष्ट सूचनाओं या अवधारणाओं पर उन गलत तरीके से उत्तर देने वाले छात्रों के ऊपर विश्लेषण कर सकता है, ताकि शिक्षक सामग्री और विधियों में लक्षित सुधार प्रदान कर सकें।छात्रों के लिए सार्थक और तत्काल प्रतिक्रिया:  ऐसी स्थिति में जब अधिकांश शिक्षण-कार्य  ऑनलाइन या पाठ संदेश के माध्यम से होता है, छात्रों को शिक्षकों और साथियों के सामने जोखिम लेने में संकोच होता है।  वे ऐसे सार्वजनिक मंच में महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया प्राप्त करने से पीछे हटते हैं। ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली के साथ, छात्र सीखने के लिए गलतियों को आवश्यक बनाने के लिए सहज महसूस कर सकते हैं और सुधार के लिए उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली शिक्षण-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन ला देगा।‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली में यंत्र में इस प्रकार का क्रमानुदेश तथा निर्देश दिया गया है कि वह मनुष्य की तरह ही कार्य करता है। यह प्रणाली आज के समय में अनिवार्य आवश्यकता बनती जा रही है। इस तंत्र के विकास से आने वाले समय में मनुष्य पर निर्भ्ररता कम हो जायेगी। यंत्र का उपयोग कर कार्य कम समय में तथा सही रूप में संपन्न होगा। अशुद्धि की गुंजाइश न के बराबर होगी।केवल वैसे शिक्षक ही तंत्र में बचेंगे जो इस तंत्र के योग्य होंगे। क्योंकि शिक्षकों की गुणवत्ता की जाँच भी हर समय होती रहेगी। अभी उपस्थिति दर्ज करने के लिए बहुत विद्यालयों में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली का प्रयोग किया जा रहा है। लेकिन यह उतना आसन भी नहीं है ,जितनी आसानी से हम बता रहे हैं – अभी अपने देश में पूर्णतया लागू करने में वक्त लगेगा। लेकिन शिक्षकों को इसके लिए मानसिक रूप से अभी से तैयार होना पड़ेगा। ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली से खतरे भी बहुत हैं। लेकिन मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि लाभ की तुलना में खतरे कम हैं। यदि आज के समय में इस प्रणाली का हम प्रयोग नहीं करते हैं तो शिक्षक हमेशा भय के वातावरण में कार्य करेगा। शिक्षकों की भूमिका में बदलाव आ जायेगा। अध्ययन और अध्यापन त्रुटिरहित हो जाएगा। भयमुक्त वातावरण के लिए आज के समय में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ प्रणाली को अपनाना अनिवार्य हो गया है।

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