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बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

Posted On: 15 May, 2019 Spiritual में

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ANAND MOHAN MISHRA

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राजकुमार सिद्धार्थ गौतम एक अलौकिक महापुरुष इस धरती पर हुए। उनका जन्म लुंबिनी , नेपाल में हुआ था।  उनके पिताजी का नाम शुद्धोदन था। राजकुमार के रूप में उनका जीवन एकदम सादा था। हमेशा वे गहरे विचार में खोया रहा करते थे। महाराज शुद्धोदन इस व्यवहार से परेशान रहा करते थे। उन्होंने उनके सुख-सुविधा के लिए हर इंतजाम कर रखा था। मगर राजकुमार का मन उन सुख-सुविधाओं में नहीं लगता था। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए उनका ध्यान सांसारिक बातों से हटता चला गया। तब महाराज शुद्धोदन ने उनकी शादी यशोधरा नामक राजकुमारी के साथ कम उम्र में ही करवा दी। जल्दी ही वे पिता भी बन गए। राहुल नाम उस पुत्र का रखा गया। मगर राजकुमार सिद्धार्थ तो इस धरती पर कुछ और सोचकर अवतरित हुए थे। उनका मन सांसारिक बातों में लगता ही नहीं था। एक दिन जब वे अपने शाही रथ में यात्रा कर रहे थे, उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत शरीर और एक तपस्वी को देखा। इसके पहले उन्होंने इस सांसारिक कष्टों को नहीं देखा था। उनके मन में यह प्रश्न उत्पन्न हुआ – मनुष्य बीमार क्यों होता है ? मनुष्य बूढ़ा क्यों होता है ? मनुष्य मरता क्यों है ?

उन्हें अहसास हुआ कि कैसे  बुढ़ापा जीवन चक्र का अंतिम चरण था और मृत्यु कैसे अंतिम सत्य है। जीवन की कठोर वास्तविकता से सिद्धार्थ का सामना हो रहा था। यह संसार नश्वर है तथा संसार में केवल दुःख ही दुःख है। इन दुखों से कैसे छुटकारा पाया जाए ? इन्ही बातों को वे दिन-रात सोचने लगे। संसार के इन दुखों से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने एक कठोर फैसला ले लिया और उन्होंने अपने राज्य और परिवार को त्यागने का फैसला किया। । उन्होंने  सिर्फ 29 साल की उम्र में अपने सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की। एक रात, जब शाही घराने के सभी लोग सो रहे थे, युवा राजकुमार अपने घर की सुख-सुविधाएं छोड़कर शाश्वत सत्य की खोज करने के लिए अपनी निकल पड़े।

सिद्धार्थ के लिए, सच्चाई को पाना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की।  बोधगया में,  वे एक पेड़ के नीचे ध्यान में बैठ गए। उन्होंने 49 दिनों तक सीधे ध्यान लगाया, तब जाकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनको बुद्ध कहा गया। वह दिन वैशाख पूर्णिमा का था। अतः उस दिन को बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी दिन गौतम बुद्ध की जयंती है और उनका निर्वाण दिवस भी। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। आज बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में 50 करोड़ से अधिक लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। अतः हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है संसार को एक नए धर्म से परिचय कराया। जिसे आज हमलोग बौद्ध धर्म के नाम से जानते हैं। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने पहला उपदेश सारनाथ में दिया। संसार में जन्म-मरण के बंधन से कैसे छुटकारा पाया जाता है – इसके लिए उन्होंने जो उपदेश दिया उसे अष्टांग मार्ग के नाम से जाना जाता है। अष्टांग मार्ग  मध्य-मार्ग का ही सन्देश देता है। कहा भी गया है कि वीणा के तार को इतना मत बांधो कि टूट जाए तथा इतना ढीला भी मत छोडो कि आवाज न निकले। इन बातों से सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान की प्राप्ति हुई। अष्टांग – मार्ग  में निम्न बातें आती हैं – सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म,सम्यक स्मृति, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम तथा सम्यक समाधि।

इन आठ मार्गों का पालन करना आवश्यक है।  इनके पालन से अन्तःकरण की शुद्धि होती है और ज्ञान का उदय होता है। बौद्ध-साधना में साधक ध्यान आदि के लिए किसी न किसी आसन का प्रयोग करता ही है। स्वयं भगवान बुद्ध की मूर्ति पदमासन में पाई जाती है । अष्टांग मार्ग को ‘काल चक्र’ कहते हैं। अर्थात समय का चक्र। समय और कर्म का अटूट संबंध है। कर्म का चक्र समय के साथ सदा घूमता रहता है। आज आपका जो व्यवहार है वह बीते कल से निकला हुआ है। कुछ लोग हैं जिनके साथ हर वक्त बुरा होता रहता है तो इसके पीछे कार्य-कारण की अनंत श्रृंखला है। दुःख या रोग और सुख या सेहत सभी हमारे पिछले विचार और कर्म का परिणाम हैं। भगवान बुद्ध इसी दुखों से छुटकारा पाने के लिए अष्टांग – मार्ग पर चलने की सलाह देते हैं। इन मार्ग पर चलकर मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म कई शाखाओं में बंट गया। जिनमे मुख्य रूप से महायान, वज्रयान , नवयान आदिद प्रमुख हैं।

भारत में बौद्ध धर्म अल्पसंख्यक है, जबकि भारत में ही इस विश्व धर्म का उदय हुआ था। परंतु एशिया में बौद्ध धर्म प्रमुख धर्म बना हुआ है। चीन बौद्धों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, चीन की कुल आबादी में 80-९० % बौद्ध अनुयायी है। ज्यादातर चीनी महायान सम्प्रदाय के अनुयायी है। अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि समानता तथा भाईचारे का पाठ हमें बौद्ध धर्म सिखाता है।

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