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डगर इतनी आसान नहीं।

Posted On: 23 Dec, 2017 Others में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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कतिपय बातें जो अभी गुजरात और हिमाचल चुनावों के पश्चात चर्चा मेंहैं वे सार्थक प्रतीत हो रही हैं । एक तो यह किविजय की राह पर चल रही भाजपा को मद प्रमत्त नहीं होना चाहिए।क्यों कि विरोधी पक्ष काँग्रेस दरवाजे पर जोरदार दस्तक देने को अग्रसर है। स्वयं को उबारने को प्रयत्नशील। वह ऐसी जगह प्रहार करने को उद्यत हैजहाँ बी जे पी को कोई सही राह नहीं सूझती।लाख स्वच्छ भारत मिशन, डिजिटल इंडिया आदि के नारे, जी एसटी ,विमुद्रीकरण की सफलता की चर्चा वह कर ले ,यह बताने को भी उद्यत होकि इनसे मतदान प्रभावित नहीं हुआ और लोगों ने इसे ज्यों का त्यों स्वीकार करने का मन बना लिया है,यह पूर्ण सत्य तो नहीं ही है।सुगबुगाहट हर कहीं है। अभी भी हर कहीं वेलोग जो विमुद्री करण की मार से सताए हुए हैं,दूसरी राह निरंतर ढूँढ़ रहे हैं।कहीं न कहीं उनके मन में यह ईच्छा पल रही हैकि विगत शासन व्यवस्था जैसी ही कोई अंधी शासन व्यवस्था उनके अनुकूल है।यह मानसिकता अभी भी मतदान में व्यक्त होने को आतुर है।जी एस टी की व्वस्था अभी भी लोगों में बहुत स्पष्ट नहीं हुई है। स्पष्ट होने में थोड़ा और समय लगेगा ही ।हमें यह नहीं भूलना चाहिए किगाँवों में रहनेवाली अधिकतम जनता इन फंदों में फंसने से बचना चाहती है।हर बड़ी सरकारी सुविधाओं में जुड़ीआधार कार्ड की अनिवार्यता ,और उसकी जटिलताओं से वे बचना चाहते हैं। राशन लेने हेतु कतारों मे खड़े लोगों में वे चेहरे भी मिलते हैं जिनपर वयोवृद्धता के निशान होते हैं ,वे परिवार के मुखिया होते हैं अँगूठे और ऊँगलियों की पहचान देने के बाद ही जिन्हें राशन मिलता है,जो अक्षम हैं । पहले कार्ड भेजने मात्र से जिन्हें राशन मिल जाया करता था, उनके मुँह सेथोड़ी प्रशंसा पहले की व्यवस्था की हो ही जाती। यह सच है कि सबको खुश करना आसान नहीं फिर भी एक विकल्प की सदा आवश्यकता है।काँग्रेस द्वारा दी गई छूटें अवश्य ही भ्रष्टाचार को जन्म देती रहीं पर लोगों को वह ग्राह्य था। भय बिन प्रीति नहीं तर्क के आधार परवर्तमान सत्तासीन पार्टी के द्वारा की गयी कड़ाई उस दिशा में आवश्यक थी.आवश्यक है पर जनताके मन के असंतुलित होने का भी भय है।जनता मध्यम मार्ग खोजती है।

—स्वच्छता कार्यक्रम को लागू करने के लिए जो कदम उठाए गए वे आवश्यक थे , और यह सत्तासीन सरकार के महत्वाकाँक्षी कार्यक्रमोंमे सर्वोपरि स्थान रख रहा था ।. शौचालय आदि निर्माण से सम्बन्धित प्रक्रियाएँ उस दिशा के सही कदम हैं।पर सही ढंग से हर जगह कार्यान्वयन का नहीं होना ,ईंट गारे गड्ढे आदि का सही नहीं होना ग्रामीण जनता में पुनः प्राचीन अविश्वास का भाव भरती हैं । यानि की सही , व्यवस्था का अभाव इस दिशा में सोचने को विवश करते हैं।शौचालय का प्रयोग न करने वालों को दंड भरने का भय है पर इन्हें पकड़े और कार्रवाई करने का कार्य करना इतना सहज नहीं।सबसे बड़ी बात है कि निम्न जीवनस्तर में जीनेवालों को ये बातें बेमानी लगती हैं।जीवन यापनकेमार्ग में अतिरिक्त बोझ के समान लगती हैं। यह बात शत प्रतिशत नहीं तो आंशिक सत्य तो है ही। यह आंशिकता भी जनमत का निर्माण करती ही हैं।ग्रामीण जीवन स्तर में आर्थिक सुधार के बाद ही उपरोक्त विषय उनके अनुकूल हो सकेंगे।

—-हलाँ किसुधार हर स्तर पर देखने को मिल रहे हैं। ग्रामीण रास्तों पर अभी नाक बंद कर चलने की आवशस्यकता महसूस नहीं होती।किन्तु ऩगर परिषद् द्वारा लगाए गए तत्सम्बन्धित सूचनापट्ट को फाड़कर फेंक देने मेंमैने इनके विरोधप्रदर्शन को देखा।. एसस टी से बचने के लिएअब  भी दुकानदार मनमाने ढंग से कैश लेते हैं।कैशविहीन खरीददारी को स्पष्ट रूप से नकार देते हैं।बेचारा ग्राहक करे भी तो क्या। सबमें सख्ती करने की क्षमता नहीं होती।.इन सब क्षेत्रों में निरंतर पर्यवेक्षण की आवश्यता होती है।ऐसे लोगों की मानसिकता अभी भी पुरानी व्यवस्था के पुनर्स्थापन के प्रति व्याकुल है।अतः ग्रामीण व्यवस्था को अनुकूल बनाने की आवश्यकता है।

———गुजरात में भी ग्रामीण समाज ने भाजपा की विजय में भरपूर सहायता नहीं की।कृषक अधिक सहायता प्राप्त करना चाहते हैं।विपक्ष उन्हें उकसा भी रहाहै कि भाजपा की नीति कृषकविरोधी है- इस प्रकार उन्हें अपनी ओर करने की चेष्टा रँग ला सकती है।। ऐसे भी कृषक भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।शीघ्रतातिशीघ्र कृषि उत्पादन में उनकी मदद करना, उत्पादित कृषि को सही मूल्य देना, बिचौलियों से उनकी रक्षा करना जमीन की गुणवत्ता के आधार पर कषिकार्य का प्रशिक्षण देना, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयत्न करना ताकि वे ऋण चुकाने में समर्थ हों, पर किसी अन्य प्रयोजन से उनकी जमीन न ली जाए यह भी देखना आवश्यक है।। कर्ज का भार हलका कर देना आवश्यक है पर मात्र इससे सामान्य कृषक वर्ग खुश नहीं होता।मध्यम कोटि का कृषक वर्ग जिसे कम जमीन में भरपूर उत्पादन चाहिए,वैज्ञानिक खेती चाहिए,उसके लिए सिर्फ सरकारी घोषणाएं नहीं वरन् जमीनी स्तरपर किए गए प्रयत्न करने होंगे। हम उन्हें रुष्ट नहीं कर सकते।उन्हें तो इस योग्य बनाना है कि उत्पादित फसल पर वेअपने कर्ज की भरपायी स्वयं कर स्वाभिमान का जीवन जी सकें।उन्हे बार बार कर्ज माफी के द्वारा लंगड़ा और लूला बना देने की जरूरत नहीं

————-दूसरी महत्वपूर्ण बात जो सदैव हिन्दुत्व से जुड़ी हैऔर निरंतर चर्चा में है कि भारत के हिन्दू हमेशा प्रगतिशील रहना चाहते हैं।अब वे वापस मुड़कर देखना नहीं चाहते।वे हिन्दु तोबने रहना चाहते हैं दूसरा धर्म उन्हें सहज स्वीकार नहीं।पर एक उदार हिन्दू बनना उनका काम्य हैजिसपर हिन्दुत्व के किसी सिद्धान्त का दबाव नहीं बनाया जाए।वस्तुतः यह सही चिन्तन है।इस प्रकार दबावहीन हिन्दू समाज ही धर्म परिवर्तन से बचा रह सकता है साथ ही अपने समाज में वृद्धि भी कर सकता है।अतः किसी तरह से उन्हें अपने प्राचीन स्वरूप की याद दिला सहस्त्रों वर्ष पीछे ले जाना बेमानी है।ऐसी सावधानी तो बरतनी ही होगी।हिन्दुत्व की परिभाषा में उदारता सदैव जुड़ी होनी चाहिए।वस्तुतः वही उसका ऐतिहासिक सत्य भी है।निर्बाध प्रवाह के लिए दबावों के चट्टानों से उसे मुक्त रखना होगा।

———-अभी तो लोक सभा चुनाव बाकीहै । उसका शक्तिपरीक्षण सबों से अलग होगा। राज्योंके चुनाव परिणामउसके परिणामों को तय कर सकेंगे कि नहीं ,सही सही कहना कठिन है। संघर्ष जारी है। सीबी आई के विशेष न्यायालय द्वारा लालू यादव को चारा घोटाले का दोषी करार देने पर विपक्ष की अवश्य ही हानि हो सकती हैपर लालू यादव की मुखरता भी अवश्य बढ़ेगी।निष्कर्षतः यह कहने में हानि नहीं कि डगर किसी की भी इतनी आसान नहीं।

आशा सहाय—23 –12 2017।

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