blogid : 1518 postid : 45

प्रेयसी को पत्र

Posted On: 22 Sep, 2007 Others में

आपका पन्नाहम सबकी बात

Aneilp

108 Posts

57 Comments

(रास्ते पर गुजरते हुए लेखक को बटुआ पड़ा मिला। नोटों के चक्कर में उठा लिया। देखा तो उसमें किसी भावुक के प्रेमपत्र जमा थे। पाठकों को कुछ लाभ होगा इसीलिए पत्रों के कुछ अंश नीचे दिये जा रहे हैं। पूरा छापना किसी की प्राइवेसी का उल्लंघन होगा। कॉपीराइट का उल्लंघन भी हो सकता है। जिन सज्जन का हो वे इन अंशों को पहचान कर अपना बटुआ वापस ले जा सकते हैं।)

प्रिये, तुम्हें खत लिखने की सोचते सोचते पूरी ऋतु गुजर गई। ग्रीष्म ऋतु में बिजली की कमी के कारण तुम भी किसी कोने में पसीना बहा रही होगी यही सोचकर तुम्हें छेड़ने का मेरा मन नहीं हुआ। बिजलीघर तो जैसा तुम्हारा वैसा हमारा। अब मौसम बदला है तो कलम अपने आप ही बहने लगी है। लेखनी फेंकने की अपेक्षा तुम्हें एक खत लिख दूं, यही ठीक रहेगा सो लिखता हूं। सुमुखि, तुम्हारा चंद्रमुख देखने के लिए दिन रात तरसता हूँ। फोटो में जैसा है वैसा दिखता है, इससे तो कल्पना में देखना ठीक है। मनरूपी कंप्यूटर में कल्पना के टूल्स बार से रंग और डिजाइन उठाकर फिट करता हूं, ठीक लगने लगता है तो देख लेता हूं। इतनी मेहनत मैं करता हूं सो तुम्हारे लिए। एक बार दिख जाओ तो रोज की यह कसरत बंद हो जाये। मनोहरे, बाहर बरसात हो रही है। कोई कवि होता तो ऐसे में मिलने की बात जरूर कहता। जानता है ऐसे में आ जाओगी तो जाओगी बारिश बंद होने पर ही। देर तक सानिध्य रहेगा। लेकिन मैं डरता हूँ। तुम कवि की प्रेयसी नहीं, आधुनिक प्रेमी की चाहत हो। अधिक देर तुम्हारे रुकने पर बोरियत का शिकार होने का डर है। वैसे भी जेब में पैसे न हों तो आदमी जल्दी बोर होने लगता है। ऐसे में प्रेमिका पास हो तो हासिल में बेइज्जती के अलावा कुछ बचता नहीं है। इसीलिए सूखे में आना और सूखे में जाना। कपड़े भी ज्यादा चलेंगे। धन्ये, तुम सचमुच धन्य हो। कानून की तरह किताबों में कैद रहने में तुम्हें कितना मजा आता है! कब से बुला रहा हूँ लेकिन आने का नाम नहीं लेतीं। क्या तुम्हें भी किसी पुलिसवाले ने कब्जिया लिया है? अगर ऐसा है तो उस पुलिसवाले के आका का उल्लेख खत में जरूर करना। आज के समय में पुलिस इशारे के बिना काम नहीं करती। यह कोई अमेरिका की पुलिस नहीं है जो साक्ष्यों के अनुसार चले। इशारा करने वाला अगर सचमुच ताकतवर है तो मैं कहीं और देखूंगा। तुम्हे नाहक परेशान होने की जरूरत नहीं है। तुम अगर पुलिस के पास हो तो सारा हिंदुस्तान तुम्हारे पास है। ललिते, वैसे तो मैं खत में मोबाइल नंबर लिख देता, तुम्हें बात करने में आसानी रहती। लेकिन सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं है। आती बारी में अपना लिख भेजना। तुम्हें अधिक सोचने की जरूरत नहीं है। यह बंदा अपना नंबर चाहे जितना बांट दे लेकिन तुम्हारा तो अपने पास गोपन ही रखना अधिक पसंद करेगा। चंद्रमुखी, तुम क्यों चिंता करती हो। आ भी जाओ। अगर कोई काम नहीं मिलेगा तो दलाली करने लगूंगा। हमारी सभ्यता ने इस काम को भी सम्मान दिला दिया है। दो लोगों को धोखे में रखकर कितना भी पैसा कमाया जा सकता है। हां, यह धन होता दो नंबर का है इसीलिए खर्च भी जल्दी करना पड़ता है। हांलाकि तुम्हारे लिए तो यह खुशी की बात है। सुभगे, कल तुम्हें बाजार में देखा। जान पड़ा कि तुम्हीं हो। हांलाकि कल्पना से मैच नहीं करतीं लेकिन पहनावे से अच्छे घर की जान पड़ती हो। मैंने सोचा तुम्हीं ठीक हो। शाम तक मेरी बेपनाह मुहव्वत मुझ पर हावी हो गई। अब नये ढंग से मैं तुमसे नया प्रेम करने लगा हूँ। कल्पनावाली की मैंने छुट्टी कर दी है। प्राणवल्लभे, अब तो मैं तुम्हारे अलावा कुछ भी नहीं सोचता हूँ। बात यह है कि फिल्में सब एकसी आती हैं। किताबें मैं पढ़ता नहीं। दोस्त सब इधर उधर हो गये हैं। इसलिए सोचने के लिए मेरे पास और कुछ है भी नहीं। यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि तुम विश्वास कर सको कि मैं आजकल तुम्हारे बारे में ही अधिक सोचता हूँ। शकुंतले, दुष्यंत की तरह मैं तुम्हें नहीं भूलूंगा। मेरे पास एक ही अंगूठी है, उसे मैं तुम्हें दे दूंगा। उसकी चिंता रहेगी तो तुम्हारी भी याद रहेगी। पुरुष स्त्री को जो दे देता है उसके लिए भी उसे याद रखता है। मनोविज्ञान का यह नियम अखबारों से तुम तक भी आ गया होगा। इसलिए उल्लेख कर रहा हूँ। सखि, अब कितना लिखूं? इतना तो मैंने पूरे परीक्षा काल में भी नहीं लिखा। संक्षेप में मेरी स्थिति जो है सो लिखता हूँ। इसी से समझ लेना। मुझे गरज किसी से क्या वास्ता मुझे काम अपने काम से।तेरे जिक्र से तेरी फिक्र से तेरी याद से तेरे नाम से। मानिनी, पता नहीं तुम लड़कियों को इतना घमंड किस बात का होता है। तुमने एक भी खत का जबाब नहीं दिया। कोई लड़का भी तुम्हारे आसपास नहीं दिखता। पता नहीं किन सपनों में खोई रहती हो। उस दिन भीड़ में धक्का दिया, तुमने ध्यान नहीं दिया। सीटी बजाने पर मुड़ कर भी नहीं देखा। क्या तुम्हारा स्वभाव भी पांच साल में एक बार मुड़कर देखने वाला है? तो अपने चुनाव की साल बता रखना। मैं प्रचार का बजट बना रखूँगा। रूपा, मेरा अब यह आखिरी खत है। अब और नहीं। पाकिस्तानी जनता की तरह डेमोक्रेसी का इंतजार अनंतकाल तक मैं नहीं कर सकता। उधर नेपाल में भी जनता को सरकार मिल गई है। सोचता हूं अब मुझे भी अपने लिए कोई ठीक करनी ही पड़ेगी। साफ बता देता हूँ, तू नहीं और सही, और नहीं और सही। सजनि, तुम्हारा जबाब पाकर खुश हुआ। हिंदी जरूर तुम्हारी खराब है लेकिन उसकी चिंता तो किसी को भी नहीं है। हमीं क्यों नाहक परेशान हों? तुमने तो जबाब में फिल्मी गीत तक लिखे हैं। मैं इतने की उम्मीद नहीं करता था। तो कल बाजार में मिलना। चोरी की कुछ सीडीं मेरे पास भी हैं। सब तुम्हें दे दूंगा। काम्या, तुमसे मिलकर आया तो दिनभर खुश रहा। पर देखना हमारे मिलन का हाल मुशर्रफ-बेनजीर सा न हो। मुलाकात के समय कुछ और अपनी जगह पर कुछ और। हमारे तुम्हारे बीच मौकापरस्त नवाज शरीफ हो सकते हैं। तुम्हारे पितारूपी सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेकर वे लौट सकते हैं, सावधान रहना। मेरी सरकार, मुझे तुम्हारा प्रधानमंत्री होने में कोई बुराई नजर नहीं आती। पद तो मेरा है। भाषण और प्रोग्राम तुम्हारे चलेंगे। बस लेफ्ट फ्रंट की तरह लेफ्ट मत हो जाना। वैसे वे भी जल्दी मान जाते हैं। मनमोहिनी, कल मां के बारे में तुम्हारे विचार जानने को मिले। जानकर खुशी हुई कि वे मेरी मां के बारे में थे, तुम्हारी मां के बारे में नहीं। हिंदी की तरह मेरी मां खराब हो सकती हैं लेकिन अंग्रेजी की तरह तुम्हारी मां की अहमियत से मैं क्या कोई भी इंकार नहीं कर सकता। निर्मोहिणी, तुम क्यों रूठ गईं? मैंने तुम्हारे पिता को कब बुरा भला कहा था? मैं तो अपने प्रिंसीपल की शिकायत कर रहा था। कसम से एक बार भी जो पढ़ाई छोड़ने के बाद उसने किताब उठाई है। खुद अब तक जैसे का तैसा है और हमें जाने क्या समझता है! निर्दयी, हाय! तुम्हें मनाना कितना कठिन काम है। मुझे दोस्तों से उधार लेना पड़ा। अब मुझे उनको भी तुमसे दोस्ती करने की अनुमति देनी पड़ेगी। तुम्हारे चयन के अधिकार के बढ़ जाने से चिंतित रहने लगा हूँ। चुनाव आयोग की तरह तुम्हारे सख्त व्यवहार का नतीजा किसके पक्ष में जायेगा इसका पता मैं चुनाव पूर्व के शराब वितरण जैसी मशक्कत के बावजूद नहीं जान सकता। चपले, तुम चली गईं। सत्ता की तरह चली जाओगी, नेता की तरह मुझे अंदाज था। जनता जैसा मन है तुम्हारा। मैं अब हिंदी के लेखक की तरह अस्त व्यस्त रहने लगा हूँ। देश के अधकचरे पढ़े लिखे लोगों जैसा मेरा घमंड न जाने कहां चला गया है। अब तो उन्हीं के अंदाज में नये प्रेमियों को समझाने में लगा रहता हूँ। प्रेयसि, फिल्मी लेखक की तरह चोरी की कहानी को अपना कहने लगा हूँ। निर्देशक की तरह उसे आजमाने में लगा हूँ। एक दोस्त की प्रेमिका से मिलने लगा हूँ। वह भी बोर है। जान पड़ता है प्रेम हो ही जायेगा। लेखक प्रेम कहानियां लिख लिख कर बोर नहीं होते। हम लोग प्रेम कर करके। सोचा तुम्हें बता दूँ। कहीं एकदम लौट पड़ीं तो जगह की तंगी का शिकार हो सकते हैं हम लोग। तबादला खा चुके अधिकारी को कोर्ट से स्टे मिल जाने के बाद जैसे दो अधिकारी एक ही कुर्सी पर फंस जाते हैं और ठीक से खा पी नहीं पाने के कारण दुखी रहते हैं वैसे मैं तुम्हें दुखी नहीं देखना चाहता। सांवरी, फेयर क्रीम लगा कर साफ रहना। अपने नये प्रेमी का वजन कम करती रहना। उसे अपने अनुभवों को बताना। साफ साफ बताना, सरकारी बाबुओं जैसी गोलमोल भाषा का इस्तेमाल मत करना। अखबारी संवाददाता की तरह अपने कम ज्ञान पर भी पूरा भरोसा रखना। स्वास्थ्य का ध्यान रखना, साथ वाले का भी। जितना सहन कर सके उसे उतना ही दुख देना।

– संजीव

(यह गुस्ताखी माफ़ से लिया गया हैं।)

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग