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चुनावी घोषणापत्रों से--

Posted On: 9 Apr, 2019 Politics में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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चुनावपूर्व विभिन्न दलों को जनता के समक्ष अपने वे इरादे रखने होते हैं जिन्हें जीत हासिल होने के पश्चात वे कार्यान्वित करना चाहते हैं। ये घोषणापत्र हैं  जिनमे वे अपने संकल्प प्रगट करते हैं।अबतक दो महत्वपूर्ण धोषणापत्र जनता केसम्मुख आ चुके हैं ,जोअपने अपने तरीके से मतदाताओं के विभिन्न वर्गों को आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।सबसे अधिक आकर्षक  72 हजार की राशि गरीबों के खाते में प्रतिवर्ष डाले जाने की है। कोई शर्त नहीं  । अगर खाते सबके पहले खुल गये होते और यह योजना काँग्रेस कै द्वारा पहले लायी गयी होती तो लाख कमियेो के बावजूद भी सामाजिक न्याय की ओर वह काफी बढ़ गयी होती, चाहे मध्यम वर्ग टैक्सोंं के भार से लद ही क्यों न  जाता। किन्तु अब यह सहायता उपर से थोपी सहायता होगी और मध्यम बौद्धिक वर्ग इसे कभी उचित नहीं मान सकता।उपर से यह सहायता अगर थोपी न जाय और गरीब जनता कोउसे प्राप्त करने योग्य बना दिया जाय तो यह उसे सशक्त करने का कार्य होगा।

मेरी दृष्टि एक सामान्य देशवासी कीद़ष्टि है। देशहित को जनहित से जोड़ते हुए जो कुछ समझ में आता है उसी ओर इंगित करने का यह प्रयास है।

अन्त्योदय के कार्यक्रम विभिन्न नामों से सदैव ही लागू करने के प्रयास किए जाते रहे हैं,पर उसके लिए किए गये प्रयत्न थोपे हुए से लगते हैं।अगर राशन अत्यधिक कम मूल्य पर दिए जाते हैं तो यह ,सुविचार हो सकता है पर72 हजार का वादा साल भर मेंवेने का अनायास कर देना  लोगों को अकर्मण्य बना देना है,काम न करके भी जीवनयापन की सुविधा प्रदान कर देना है। विकलांगों को अशक्तों के लिये तो फिर भी विचारणीय है।इसकी जगह कार्य करने की प्रेरणा देने,आत्मविश्वास पैदा करने और स्वावलम्बी बनाने की योजना होनी चाहिए।जनता तभी विकासोन्मुख होगी।गरीबों का सशक्तिकरण भी तभी होगा।हाँ उनके खाने की मोहताजगी दूर होनी आवश्यक है पर अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति  जिससे वे अपने जीवन स्तर को सुधार सकें, के लिए उनमें मनोबल भरने की आवश्यकता है।स्वरोजगार के लिए पकौड़े बेचने जैसी योजना,छिपकर शराब बनाने और बेचने से तो भली होती है।नैतिकता और स्वावलम्बन दोनों ही भरना प्राथमिक योजना होनी चाहिए।

यह सही है कि हमारे देश मेंअभी भी वर्गभेद की एक समस्या है जिसे मेटने के प्रयास  करने का दावा सभी करना चाहते हैं।धनी और निर्धनों के बीच बड़ी खाई है ।पर निर्धनों को अमीर बनाने के लिए उनके घरों अथवा बैंक खातों को अनायास नोटों से भर देना  एक बार तो फिर भी सह्य होगा परन्तु प्रतिवर्ष ऐसा करनाउनके चारित्रिक गुणों केह्रास का ही कारण बनेगा। हाँ, वे जो स्वयं इस खाई को पाटने को प्रयत्नशील हैं उन्हें सहारा देना उनके आत्मविश्वास को बढ़ाना एवम स्वाभिमान की रक्षा करने की अवश्य जरूरत है

वास्तव में इसके लिए जन आंदोलन और जागरुकता की आवश्यकता है,दयादृष्टि की नहीं।।गरीबों और दलितों के उत्थान के लिए उनमें आगे बढ़ने की प्रेरणादेनी होगी।

कर्ज न चुकाने का न्यायिक प्रावधान किसानों मे स्वेच्छाचारिता, कर्तव्यहीनता की भावना भी भर रहा है। क्या यह सरलता से नहीं समझा जा सकता कि इसका वे कितना अनुचित लाभ उठा सकते हैं? और अगर यह दंडनीय अपराध नहीं  , तो कोई कर्ज चुकाने को विवश ही क्यों हो।कर्ज माफी कृषक समस्या का विकल्प हो ही नहीं सकता।यह तो उन्हें पंगु बना देने के समान है।भाजपा नेभी एक लाख तक के कृषि लोन पर पाँच सालों तक व्याज न जुड़ने की बात की है। यह एक हद तक व्यावहारिक प्रतीत होती है।

काँग्रेस की घोषणा ओं मे एक आकर्षक घोषणा ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर है।ग्रामीण अस्पतालों मे सब तरह की स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध कराना आवश्यक है ताकि पैसों का पिटारा लेकर  ग्रामीण जनता को शहरों तक दौड़ना न पड़े।यह एक ऐसी आवश्यकता है जिससे कोई सरकार मुँह मोड़ नहीं सकती।किन्तु एक सर्व सुविधायुक्त सरकारी अस्पताल का  ग्राम या पंचायत स्तर तक में भी खुलना और उसका सही प्रबंधन कर सकना- यह  सरल नहीं है। रंग रोगन तक के आकर्षण को बनाए रखना  भी संभव नहीं होता । ऐसे वादों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है। कुछ आगे बढ़कर भाजपा ने भी  हर गरीब के घरतक स्वास्थ्य सेवा पहुँचाने की बात कही है।स्वास्थ्य सेवा का  अर्थ अस्पष्ट है।चलंत अस्पताल विकसित देशं की विशेषता हो सकती है।अथवा हर घर केलिए छोटी छोटी सेवाएँ यथा-समय पर टीकाकरण कुछ प्रचलित रोगों के लिए दवाओं का वितरणआदि ऐसे प्रयत्न हैं जो ग्राम सहियाओं द्वारा किए जाते हैं। हर 1400 लोगों पर एक डॉक्टर का अनुपात बनाने का संकल्प अगर विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लिए गये हों तो यह एक अच्छी बात हो सकती है पर कहाँ और कैसे प्रश्न तब भी बना रहेगा। इसके अतिरिक्त जो वादे हैं वे विभिन्न कालेजों में सीटें बढ़ाने और मेडिकल ,इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापनाओं से जुड़ी हैं जिनके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं ।सम्पूर्ण घोषणापत्र राष्ट्र वादी भावनाओं को दिखाती है।काँग्रेस के अलग किसान बजट के तर्ज पर भाजपा जल शक्ति मंत्रालय का निर्माण कर राजस्थान की जल समस्या को हल करने की बात सोचती है।यह एक अच्छा कदम होगा। वह कुछ अन्य सशक्त कदम उठाना चाहती है जिसकी माँग लगातार की जाती रही है पर पाँच वर्ष की अवधि जिसके लिए अपर्याप्त रही और शायद सत्ता मोह को त्यागकर  अब जिसे वह पूरा करना चाहेगी,यथाधारा 370 और 35ए को हटाने का वादा, यूनिफार्म सिविल कोड और   नागरिकता संशोधन बिल आदि विषय हैं। राष्ट्रवाद की ये अभिव्यक्तियाँ हैं । इनकी सम्भाव्यता समय की शिला पर ही परखी जाएगी।   तीन तलाक पर कानून बनाना फिर मुस्लिम महिलाओं का वोट पाने का जरिया हो सकता है।

किन्तु इसके ठीक उलट काँग्रेस ने जिस खुलेपन का परिचय दिया है ,अभिव्यक्ति की आजादी की हद तकजाकर वह देशद्रोहियों का साथ देता हुआ प्रतीत होता है।देशद्रोह कानून को खत्म करने का वादा ऐसा ही है। कश्मीरियों को अधिक खुला माहौल प्रदान करने के उद्येश्य से AFSPA जैसे कानून को खत्म कर वेपुनः सेना का मनोबल न कहीं तोड़ दें।   यह नीति कही पाक की नीयत को न शह दे दे। वैसे मनोवैज्ञानिक पहुँच यहाँ भी है पर कहीं यह विपरीत प्रभाव न डाले भय इसका है। एक बात तो स्पष्ट है कि वहाँ आतंक से छुटकारा पाने के लिए भय प्रदर्शन की आवश्यकता भी है।  वैसे कश्मीर की नीतियों मे पुनः परिवर्तनजन्य प्रयोग का काँग्रेस आकांक्षी है।मुस्लिम पुरुषों को आकर्षित करने के लिए उसने तीन तलाक बिल नहीं लाने की बात की है।

अन्य सभी दलों ने अपने घोषणापत्र जारी किए ही होंगे पर जनता की दृष्टि जिन दो प्रमुख दलों पर टिकी है उनके घोषणापत्रों मे किसे जनता अपना विश्वास देती है यह कुछ दिनों के लिए तो अवश्य ही भविष्य के गर्भ में है।

 

आशा सहाय9-4-2019

 

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