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विकृत समाज

Posted On: 25 Apr, 2019 Common Man Issues में

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ANAND MOHAN MISHRA

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आजकल समाचार पत्रों में नकारात्मक खबरों की भरमार हो गयी है। अभी तीन – चार दिन पहले एक समाचार पत्र में पढ़ा कि पिता ने कुठार से अपने बड़े बेटे की हत्या कर दी। फिर अगले दिन पढ़ा कि एक घर में चार लड़कों ने घुसकर रिवाल्वर की नोक कर माँ को बंधक बनाया तथा माँ के सामने बेटी के ऊपर एसिड डाल दिया। बेटी पूरी तरह जल गयी। फ़ौरन बेटी को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया जहाँ से उसे दूसरे अस्पताल में बेहतर चिकिस्ता के लिए भेज दिया गया। फिर अगले दिन पढ़ा कि पिता ने चार बेटियों के जन्म लेने पर चारो को पुल से नीचे फेंक दिया। उन चार बच्चियों में तीन गंभीर रूप से घायल है तथा एक की मौत हो गयी।

ये दो – तीन उदाहरण क्या बता रहे हैं? समाज किस तरफ जा रहा है? पिता ने पुत्र की हत्या कर दी – यदि हत्या ही करनी थी तो पुत्र को संसार में लाया ही क्यों? क्या हत्या करने के लिए ही संसार में पुत्र को लाया था? क्या पिता शैतान है ?यदि पुत्र बात नहीं सुन रहा था तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? निश्चित रूप से माता – पिता ही जिम्मेदार है क्योंकि मानवोचित संस्कार देने के दायित्व माता-पिता का है। संतान उत्पत्ति के बाद उस संतान को हर प्रकार से योग्य बनाने की जिम्मेदारी माता – पिता को उठानी ही पड़ती है। यदि महाभारत काल में भी देखें तो पाते हैं कि दुर्योधन की प्रवृत्ति धर्म में नहीं थी या धर्म के अनुसार दुर्योधन आचरण नहीं करता था। फिर भी धृतराष्ट्र का पुत्र – प्रेम कम नहीं हुआ था। बल्कि उत्तरोत्तर दुर्योधन के प्रति प्रेम बढ़ता ही चला गया। अशिक्षा के कारण यदि हत्या की गयी तो पुनः माता – पिता ही दोषी हैं। जिस भी प्रकार से हम देखें या विश्लेषण करें तो उत्तर पहले वाला ही रहेगा।

एसिड से हमला करने वाला युवक युवती से प्यार करता है। ये कैसा प्यार है? प्यार का अर्थ ही नहीं मालूम है और प्यार कर बैठे। ‘प्रेम’ का अर्थ दोहे में कितने सुन्दर तरीके से बताया गया है – ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। प्रेम अर्थ प्यार – यह किस प्रकार का है ? निश्चित रूप से यह आध्यात्मिक प्रेम न होकर शारीरिक प्रेम है। युवको की सोच में विकृति क्यों आयी? क्या युवक सब वहशी तथा दरिदें है ? युवको ने फिल्म में कही पर यह दृश्य देखा होगा और फिर इस घटना को अंजाम दिया। इसका फल कितना भयावह है – इसकी कल्पना उन चार युवको में से किसी ने नहीं की। चारो के चारो गलत कैसे हो गए? पुन: यहाँ पर उन चारों युवको का लालन – पालन किस ढंग से हुआ – यह महत्त्वपूर्ण है। संगति किस प्रकार की थी ? माता – पिता ने ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने की आवश्यकता थी। मैंने एक जागरूक माता – पिता को देखा जो कि बच्चों की हर बात को बहुत ही गंभीरता से लेते थे। बच्चो की परवरिश में बहुत ही ध्यान देना पड़ता है। क्योंकि बच्चे कच्ची मिटटी होते हैं। उन्हें हम जैसी शिक्षा देंगे उसी प्रकार के वे बनेंगे।

तीसरी घटना केवल पुत्री के जन्म को लेकर है। पुत्री का जन्म होना पिता पर निर्भर करता है – माता पर नहीं। संसार को चलने के लिए दोनों की आवश्यकता है। केवल पुत्र से ही संसार चलेगा , ऐसी बात नहीं है। बेटा – बेटी दोनों बराबर है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिससे यह साबित हो गया है कि आज के समय की बात तो छोडिए , प्राचीन काल से ही बेटियों ने अपने परिवार का नाम रोशन किया है। सबसे सुन्दर उदाहारण सावित्री का हम ले सकते हैं। यमराज से लड़कर अपने पति को वापस ले आई। यहाँ आज के समय में पिता बेटियों को पुल के नीचे फेंक रहा है। क्या फेंकते वक्त दया नहीं आई ? किस प्रकार अपनी फूल-सी कोमल बच्ची को फेंक रहा था? क्या पिता कसाई है ? कसाई भी इस प्रकार के कार्य को करने के पहले हजार बार सोचेगा।

समाज ठीक से चले तथा सभी नियम से चलें। इसमें सबसे पहले तीन बातों पर ध्यान देना होगा – सत्साहित्य, सत्संगति तथा सद्विचार। आजकल के युवक अच्छी किताबो से दूर रहते हैं। सोशल मीडिया पर दिनभर अश्लील साईट तथा हिंसक साईट देखते रहने से राक्षसी प्रवृत्ति तो जाग्रत होगी ही। दिन में कम से कम एक बार पूरा परिवार साथ में बैठे तथा एक दूसरे की अच्छाईयों को जाने। धर्म ग्रंथो में प्रेरक प्रसंगों या अच्छी कहानियो की भरमार है। उसे परिवार के साथ बैठ कर साझा किया जाए। यदि दूरदर्शन ही देखना है तो कुछ अच्छे वृतचित्र को देखा जाए। अच्छे कार्यक्रमों की कमी नहीं है।

समाज विकृति की तरफ चल पड़ा है। यदि हम अभी नहीं सचेत हुए तो आसुरी सभ्यता का श्रीगणेश हो जाएगा। फिर चाहकर भी हम वापस नहीं आ सकेंगे। अभी हम यह भले कह सकते हैं कि ये एक – दो घटनाएँ हैं – इससे कुछ खास अन्तर समाज में नहीं पड़ेगा। मगर ऐसी बात नहीं है। समाज को बिगाड़ने के लिए ये एक – दो घटनाएँ ही काफी हैं। क्योंकि गलत बात जल्दी फैलती है। सवाल है कि क्या पुराने दिनों में चले जाएं? नहीं , पुराने दिनों में न जाएं लेकिन सचेत जरुर रहें। माता – पिता होने के कारण हमारा दायित्व बनता है कि बच्चो में अच्छे गुणों का विकास हो। बच्चे एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें तथा अपना नाम रोशन करने के साथ-साथ पूरे परिवार का नाम रोशन करें।

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