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शिक्षक दिवस ,शिक्षा और भारत

Posted On: 5 Sep, 2013 Others में

अनुभूतिJust another Jagranjunction Blogs weblog

arunchaturvedi

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आज शिक्षक दिवस है ,जो भारत के महान शिक्षाविद् ,दार्शनिक ,पूर्व राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद मेँ मनाया जाता है।
डा. राधाकृष्णन के अनुसार –
शिक्षा से मनुष्य अपने मष्तिष्क का सही सदुपयोग करना सीखता है।
अर्थात् अशिक्षित मनुष्य और अशिक्षित राष्ट्र का कोई भविष्य नहीँ होता है और सही मायने मे शिक्षित मनुष्य ,शिक्षा द्वारा अपने मन -मष्तिष्क को पूर्णतया जाग्रत करके विपरीत परिस्थितियोँ को अपनी इच्छानुसार परिवर्तित कर लेता है।
अतः शिक्षा ही वह माध्यम है जो मनुष्य को उसका हक दिलाती है,पशुत्व से देवत्व की ओर ले जाती है, और सही मायने मेँ मनुष्य को मनुष्य बनाती है।
भारतीय संस्कृति के सिध्दान्तोँ के अनुसार
मनुष्य के अंदर ही देवत्व और असुरत्व दोनोँ गुण विद्यमान है ,और जो शक्ति ,मनुष्य को असुरत्व से देवत्व की ओर ले जाती है ,अँधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है वही गुरु या शिक्षक है।वह शक्ति मनुष्य , पशु -पक्षी ,जड़ -चेतन. या कोई भी हो सकता है जो हमेँ सच्चा ज्ञान प्रदान करता है
लेकिन साथ मे यह भी तय है कि बिना गुरु के ज्ञान सम्भव नहीँ है।
बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त करना वैसे ही असम्भव है जैसे
सीमेण्ट ,सरिया ,और पानी के बिना केवल रेत से महल बनाना ।
यानी बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है,गुरु की महिमा अवर्णनीय है , गुरु की शक्ति अनंत है तभी तो भारतीय संस्कृति ने हजारो वर्षो पहले ही गुरु को ब्रह्रमा .विष्णु, और महेश से उँची पदवी देते हुए साक्षात परमेश्वर ही माना है ,
कबीरदास ने गुरु का दर्जा परमेश्वर से भी ऊपर माना है।
अर्थात् जो गुरु या शिक्षक हमारे अन्तरतम मेँ पसरे हुए अँधकार को मिटाकर हमेँ ज्योर्तिमय कर देता है,और परमात्मा से साक्षात्कार करा देता है वास्तव मेँ वह गुरु परमात्मा से भी बढकर होता है।
शिक्षक या गुरु का पद जितना महत्वपूर्ण होता है उतना ही जिम्मदारियोँ से भी भरा होता है
शिष्य की असफलता केवल शिष्य की हार नहीँ होती बल्कि शिक्षक भी शिष्य के साथ -साथ पराजित होता है
महागुरु कौटिल्य की शिक्षा ने साधारण से बालक चन्द्रगुप्त मौर्य को विशाल भारत का एकछत्र सम्राट बना दिया ,और गुरु रामदास ने
शिवाजी को छत्रपति शिवाजी बना दिया ।यह सब कुछ गुरु की कृपा से ही सम्भव हुआ।
जहाँ राम स्वयं ईश्वर के अवतार थे और सोलह कलाओँ के स्वामी ,परन्तु उन्हेँ भी अपने स्वर्णजड़ित राजमहल को छोड़कर ज्ञानार्जन के लिए
विश्वामित्र के आश्रम मे जाना ही पड़ा ,और ईश्वर के सम्पूर्ण अवतार कृष्ण को ज्ञान के लिए संदीपनि के गुरुकुल मेँ रहना पड़ा।
अत: गुरु की महिमा अवर्णनीय
है
गुरु और शिष्य के बीच एक अटूट् सम्बन्ध होता है ,गुरु और शिष्य के बीच का रिश्ता श्रध्दा और विश्वास पर टिका होता है और गुरु उचित समय ,और शिष्य की पात्रता देखकर उसे ज्ञान प्रदान करता है।
योग्य और त्यागी शिक्षकोँ तथा श्रध्दा ,विश्वास से युक्त ,गुरु के
एक इशारे पर अपना सर्वस्व निछावर करने वाले शिष्योँ के कारण ही भारत कभी विश्वगुरु के पद पर आसीन रहा ,और इन्हीँ तेजस्वी गुरुओँ ने अपने ज्ञान ,त्याग ,तेज ,साहस और विचारोँ के तेज से पूरी दुनियाँ को चकित कर दिया था. सिकन्दर जैसे विश्वविजयी सम्राट को यह स्वीकार करना पड़ा कि भारत भूमि योग्य और तेजस्वी शिक्षकोँ की भूमि है
मेगस्थनीज ने इण्डिका नामक पुस्तक मेँ लिखा है कि भारत के प्रत्येक शिक्षक और गुरु अरस्तू और सुकरात के समान ज्ञानी है जो अध्यात्म, धर्म ,विज्ञान,इतिहास ,भूगोल और गणित के प्रकाण्ड विद्वान है।
इस तरह से भारतीय गुरुओँ और उनके तेजस्वी शिष्योँ ने
अपने ज्ञान ,बुध्दि और बल से कभी दुनियाँ को गणित ,विज्ञान ,अध्यात्म ,वेदोँ का ज्ञान सिखाया ,कभी युध्द कौशल और व्यूहरचना का ढ़ँग बताया।और कभी गीता जी का कर्मवाद का ज्ञान सम्पूर्ण विश्व को जाग्रत किया ।
परन्तु कालान्तर मे हजारोँ वर्षो के मुगलोँ और अँग्रेजोँ की गुलामी के फलस्वरुप हम अपनी उस गौरवशाली अतीत की समृध्दशाली गुरु -शिष्य की परम्परा को भूल ही गए ।और बार बार विदेशी शासकोँ के मुँह से अपनी परम्पराओँ
और शिक्षकोँ पर लगाये गये झूठे आरोपोँ को सच समझकर गुरु शिष्य परम्परा को छोड़कर पश्चिमी सभ्यता की तरफ आकृष्ट हुए।और बाद मेँ कुछ नकली बाबाओँ ने जो पश्चिम की भोगवादी संस्कृति का अनुसरण करते हुए त्यागमयी गुरु शिष्य परम्परा को कमजोर किया।
लेकिन उसी परम्परा के अग्रदूत रामकृष्ण के अनुयायी विवेकानंद ने पश्चिमी सभ्यता के गढ़ अमेरिका मे जाकर अपना झण्डा गाड़ा।
और भारत के गुरुओँ के बताए
मार्ग की सत्यता का प्रचार किया।
आज भारत मेँ पश्चिमी सभ्यता का बोलबाला है।
शिक्षा का उद्देश्य जनकल्याण और व्यक्तित्व विकास न होकर ,शिक्षा व्यवसाय बन गई है।योग्य छात्र शिक्षा से वंचित हो रहे है । शिक्षा और शिक्षक बाजार के कब्जे मेँ तड़पड़ा रहे है।शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से शिक्षा माफिया के घेरे मेँ है।प्राइवेट कोचिंग संस्थानोँ की बाढ़ सी आयी हुई है ।गरीब घरोँ के बच्चे बीच मेँ ही पढ़ाई छोड़ रहे है।
परन्तु इन सब विपरीत और बिषम परिस्थितियोँ के बावजूद भी कुछ ऐसे लोग भी है जो हमेँ उम्मीद की किरण दिखा रहे हैँ चाहे टीन और कंक्रीट की छत के नीचे पढ़ाने वाले सुपर -30 के आयोजक आनंद जी हो या गरीबोँ की बस्तियोँ मे शिक्षा की अलख जगाने वाली स्वयंसेवी संस्थायेँ।जो भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था की याद दिलाती है।और वे गरीब परिवारोँ के बच्चे जो तमाम विसंगतियोँ और मुश्किल परिस्थितियोँ के बावजूद कर्ण और एकलव्य की तरह अपने जुझारुपन,हौसले और मेहनत की ताकत से आखिरकार कामयाबी का झण्डा गाड़ ही देते है।
तमाम विरोधाभासोँ और चुनौतियोँ के बाद भी इन घटनाओँ से उम्मीद की किरण नजर आती है।और गरीब परिवारोँ के बच्चोँ की पढ़ने की ललक ,ऊँचा उठने की ख्वाहिश से ऐसा लगता है कि
भारत का आने वाला कल अवश्य ही सुनहरा होगा।
औरवह दिन दूर नहीँ जब हम एक बार फिर से विश्वगुरु के पद पर आसीन होँगे।
और तभी जाकर हम राधाकृष्णन.विवेकानंद के सपनोँ के भारत का निर्माण कर सकते है।

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