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इतिहास से खफा हैं पिंडारी

Posted On: 28 Jan, 2010 Others में

अनुभूतिJust another weblog

Anand Rai, Jagran

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 अभी दुबारा वीर फिल्म देखा कर लौटा हूँ. यह सही है कि कई जगह फिल्म काल्पनिक लगती है लेकिन मन पर  अपना असर डालती है. दरअसल वीर के बहाने हमने पिंडारियों के अतीत से पर्दा उठाना शुरू किया तो कई चौकाने वाले तथ्य सामने आये. इतिहास में जिस  चीतू खान के जंगल में चीता खाने की बात लिखी है उनको अंग्रेजों ने गणेशपुर में रियासत दी और वहां उनकी  मजार है. दैनिक जागरण में जब पिंडारियों के ऊपर ख़बरें छापनी शुरू हुई तो उन लोगों का हौसला भी बढ़ा. वे लोग अब अभियान चला रहे हैं ताकि उनके बारे में इतिहास में सही तथ्य अंकित हो सके. उन्हें गलत इतिहास से शिकायत है. इतिहास में वर्णित कई चीजें गलत पायी गयी हैं. मेरी खबरें उस दिशा की ओर इशारा कर रही हैं.
यह खबर २३ जनवरी के अंक में छपी
पूर्वजों का शौर्य देख रोमांचित हो गए पिण्डारी
आनन्द राय, गोरखपुर इतिहास की बुनियाद और कल्पना के सहारे पिण्डारियों की शौर्य गाथा पर बनी फिल्म वीर को पूर्वाचल में ऐतिहासिक सलामी मिली। हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड में भी यहां के सिनेमा हाल गरम हो गये। जुमे की नमाज की वजह से पिण्डारी दिन का शो नहीं देख सके। दोस्तों के साथ पिण्डारी मुखिया ने रात का शो देखा। पर्दे पर पिण्डारियों की शौर्य गाथा देखकर वे लोग रोमांचित हो गये। फिल्म वीर पूर्वाचल में इसलिए बेहद प्रांसगिक हो गयी क्योंकि अंग्रेजों ने समझौते के तहत पिण्डारी सरदार करीम खां को गोरखपुर के सिकरीगंज में जागीर देकर बसाया। अब उनकी वंश बेल दूर दूर तक फैल गयी है। इस ऐतिहासिक तथ्य को दैनिक जागरण ने 21 जनवरी के अंक में उजागर किया इसलिए सिनेमा घरों पर दर्शक उमड़ पड़े। पिण्डारी परिवार के मुखिया अब्दुल रहमत करीम खां और अब्दुल माबूद करीम खां जुमे की वजह से दिन में नहीं जा पाये लेकिन रात को एसआरएस में शो देखा। एक एक दृश्य पर उन लोगों की निगाह जमी थी। पहले उन लोगों ने तय किया था कि यदि फिल्म में उनके पूर्वजों पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी हुई तो न्यायालय का दरवाजा खटखटायेंगे। पूरी फिल्म पिण्डारी कौम की शौर्य गाथा को प्रदर्शित कर रही है इसलिए उन लोगों की खुशी बढ़ गयी। फिल्म वीर में पिण्डारियों के कबीले में हिन्दू मुसलमान दोनों दिखे। फिल्म में हैदर अली पिण्डारियों के सरदार हैं जबकि पूरी फिल्म की कहानी पिण्डारी पृथ्वी सिंह के पुत्र वीर के इर्द गिर्द ही घूमती है। फिल्म में इस बात को झुठलाने की कोशिश की गयी है कि पिण्डारी अमानवीय, बेहद क्रूर और अराजक थे। माधवगढ़ की युवराज्ञी यशोधरा से प्रेम की शुरूआत ही लूटपाट करने गये वीर के मानवीय गुणों से होती है। पिण्डारी परिवार के रहमत खां और माबूद खां यह सुनना पसंद नहीं करते हैं कि पिण्डारी लुटेरे और क्रूर थे। उनका कहना है कि पिण्डारी कौम हमेशा से बहादुर थी, अन्याय के खिलाफ लड़ी । उन लोगों का कहना है कि फिल्म में हमारी सही समीक्षा की गयी है। फिल्म की बारीकियों पर नजर रखने वाले सिनेमा वितरक अख्तर हुसैन अंसारी कहते हैं कि वीर फिल्म में इतिहास के कुछ जीवित संदर्भ हैं लेकिन काल्पनिक जिंदगी की तस्वीरें सब पर भारी है।
यह खबर 24 जनवरी के अंक में छपी
हां! मेरे पूर्वज लुटेरे थे मगर..
आनन्द राय, गोरखपुर पिण्डारियों की शौर्य गाथा को प्रदर्शित करने वाली फिल्म वीर पिण्डारियों के मुखिया रहमत करीम खां और उनके चचेरे भाई अब्दुल माबूद करीम खां को जितनी अच्छी लगी, उतना ही इतिहास से उनकी नाराजगी बढ़ गयी। इतिहास में पिण्डारियों को बर्बर और लुटेरा लिखे जाने पर उन लोगों ने क्षोभ जाहिर किया है और भारत सरकार से मांग की है कि इतिहास से झूठे तथ्यों को हटाया जाये। बातचीत में उन लोगों ने यह स्वीकार किया कि हमारे पूर्वज लुटेरे थे, लेकिन उन्होंने अंग्रेजों को ही लूटा। अंग्रेजों के लिखे इतिहास को ही हमारा इतिहास मान लिया गया। इस कलंक को मिटाने के लिए वे अभियान चलायेंगे। लार्ड हेस्टिंग्स के साथ हुए समझौते के तहत 1820 में सिकरीगंज में जागीर देकर बसाये गये पिण्डारी सरदार करीम खां के वंशज अब्दुल रहमत करीम खां, अब्दुल माबूद करीम खां और उनके परिवारीजन ने शुक्रवार की रात को फिल्म वीर देखी। इस फिल्म को देखने के बाद उन लोगों ने शनिवार की सुबह सिकरीगंज नवाब हाता में अपने परिवारीजन में खुशी बांटी। फिल्म से संतुष्ट पिण्डारी मुखिया को सलमान खान से सिर्फ इतनी शिकायत है कि उनके पूर्वज करीम खां का फिल्म में जिक्र नहीं हुआ है। पर इसी फिल्म ने उन लोगों का हौसला बढ़ा दिया है। उन लोगों को अब इतिहास पर आपत्ति है। पिण्डारी मुखिया का कहना है कि हां, हमारे पूर्वज लुटेरे थे, लेकिन उन्हें गलत ढंग से इतिहास में दिखाया गया है। आजादी की लड़ाई में हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों से संघर्ष किया और उनके खजाने को लूटा। इतिहासकारों से पिण्डारी परिवार का सवाल है कि क्या आजादी की लड़ाई के दौरान जिन-जिन नामचीन सेनानियों ने अंग्रेजों का खजाना लूटा उन्हें लुटेरा कहा जाये? पिण्डारियों का कहना है कि उनके पूर्वजों ने अंग्रेजों और उनके सरपरस्तों को लूटा। अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया, इसलिए उन्होंने हमसे समझौता किया। हम अंग्रेजों पर भारी पड़े, यह बहुतों को हजम नहीं हुआ। माबूद खान का तर्क है कि चूंकि हम बेहद अल्पसंख्यक हो गये और पिण्डारी सेना को अंग्रेजों व उनकी गुलाम राजाओं ने तबाह कर दिया, इसलिए सियासी चाल के तहत हमारे इतिहास को दागदार कर दिया गया। अब हमारा मकसद इस कलंक को धोना है। इतिहास के पन्नों लिखी गलत इबारत को दुरुस्त करना है।
यह खबर २5 जनवरी के अंक में छपी
पिण्डारी बोले हमें भी सम्मान चाहिए
कार्यालय संवाददाता, गोरखपुर: इतिहास के पन्नों में लुटेरा साबित हुये पिण्डारियों ने वीर फिल्म के प्रदर्शन के बाद अपने स्वाभिमान की लड़ाई शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नाम सम्बोधित चिट्ठी में पिण्डारियों ने कहा है कि सरकार हमे भी सम्मान दो ताकि हम चैन से जी सकें। यह चिट्ठी पिण्डारियों के बीच सोमवार से घूमेगी और सबके हस्ताक्षर के बाद ही इसे सौंपा जायेगा। सलमान खान की फिल्म वीर के प्रदर्शन के बाद सिकरीगंज स्थित नवाब हाता में सक्रियता बढ़ गयी है। पिण्डारी सरदार करीम खां के वंशज परिवार के मुखिया अब्दुल रहमत करीम खां और उनके भाई अब्दुल माबूद करीम खां ने अपने सम्मान के लिए अभियान शुरू कर दिया। रविवार को मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नाम सम्बोधित एक पत्रक तैयार हुआ जिसमें उन लोगों ने यह लिखा है कि पिण्डारी कौम बहुत बहादुर थी। आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ी। लेकिन मालवा प्रदेश में पिण्डारियों को घेरकर धोखे से मारा गया। धोखा देने के बाद भी जब बचे हुये पिण्डारी उन पर भारी पड़े तो उन लोगों ने समझौता किया। अमीर को टोंक और करीम खां को गोरखपुर के सिकरीगंज में जागीर दी गयी। वसील मुहम्मद को उन लोगों ने गाजीपुर कारागार में बंद कर दिया जहां उनकी मौत हो गयी। जबकि चीतू को जंगल में चीता खा गया। इस बहादुर कौम को अल्पसंख्यक होने के नाते इतिहास में लुटेरा लिख दिया गया। इस तथ्य को सही किया जाय और यह स्पष्ट किया जाय कि पिण्डारी कौम देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली बहादुर कौम थी। इस अभियान के प्रवक्ता माबूद करीम खान ने कहा है कि हम अपने मुखिया के निर्देश पर इस पत्रक पर अपने समाज के लोगों का सोमवार से हस्ताक्षर करायेंगे और फिर इसे सरकार को सौंपा.
यह खबर २6 जनवरी के अंक में छपी

पिण्डारी चीतू खां के जंगल में मरने का तथ्य झूठा

कार्यालय संवाददाता, गोरखपुर : इतिहास में पिण्डारियों को लुटेरा कहे जाने के खिलाफ पिण्डारी सरदार करीम खां के वंशज अब्दुल रहमत करीम खां और अब्दुल माबूद करीम खां द्वारा शुरू किये गये संघर्ष की लौ तेज हो गयी है। बस्ती के डा. सलीम अहमद पिण्डारी ने इस अभियान को आगे बढ़ाने का फैसला किया है और कहा है कि अब यह मशाल लखनऊ, टोंक और भोपाल तक जलेगी। डा. सलीम खां की माने तो वे उसी पिण्डारी सरदार चीतू खां के वंशज हैं, जिनके बारे में इतिहास में दर्ज हो गया कि चीतू को जंगल का चीता खा गया। जंगल में उनके मरने का तथ्य झूठा है। पिण्डारी सरदार करीम खां की पांचवीं पीढ़ी के वंशज रहमत करीम खां और माबूद करीम खां ने इतिहास में सही तथ्य दर्ज करने के लिए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सम्बोधित पत्र को लेकर सोमवार से हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। यह चिट्ठी अभी गोरखपुर से आगे नहीं बढ़ी है लेकिन बस्ती के डा. सलीम अहमद पिण्डारी ने भी इतिहास के गलत तथ्यों को मिटाने का बीड़ा उठा लिया है। उन्होंने कहा है कि रहमत करीम खां हमारे परिवार के हैं। उन्होंने दावा किया कि हमारी कौम आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लड़ी और बहादुरी से लड़ी। उन्होंने बताया कि चीतू खां का असली नाम कादिर बख्श था। 1816 से 1818 तक लखनऊ में वे लार्ड हेस्टिंग्स की सेना से लड़े। 1920 में उन्हें भी समझौते के तहत बस्ती जिले से सात किलोमीटर दूर गनेशपुर में ससम्मान बसाया गया। कादिर बख्श के पुत्र खादिम हुसैन को दो बेटे खान बहादुर नवाब गुलाम हुसैन और नवाब गुलाम मुहम्मद हुये। डा. सलीम पिण्डारी नवाब गुलाम हुसैन के इकलौते पुत्र नवाब सैदा हुसैन के पुत्र हैं। चीतू की पांचवीं पीढ़ी के डा. सलीम को सदा से पिण्डारी होने का गर्व है इसीलिए उन्होंने बस्ती में अपने अस्पताल का नाम पिण्डारी हास्पीटल रखा। डा. सलीम कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों से इतनी जबर्दस्त लड़ाई लड़ी कि उन्हें हमारे आगे झुकना पड़ा। उन्होंने बताया कि 4 जून 1928 को यूके में मेरे दादा खान बहादुर गुलाम हुसैन को सम्मानित किया गया। इसके अलावा 12 मई 1937 को ब्रिटिश महारानी ने भी उनका सम्मान किया। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों की लड़ाई का परिणाम रहा कि देश को आजादी मिली। इतिहास में गलत ढंग से तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा गया है। अब गनेशपुर के जर्रार अहमद पिण्डारी, अब्दुल्ला पिण्डारी, अब्दुल रहमान, अब्दुल रहीम और आसिल पिण्डारी भी अपने सम्मान के लिए शुरू हुये आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायेंगे।

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