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रुबाई

Posted On: 23 Jan, 2015 Others में

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अरुण

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रुबाई
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जब तलक ना आग लग जाती… न छिड़ जाती लड़ाई
तब तलक ना साथ आकर क़ौम…..’मन’ पर सोच पाई
सब के सब ……….अपनी ही अपनी दास्ताँ में गुम हुए
ना कभी इंसानियत की………. ..चेतना की समझ पाई
– अरुण

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