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सुखमय जीवन

Posted On: 17 May, 2019 Common Man Issues,Spiritual में

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ANAND MOHAN MISHRA

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीजी ने एक बार अपनी बस यात्रा का वर्णन करते हुए कहा कि दुनिया अच्छे लोगों के बल पर चल रही है। वे अनेकों बार ठगे गए , धोखा गया मगर उनके सपनों का भारत हमेशा उनके सामने बना रहा। उनका विश्वास डगमगा नहीं पाया। वे एक आदर्श भारत मानते थे और अंत तक उनके मन में रहा। अब सवाल आता है कि वर्तमान परिवेश में जब कदम – कदम पर धोखे मिलते हों, सभी जगह मीरजाफर या जयचंद जैसे लोग रहें – वहाँ सफल इंसान बनने के लिए क्या करना जरुरी है? या तो पलायन कर जाएं या युद्ध के मैदान में राणा प्रताप की तरह डटे रहें। मित्र – मण्डली के सुझाव पर चलने से आदर्शवादी होने की जगह व्यवहारवादी होना पड़ता है। यदि समाज को कुछ देना है तो आदर्शवादी ही बनना पड़ेगा क्योकि व्यवहारवादी से तो समाज को नुकसान ही हुआ है।

ठाकुर रामकृष्ण परमहंस की वो सांप को शिक्षा देनेवाली कहानी का जिक्र करना जरुरी हो जाता है। ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने सांप को डराने के लिए कहा था लेकिन सांप ने वह काम भी छोड़ दिया तो परिणाम क्या हुआ – सबने सांप को ही सताना शुरू कर दिया। इसीलिए हम कह सकते हैं कि इतना उदार और दयालु भी हम न बनें नहीं तो लोग गलत फायदा उठा ले जायंगे। कभी भी यह नहीं सोचना है कि कोई हमरी सफलता पर खुश है । वही लोग हम पर प्रसन्न होंगे जिन्हें हमसे लाभ प्राप्त हुआ है। कभी भी चेहरे पर चिंता या थकान का चिन्ह नहीं आना चाहिए और न ही उस पर गौर करना चाहिए। क्योंकि इससे कोई फायदा मिलने वाला ही नहीं है । भूल से भी अपनी कमजोरी या रहस्य यदि दूसरों को बताएंगे तो क्या पता वो भाई के वेश में विभीषण निकल जाए तथा रावण या बाली की तरह हमारे सर्वनाश का कारण बने। साथ ही साथ लेन-देन में सावधानी बरतना एकदम जरुरी है। अधिकांश रिश्ते लेन-देन के कारण ही टूटते हैं। किसी को रुपया देना आसान है लेकिन उसी रूपये को वापस लेना हिमालय पहाड़ पर चढने से भी ज्यादा कठिन है। आजकल इलेक्ट्रॉनिक गजट का जमाना है। ईमेल धोखाधड़ी अथवा अन्य किसी चक्कर में न पड़ जाएँ। कितने बच्चो को मैंने ईमेल धोखाधड़ी या सोशल नेट्वर्किंग साईट के चक्कर में पड़ते तथा बर्बाद होते देखा है।

समाज-केन्द्रित होने से अच्छा आत्म-केन्द्रित होना ठीक है। या केवल अपने काम से मतलब रखना है। यदि अकारण या बिना बताए हम किसी की मदद करेंगे तो उसमे भी आज के ज़माने में लोग कुछ न कुछ गलत अर्थ निकाल लेंगे। इससे मित्र – मण्डली में स्वार्थी , कंजूस आदि होने का ठप्पा लग सकता है। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसमें कुछ भी गलत नहीं है। फिल्म का वह गाना हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है – कुछ तो लोग कहेंगे ।।।लोगों का काम है कहना। हम कुछ भी करें लोग उसमे मीन – मेख निकालेंगे ही। समाज की तरह ही चलना है – समाज के बाहर यदि हम चलने का प्रयत्न करेंगे तो मुंह के बल गिरेंगे और उठ भी नहीं सकेंगे। यदि समाज में सब धीरे चल रहा है तो हमें भी धीरे चलना है। जोर लगाकर यदि चले तो जल्दी थक जायेंगे। इस सन्दर्भ में अनुभव आधारित कार्य करना जरुरी है। एक बार हमारे मित्र ने एक युवा बैल और एक बूढ़े बैल की कहानी सुनाई थी। युवा बैल एक मिनट में खेत के २ चक्कर लगा लेता था जबकि बूढ़ा बैल एक ही चक्कर लगाता था । युवा बैल चक्कर समाप्ति पर बृद्ध बैल पर हँसता था। बृद्ध बैल उस युवा बैल पर ध्यान नहीं देता था। परिणाम यह हुआ कि युवा बैल जल्दी थककर बेहोश होकर गिर गया तथा वृद्ध बैल अपने खेत का चक्कर पूर्ववत लगाता रहा। यहाँ पर युवा बैल के असफल होने का कारण तेज चाल रहा। यदि वह अपने वरिष्ठ के अनुभव से सीख लेता तो उसकी यह दशा नहीं होती।

तो अंत में हम इतना कह सकते हैं कि जो होने का है वह तो होकर रहेगा लेकिन ये बातें अनुभव से आई हैं. हरि इच्छा के आगे किसी का जोर नहीं चलता है. लेकिन अकारण आने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है.

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