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कल था कुछ आज कुछ बनने चला हूँ।।

Posted On: 13 May, 2015 Others में

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arvindrairai

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अपनी कल्पनाओ को हकीकत मे बुनने चला हूँ।
कल था कुछ आज कुछ बनने चला हूँ।।
है राह नई मंजिल नई
जानता हूँ मार्ग पर कठिनाई कई
पर सरलता से न मिले अपना तो धय्ये वही
माना अब धरती पसीजती नहीं
आकाश छाँव देता नहीं
नयन से नीर बहता नहीं
पर सच है
मै बांध कल्पनाओ के पर गगन मे बिचरने चला हूँ
कल था कुछ आज कुछ बनने चला हूँ।।

…………………………अरविन्द राय

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