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दलित शब्द का प्रयोग, जिम्मेदारी मीडिया की भी

Posted On: 13 Jun, 2018 Common Man Issues में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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सभवतःसूचना और प्रसारण मंत्रालय प्रेस कौंसिल ऑफ इन्डिया पर यह निर्णय लेने का भार छोड़ा है कि मीडिया दलित शब्द का प्रयोग करे  या नहीं।वस्तुतः  यह  एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी उनके कन्धों पर डाली गयी है। अनुसूचित जिन जातियों के लिए दलित शब्द का प्रयोग मीडिया करती आयी हैउसे अपने शब्दकोश से निकाल देने का फैसला अगर वह करती है तो देशहित में उठाया हुआ यह बहुत बड़ा कदम होगा। आज दलित शब्द का  प्रयोग राजनीतिक उद्येश्यों से किया जाता रहा  है,ताकि एक सामाजिक अथवा राजनीतिक वर्ग  विशेष पर मानसिक दबाव बना रह सके। और उस जातिवर्ग विशेष के मन में आत्मसहानुभूति का भाव पैदा कर सके।जहाँ तक उपलब्धियों का प्रश्न है,समान सुविधाप्राप्तियों का प्रश्न है, आज कोई इस भावना से पीड़ित नहीं है।यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसे बनाए रखने के लिए कुछ राजनीतिक दल -विशेष विशेष रूप से सक्रिय हैं ताकि उनके समर्थन का लाभ उनको मिल सके।

 

 

 

 

मीडिया अपने  किसी भी स्वरूप में लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।उसके द्वारा उद् घाटित  विषय ही जनता  तक पहुँच पाते हैं।उसकी जिम्मेदारी जनमत का निर्माण ,असत्य का भेदनऔर देश को दुरभिसन्धियों से बचाना भी है।यद्यपि आज मीडिया अपने इस उत्तदायित्व का निर्वाह सम्पूर्ण रूप से कर रही अथवा नहीं यह एक पृथक विवेच्य विषय हो सकता है ,किन्तु उसका यह महत्तर कर्तव्य उससे जुड़ा अवश्य है।दलित शब्द ऐसी ही  दुरभिसन्धि का विषय बनता जा रहा हैजिसकी आड़में राजनीति खुल कर छद्म खेल खेलने का यत्न करती रहती है।अतः इस शब्द को वे अपने प्रयोग से अलग करना चाहें तो निश्चय ही स्वागतयोग्य कदम होगा।

 

अनुसूचित जातियों के पारंपरिक कार्य और उनका अशिक्षित होना दूसरी जातियों की दृष्टि में उनकी श्रेष्ठता और निकृष्टता का पैमाना बन गया। चमड़े का काम, कपड़े धोने का काम ,मैला उठाने और ढोने का काम , चांडालगिरी आदि ने समाज के दूसरे वर्गों के मन में गंदगी और मलिनता को दृष्टि में रखते हुएउनके प्रति दूरी एवं अस्पृश्यता के भाव का सृजन किया। एक हीनदृष्टि बनी।स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सदियों से पलती हुई इस दृष्टि को समाप्त करने के लिए समान हक और समान सुविधाएँ देने के समानता के सिद्धाँत को संविधान में प्रवेश कराकर संविधान निर्माताओं नेइस कोटि को धीरे धीरे मुख्य सामाजिक धारा में सम्मिलित करने की योजना बनायी थी पर ओछी राजनीति ने इसे बनाए रखने में ही अपनी भलाई देखी।राजनीति का वोट बैंक इसके लिए जिम्मेदार बन गया।वोट बैंक की इस राजनीति को तोड़ने का संकल्प अगर मीडिया लेती है तो भारतीय समाज का महा उपकार होगा।इन जातियों के मन मेंप्रविष्ट मनोविकार भी धीरे धीरे धुल जाएँगे।

 

स्वतंत्रतापूर्व की इनकी स्थितियों को देखते हुए गाँधी जी ने इन्हें हरिजन की संज्ञा दी थी।यहउन्हें विशेष सम्मान दिला सकेगा ,ऐसी धारणा थी।पर दुर्भाग्य से यह शब्द भी उनमें कोई सम्मान की भावना नहीं भर सका ।इनदोनो को ही व्यावहारिक शब्दकोष से निकाल देना ही इनमें आत्मसम्मान की भावना पैदा कर सकता है।

 

इन्हें हरिजन व दलित संज्ञा देना जातिवर्ग-संघर्ष को कायम रखने की एक साजिश सी प्रतीत होती है।इस साजिश को समाप्त करने के लिए मीडिया को ही सामने आना होगाअन्यथा हर चुनाव के पहले राजनीतिक रंगमंच परइन साजिशों का खुला मंचन किया जाता रहेगा। उपरोक्त सोच समस्या के एक ही पक्ष को प्रदर्शित करती है जो मीडिया से जुड़ी है। वस्तुतः दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है,जो उन बाकी जातियों की उस मनःस्थिति से जुड़ी हैं जो सदियों बाद आज भी पूर्णतः बदल नहीं सकीहै । इस मानसिकता को भी बदलने के लिए इस शब्द का बहिष्कार करना आवश्यक है।उन्हे दलित मत कहें। यह जिम्मेदारी भी मीडिया की ही होगी।

 

 

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