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चुनावी महाकुंभ : 2019

Posted On: 28 Mar, 2019 Politics में

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sriankit007

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चुनावी महाकुंभ : 2019

आखिर वो घड़ी आ ही गई, भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने जैसे ही चुनावो की घोषणा कर दी, ऐसा लग रहा जैसे सालाना इम्तिहानों की तिथि घोषित हो गई हो और सारे अभिवावक अपने बच्चो को तैयारी कराने में लगे है और सारे विद्यार्थी ये मानने को तैयार ही नहीं की उनकी तैयारी में कुछ कमी है और वो भी अंदर से उतने ही डरे हुए है।

इस समय देश में सबसे ज्यादा तेजी से कुछ बदल रहा है तो वो नेताओ का पार्टी बदलना। जिस किसी को भी अपने पार्टी से टिकट नहीं मिला वो इस शुभघड़ी में दूसरी पार्टी में जनसेवा करने जा रहा और बेचारी जनता ये समझ के भी नासमझ बनी रहती है कि इन्हें समाजसेवा से ज्यादा अपने राजनीति कैरियर की चिंता है। मुझे बस ये बात समझ नहीं आती कि ये बेचारे समाजसेवको को अपनी अपनी पार्टियों से नफ़रत सिर्फ चुनावों से पहले ही क्यों हो जाती है और ठीक चुनावो से पहले ही क्यों पार्टी बदलते है?और जनता क्यों इतनी लाचार रहती है कि इन्हें पहचानते हुए भी फिर से सर आंखों बैठा लेती है। नतीजा वही पुरानी ढर्रे के लोग, वहीं जर्जर मानसिकता।

पार्टी कोई भी हो उनकी भी मजबूरी होती है उन्हें चुनाव जीतना ही होता है, इसलिए वो उस लोकलुभावन व्यक्ति को टिकेट देने से पहले जरा भी नहीं सोचती जो दूसरी पार्टी से भगाया हुआ या चुनावी टिकट की लालसावस उनकी पार्टी में आया हो। क्यों ना ऐसा नियम बनाया जाता जिससे किसी पार्टी को छोड़ के आया व्यक्ति कम से कम 5 वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ सकता हो तो शायद राजनीति को अपनी बपौती समझने वाले कुछ लोग हमें काम दिखाई देते और किसी भी पार्टी में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले मेहनतकश कार्यकर्ता चुनाव के मैदान में ज्यादा दिखाई देते।

हमारे देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस तो जैसे अधिकांश यूरोपीयन कॉरपोरेट कंपनी की तरह है जहां पर भारतीय सबसे ज्यादा काम करते है,उच्च अधिकारी भी बन सकते है पर कभी भी ‘बोर्ड्स आफ डायरेक्टर’ में नहीं जा सकते क्योंकि वहां पर हक सिर्फ गोरो का होता है, ठीक उसी प्रकार यहां पे एक ही खानदान का है। ऐसी न जाने कितने ही राजनीतिक पार्टियां है जो राजनीति के नाम पर अपना पारिवारिक बिजनेस चला रही और लाचार जनता और समर्थक उनके लिए निशुल्क काम करती रहती है और उनके और उनके परिवार के राजनीतिक भविष्य के लिए अपनों से लडने झगड़ने और कभी कभी तो खून खराबे से भी परहेज नहीं करती।

विरोध की राजनीति कोई नई नहीं है विश्व के लगभग हर देश में ऐसा ही होता है पर कुछ मुद्दे जैसे राष्ट्र की सुरक्षा, राष्ट्रवाद, राष्ट्र की तरक्की, सेना पर इतना विरोध शयाद ही किसी और देश में देखने को मिलता हो। मैंने सुना था कि विपक्ष प्रजातंत्र को मजबूत करता है क्योंकि वो सरकार से सवाल करता है पर जब विपक्ष सवाल के बजाय सिर्फ विरोध करे तो एक बहुत बड़ी समस्या बन जाता है। मुझे तो अपने देश पे उस समय तरस आ रहा था जब पुलवामा हमले के बाद ,भारतीय सेना के पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद पूरी की पूरी पाकिस्तान की संसद इमरान खान के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी होकर भारत को परमाणु हमले कि धमकी दे रही थी और हमारे भारत के बड़े बड़े नेता लोग ये भी मानने को तयार नहीं थे कि भारतीय वायुसेना ने ऐसे स्ट्राइक किया भी है। इससे बड़ी विरोध को राजनीति मैंने कभी नहीं देखी और सुनि जब देश युद्ध की धमकी झेल रहा हो और नेता लोग दुश्मन देश की तरफ से बयान दे रहे थे। शायद अनेकता में एकता के लिए जाने जाना वाला भारतवर्ष का ताज, बटवारे के समय पाकिस्तान को मिल गया।

मुझे तो ,जब 2014 में बीजेपी की सरकार बनी तब समझ आया कि प्रधानमंत्री देश का नहीं होता सिर्फ अपनी पार्टी का होता है क्योंकि वो देश की नीतियों, उन्नतियो और योजनाओं का जिक्र भी नहीं कर सकता है और अगर करता है तो वो इसका चुनावी फायदा उठा रहा होता है,भारतवर्ष में चुनाव हार साल कहीं न कहीं हो रहे होते है, इसका मतलब प्रधानमंत्री या कोई कैबिनेट मंत्री को कभी भी अपने द्वारा किए गए कामों का उल्लेख नहीं करना चाहिए। बात और हस्यपद तब लगती है जब कांग्रेस वर्तमान की सफलताओ का श्रेय पाषाणकाल के नेहरू गांधी परिवार को देने से नहीं चूकती पर वर्तमान का प्रधानमंत्री इसका श्रेय नहीं ले सकता। भारत का हर सरकारी विभाग किसी न किसी मंत्रालय के अंतर्गत आता है और कोई भी विभाग बिना आर्थिक सहायता या राजनीतिक फैसले के बिना कोई करतब नहीं दिखा सकता। या ये कहे कि बिना सरकार की इजाजत के कोई बड़ा कार्य नहीं होता ,पर यही तो राजनीति है यहां सब चलता है और प्रजातंत्र के नाममात्र के राजा यानी जनता जनार्दन को धृतराष्ट्र समझा जाता है।

इस समय सब अपनी मर्जी के नेता और अपने लोगो को चुनाव लड़ता देखना चाहते है, टिकट बटवारा तो भाईयो के जायदाद बटवारे से भी ज्यादा विकट होता है। सवाल ये भी उठता है कि 92 वर्ष के व्यक्ति को टिकट ना देकर उसका अपमान किया जाता है क्योंकि उसने पार्टी बनाई है। ये वही लोग है जो सरकारी नौकरियों में नौजवानों की वकालत करते है पर नेता उन्हें 92 साल का बुजुर्ग चाहिए। 92 वर्ष के व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए पर सिर्फ टिकट देना सम्मान होता है क्या? एक सांसद और विधायक का कार्य होता है जनता के बीच जाना उनकी दिक्कतों को सुनना और उसके अनुरूप कार्य करना यानी स्वस्थ शरीर और तेज़ दिमाग इसकी मुख्य जरूरत है। 92 वर्ष का व्यक्ति अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करते वक़्त 97 वर्ष का हो जाएगा और वो क्या जनता के बीच जाएगा और उनकी परेशानी सुनेगा या अपनी बताएगा ये तो शोध का विषय है। जो इंसान पिछले कई दशकों से चुनाव जीतता आ रहा हो उसकी पार्टी शयाद ही उसका टिकट काटे पर अगर पार्टी उनकी उम्र के हिसाब से ऐसा निर्णय लिया है तो वो मेरी समझ से काबिले तारीफ है।

इस समय एक और मुद्दा बहुत गरम है वो है महागठबंधन। आज से पहले मैंने गठबंधन किसी विशेष छेत्र या राज्य में एक से दो पार्टियों के बीच देखा था पर देशव्यापी महागठबंधन पहली बार देखा है,जहा सारी की सारी मुख्य विपक्षी पार्टियां एक साथ किसी एक व्यक्ति के खिलाफ चुनाव लड़ रही हो। सबसे दिलचस्प ,जो पार्टियां एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी आज वो खुशी-खुशी सबको गले लगा रही है और उनको तारीफ में कसीदे पढ़ रही है ये ही भारतीय राजनीति की सच्चाई है।सबसे हास्यास्पद ये भी है कि साथ में महागठबंधन के नेता लोग ये भी कहने से कतराते नहीं की 2019 में मोदी लहर नहीं है।

खैर चुनावो तक ऐसे अनगिनत नाटक नौटंकी और राजनीति का गिरता स्तर अभी और देखने को मिलेगा पर सबसे ज़रूरी है अपने मताधिकार का प्रयोग करना क्योंकि किसी न किसी की तो सरकार तो बनेगी ही पर सबसे ज़रूरी है पूर्ण बहुमत की सरकार बनने का क्योंकि भारत के इतिहास में जब जब मिली जुली सरकारें बनी है तब तब देश बहुत नुकसान हुआ है ,तरक्की की रफ्तार बहुत धीरे पड़ी है और देश की अर्थव्यवस्था डगमगाई है क्योंकि त्रिशंकु सरकार सिर्फ समझौता कर सकती है निर्णय नहीं।

जय हिन्द।

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