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"बस दोष ज़रा कलयुग का है"

Posted On: 18 Oct, 2012 Others में

राजनीतिनयी सोच नयी क्रांति

ANAND PRAVIN

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CD401

जब जन्म लिए तब मानव थे, लेकिन अब शंका होती है,
आ जाए मन में अहंकार, मौलिकता क्षण-क्षण खोती है,


अपनी निज की अभिलाषा को, संयमित नहीं रख पाते हैं ,
क्यों समझ द्रव्य को सोम-सुधा, हम गरल निगलते जाते हैं,


तम में भटके-भटके से हैं, अपने ही विश्वासों से डर,
इसलिए झूठ पर, मिथ्या पर, बल डाल रहे यूं बढ़-बढ़ कर,


कृत्रिम आभा पर मुग्ध, उसे पाने को हम ललचाते हैं,
क्यों सत्य मार्ग को छोड़ पतन के पथ पर बढ़ते जाते हैं,

है आज मनुज में होड़ बड़ी, तन भूषण कौन सजायेगा,
हो रहे निरादृत मात-पिता, सर विपदा कौन उठायेगा,

परिवर्तन को आधार समझ, सब विद्युत् गति से भाग रहे,
दन – दन गोली की बौछारें, जन के सीनों पर दाग रहे,

कहकर बातें नैतिकता की, गर्वित हो हम इठलाते हैं,
पर आये कर्म परीक्षा जब, भीतर – भीतर घबराते हैं,

सब कुछ है गलत भला ऐसा, कहकर कैसे बच पायेंगे,
आचरण अनैतिक करने से, हम भी दानव बन जायेंगे,

एक ही ह्रदय सब पाते हैं, जीवन है प्रेम लुटाने को,
हम व्यर्थ उसे क्यों जाने दें, बस ऊँच-नीच दर्शाने को,

आओ सब पुनः विचारें मिल, यह प्रश्न समूचे जग का है,
जन सारे के सारे अच्छे हैं, “बस दोष ज़रा कलयुग का है”

आनंद प्रवीन

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