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सकारात्मक सोच

Posted On: 17 May, 2019 Spiritual में

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ANAND MOHAN MISHRA

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हम हमेशा एक कहावत सुनते हैं, जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं। मन के हारे हार है – मन के जीते जीत। ये कहावत पूरी तरह से सही हैं, क्योकि हमारा मन एक वक्त में एक ही विचार कर सकता हैं – सकारात्मक या नकारात्मक !  इस संसार में जो भी घटनाएं घट रही हैं या हो रही हैं तो निश्चित रूप से उसको देखने का भी नजरिया सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है। अर्थात हमेशा कुछ न कुछ कमी निकालते रहते हैं जब कि कुछ लोग उसी घटना को सकारात्मक रूप में देखते हैं और उसमे ये खोजते है कि इसमें क्या अच्छाई है, और उसी अच्छाई से सिख लेकर नित अपना जीवन सफल बनाते चले जाते हैं। वास्तव में हमारे जीवन में जो होता हैं अच्छे के लिए होता है। हमें कुछ समय के लिए उस घटना से दुःख जरुर होता है लेकिन बाद में यही पता चलता है कि ये हमारे लिए अच्छा ही हुआ। मेरे एक मित्र ने एक ऋषि के दो शिष्यों की कहानी सुनाई थी। ऋषि के दो शिष्यों में एक सकारात्मक सोच तथा दूसरा नकारात्मक सोच वाला था। सकारात्मक सोच वाला हमेशा दूसरों की भलाई तथा दूसरा नकारात्मक सोच वाला बहुत क्रोधी था। एक दिन ऋषि दोनों शिष्यों को लेकर वन में परीक्षा लेने गए। एक फलदार वृक्ष के पास दोनों शिष्यों को लेकर ऋषि ठहर गए। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो। फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है? सकारात्मक सोच रखने वाले शिष्य ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है । इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए। इंसान को फलदार पेड़ की तरह अपना जीवन जीना चाहिए। परमार्थ में ही अपने जीवन का पालन करना चाहिए। नकारात्मक सोच वाले शिष्य ने गुस्से से कहा ये पेड़ बहुत धूर्त है, बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा। मनुष्य को अपनी आवश्यकता की चीजें दूसरों से छीन लेनी चाहिए। यदि संसार में जीना है तो पत्थर मारे बिना काम नहीं चलेगा। कुछ अभीष्ट की प्राप्ति का सबसे सरल उपाय पत्थर मारना ही है। अब उदाहरण हमारे सामने है। पेड़ दोनों शिष्यों के लिए समान है। केवल सोच का फर्क है। पेड़ किसी प्रकार का विभेद दोनों के बीच नहीं कर रहा है। लेकिन दोनों शिष्यों की सोच के कारण पेड़ की देने की उपयोगिता बदल रही है। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है। नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं। गुलाब के फूल को देखकर हम सीख सकते हैं – काँटों से घिरा होने के बाद भी संसार को खुशबु दे रहा है। गुलाब का फूल चारों तरफ से संकटों से घिरा है लेकिन अपनी खुशबू बिखेरने के कार्य को नहीं छोड़ रहा है। मेरा एक मित्र हमेशा सबकी भलाई में लगा रहता था। अपना कार्य छोड़कर हमेशा दूसरो के कार्य पर ध्यान केन्द्रित करता था। मित्र को लग रहा था कि यह प्रवृत्ति सकारात्मक प्रवृत्ति है। लेकिन मित्र यह भूल गया कि उसे भी अपना कार्य करना है। लेकिन मित्र की सकारात्मक प्रवृत्ति होने के चलते केवल विश्वास पर सारे कार्य अपने अधीनस्थ के ऊपर छोड़ दिया। अब संसार तो सभी जगह है। जब वक्त आया तो सारे अधीनस्थ ने उनका साथ छोड़ दिया। अब वे जाँच के दायरे में आ गए। उनके ऊपर काफी समस्याएँ आ गयी। वे चक्रव्यूह में फंसते चले गए। तो उस मित्र को अपने सकारात्मक प्रवृत्ति पर काफी खेद हुआ। लेकिन उसी मित्र को अन्य मित्र ने सलाह दी कि गुलाब के फूल की तरह खुशबू बिखेरते रहिए। सुख-दुःख आते – जाते रहता है। अपनी मौलिक सोच को कभी मत छोडिए। वही एक मनुष्य की पहचान होती है। अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दुखों को देखकर और दुखी होते चले जाएँ ये इससे सीख लेकर अपने जीवन को एक नयी दिशा में ले जाएँ। प्रकृति का ये नियम है कि हम जितना संघर्ष करेंगे , हमारी सफलता का प्रतिशत उतना ही अधिक होगा। इसलिए संघर्ष करना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने, संघर्ष से भागे नहीं बल्क़ि इसे अपना दोस्त बना लें। हर कोई अपने जीवन में अपनी लड़ाई लड़ रहा है और सबके अपने अपने दुख हैं। इसीलिए कम से कम हम जब सभी अपनों से मिलते हैं तब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय एक दूसरे को प्यार, स्नेह और साथ रहने की खुशी का एहसास दें, जीवन की इस यात्रा को लड़ने की बजाय प्यार और भरोसे से आसानी से पार किया जा सकता है। यह जीवन है, परिवार और मित्रों की भावनाओं के साथ हमें होना चाहिए तथा एक-दूसरे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, अलग-अलग सोचना, एक-दूसरे के बारे में सोचना और बेहतर तालमेल बिठाना – यही प्रयास हमारा होना चाहिए। अंत में हम इतना ही कहना चाहेंगे कि सकारात्मक सोच का अर्थ नकारात्मक बातों को कम सोचना है। सकारात्मक सोच की भी अपनी सीमा होती है। नकारात्मक सोच को बिलकुल भी समाप्त नहीं कर देना है। सकारात्मक सोच से व्यक्ति की तरक्की होती चली जाती है तथा अनावश्यक तनाव से मनुष्य बचता है जिससे स्वास्थ्य ठीक रहता है।

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