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पुस्तक समीक्षा:शकुन्तला-महाकाव्य

Posted On: 1 Apr, 2015 Others में

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arunakapoor

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यह पुस्तक अभिज्ञान शाकुंतलम के बहुत नजदीक है!

पुस्तक का नाम—– शकुन्तला-महाकाव्य रचनाकार- जयप्रकाश चतुर्वेदी , मो..९९३६९५५८४६, ९४१५२०६२९६ मूल्य-१०० रु.

कवि कालिदास एक अमर कवि है!..इनकी सभी कृतियाँ अमर है…क्या मेघदूत और क्या अभिज्ञान शाकुंतलम!…आज यह पुस्तक शकुंतला-महाकाव्य जब मेरे हाथ आई तब लगा कि यह पुस्तक क्या कवि कालिदास की… अभिज्ञान शाकुंतलम के.. वाकई में गूँज सुनाएगी?…क्या वर्णन करते समय इस पुस्तक के रचयिता युवा रचनाकार श्री.जय प्रकाश चतुर्वेदी, अंत तक कवि कालिदास को जहन में बसाए रखेंगे?…अनेक प्रश्नों की मन में झड़ी लग गई और उत्तरों को जानने के लिए मैंने इस पुस्तक को पढ़ना आरम्भ किया!…यह पुस्तक कुल 9 समुल्लासों में विभाजित है! समुल्लास को आप प्रकरण या चैप्टर कह सकते है..संस्कृत शब्द है!…लेखक ने यहाँ स्वत: ही अपनी योग्यता का परिचय दे दिया कि वे कवि कालिदास के संस्कृत में लिखे गए उपन्यास को अपने शब्दों में अवतरित कर रहे है!..प्रथम समुल्लास में जयप्रकाश जी ने ‘ओम्’ शब्द को स्थान दिया है जो शब्दों का और सृष्टि का जन्मदाता है!…’ओम्’ से आज्ञा लेने के पश्चाद वे आगे बढ़ रहे है!इसी समुल्लास में इन्होने कणव् ऋषि का आश्रम, उन्हें पिता तुल्य समझने वाली लाडली शकुंतला और आश्रम की प्रमुख आदरणीय कर्ताधर्ता स्त्री गौतमी.. इत्यादि पात्र परिचय करवाया है!…पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इससे नजर या ध्यान हटाना नामुमकीन सा हो जाता है!
शेर,चीतें, हाथी,घोड़े,हिरण…इत्यादि सभी प्राणी भी अत्यंत महत्वपूर्ण होने की बात दर्शाई गई है!..पेड़, पौधे और फूल भी यहाँ महत्वपूर्ण है!मालिनी नदी भी अहम भूमिकामें है…इसी नदी के किनारे कणव् ऋषि का आश्रम स्थित है!

..आगे चलते हुए एक के बाद एक समुल्लास को पढते जाइए…यहाँ हर व्यक्ति और चीजों का वैसाही वर्णन परोसा गया है जो कविदास की कृति में मिलता है!…जयप्रकाश जी ने बहुत ही सहज भाषा का प्रयोग इस महाकाव्य में किया है!..हस्तिनापुरी के महाराजा दुष्यन्त का आगमन जब कणव् ऋषि के आश्रम में होता है, उसका वर्णन अद्वितीय है!..जब शकुंतला और दुष्यन्त एक दूजे को प्रथम दृष्टि से देखते है…तब उनके मन में उठने वाले भावों का वर्णन जयप्रकाश जी ने बहुत कुशलता पूर्वक किया है!..फिर राजा दुष्यन्त का अपनी नगरी में वापस जाना और हरदम शकुंतला के बारे में ही सोचते रहना अवर्णनीय है!..उधर शकुन्तला के मन का जो हाल है, उसे भी रचयिता ने अपनी कलम से,उतनी ही सुन्दरता से उकेरा है!…फिर मिलन की घड़ी आती है!…दुष्यन्त और शकुंतला क मिलन और आश्रम में कणव् ऋषि की गैर हाजिरी में विवाह होने की कथा का वर्णन रचयिता ने बखूबी किया है!…शकुन्तला के पेट में गर्भ का पलना, शकुंतला का हस्तिनापुरी प्रयाण और ऐसे में राजा दुष्यंत द्वारा उसे भुलाया जाना…विकट परिस्थिति का दर्दनाक वर्णन!

…..पढ़ कर लगा कि स्त्रियों का पुरुषों द्वारा तिरस्कृत होना, कवि कालिदास के जमाने में भी होता रहता था और आज के जमाने में भी हो रहा है!..शकुंतला का उदाहरण सामने है!..जयप्रकाश जी ने इतनी सुंदर रचना को अपने द्वारा कविता में ढाला है!…बहुत सुंदर प्रयास है!..अंत भला तो सब भला!…दुष्यंत और शकुन्तला का मिलन होता है!..अब पुत्र सर्वदमन भी है!..अब चौतरफ़ आनद ही आनंद है!…इस स्वर्गीय आनंद का वर्णन भी जयप्रकाश जी ने बखूबी किया है!…कवि कालिदास की कृति को अपने शब्दों में और काव्य विधामें ढालना साहसिक कार्य है…जो जय प्रकाश जी ने सहजतासे किया है!

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