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नारी मर्यादा और विकास

Posted On: 7 Aug, 2015 Others में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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उक्त विषय पर दृष्टि डालते ही मन में एक प्रश्न खड़ा हो जाता है कि यह विषय देश काल सापेक्ष है या निरपेक्ष । इसे किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।इसका आकलन निरा जीव वैज्ञानिक स्तर पर हो या किसभ्यता के विकास के साथ बदलती देश और विदेश की स्थितियों के वैचारिक स्तर पर।
निश्चय ही यह विषय देशकाल केपरिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए क्योंकि जैविक स्तर पर नारी और पुरुष लिगभेद से सम्बन्धित असमानता केअतिरिक्त व्यक्तिगत कार्यक्षमताओं में किसी प्रकार असमान नहीं रहे।हाँ,शारीरिक शक्तिभेद उनमें अवश्य रहा।अपने आदिम स्वरूप मेंदोनों एक दूसरे के समान अथवा पूरक ही रहे।धीरे –धीरेएक सामाजिक संरचना के तहत नारियों की सहभागिता बढ़ती गयी।पुरुष शिकार में व्यस्त रहे और स्त्रियां घर की कल्पना, संरचना खेती- बाड़ी शिशुओंवकी देखभाल गौऔ की देखभाल में लगी रहीं ।शिकार में भी वे अक्सर साथ देती थीं।
यह प्राकृतजीवन अप्राकृत हो मर्यादाओं के बंधनों में कैसे बँधा और कैसे उनके विकास की कहानी अलग होती चली गयी ,यह देशकालजनित परिस्थितियो की ही देन मानी जा सकती है।जहाँ एक ओर पाश्चात्य देशो में न्यूनतम परिवर्तन आये वहीं पौर्वात्य या एशियाटिक देशों मे उनकी स्थिति मे काफी परिवर्तन आए । भारत में विभिन्न आक्रमणकारी जातियों की लूटपाट की प्रवृति,लूटपाट में शासकों और सैनिकों द्वारा नारियों की अशक्तता का लाभ उठा उनको भी शामिल कर लेना कुछ ऐसी स्थितियाँ थीं जिसकेपरिणामस्वरूप उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ी और उनकी स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गयी। उनके व्यवहार और कार्यकलापों पर अंकुश लग गय़े ,और इस तरह उन सीमारेखाओं को मर्यादा की संज्ञा दे दी गई।अब नारियों का विकास अवरुद्ध हो गया।
तो मर्यादाएँ नारियों पर लगाये वेबंधन है जोउनके विकास में बाधक बने।नारियों काशील उनका प्राकृतिक गुण है जो मर्यादाओं का मुखापेक्षी नहीं रहता।

विकास सर्वतोमुखी होने पर ही सार्थक होता है।देश के विकास में आर्थिक सामजिक शैक्षिक आध्यात्मिक ,तकनीकी और कला- कौशल ,सबका विकास सन्निहित है।और इस सबके लिए राजनैतिक स्तरपर प्रयास करने की आवश्यकता भी है।आज अवसर वादिता नेदेश के विकास को दलदली संकट में डाल दिया हैमात्र राजनीतिक प्रयासों सेहम समग्र विकास की कल्पना नहीं कर सकते इसके लिए देश के सामजिक चिंतन को विकासोन्मुख होना आवश्यक है।समग्र विकास की बातें करते हुए आँखों के आगेसबसे बड़े पहलू केरूप में आर्थिक विकास की बातें आती हैंपर सामाजिक स्थितियों की विकलांगता भी नष्ट होनी चाहिए।स्त्रियों के संदर्भ में कहें तो आज नित्य प्रति होती बलात्कार की घटनाएँ चौंका ही नही रही हैं वरन् समाज कीउस विकृत मानसिकता कोदिखा रही हैं जिसमें स्त्रियों पर हावी हो पुरुष अहंकार की पुष्टि होती है।शारीरिक शक्ति से हीन समझ उनपर अपनी प्रभुता स्थापित करता है।यह आदिम जंगलीपन सामाजिक विचारधारा मे अभी भी समाया है,यह अत्यधिक चिन्तनीय विषय है।कहाँ गए वे भारतीय सामाजिक मूल्य जो हमारे अतील के आदर्श थे?आदर्श हमेशा यथार्थ से अलग होता है,एवं नए मूल्यों की सृष्टि करता है।ये आदर्श विशेष युग काल मे परिवर्तित होकर नये नये मूल्यों की सृष्टि भी कर सकते हैं।प्रश्न है कि भारतीय उदार विचारधारा उन आदर्शों को स्वीकार करती है अथवा नहीं।
भारतीय मूल्यों की वकालत करता हुआ मानस उस भारतीय स्वरूप को संरक्षित करना चाहता है जिसमें परिवार के सभी स्वरूपों की रक्षा होती है ,सबका सम्मान होता है, जिसमें भावनाओं की इमानदारी होती है,सच्चरित्रता और नैतिकता का समावेश होता है,सत्य के प्रति आग्रह ही नहीं दुराग्रह भी होता है,मिथ्या से घृणा होती है-जिसमें एक अव्यक्त के प्रति आस्था होती है-मात्र विज्ञान केप्रति भटकन नहीं।विज्ञान ज्ञान प्राप्ति का साधन होता है साध्य नहीं,ज्ञान केप्रति निरंतर जिज्ञासा जिसका प्राकृतिक स्वभाव होता है ज्ञान विकास का अभिन्न अंग हैऔर विज्ञान ज्ञान प्राप्ति का बहुत बड़ा स्रोत।तकनीकी विकासउसकी बहुत बड़ी देन है जिसे हम नकार नहीं सकते।
धन देशकालजनित आवश्यकताओं की पूर्ति का एकमात्र साधन है,उसके सर्वतोमुखी विकास में सहयक सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।सर्वतोमुखी विकास में जिसकी सतत् आवश्यकता है।ऋषियों ने भी इन्द्रादि देवताओं से धन और वैभव की मांग की थी, जिसका प्रमाण ऋग्वेद में मिलता है।
इन सबके अतिरिक्त देश की विकास यात्रा तबतक पूरी नहीं होती, जबतक नारियों का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। वे दिन अतीत केहैं जब शारीरिक सक्षमता के आधार पर मानव या पशु ,या जंगली अन्य भयानक जीव –जन्तु रूपी शत्रुओं से लड़ अपना प्राधान्य स्थापित किया था।. तब भी स्त्रियाँ युद्ध तक में साथ होती थीं।कैकेयी और दशरथ की कथा को चाहें तो प्रमाण मानें।क्या स्त्री-पुरुष समानता की वह भूमिका नहीं थी?
जीवन मूल्यों के अंतर्गत सांस्कृतिक मूल्य तो आते हैं पर युगपरिवर्तन के साथ सड़ते गलते मूल्यों को बदलना भी आवश्यक होता है।.अगर आज स्त्री पुरुष समानता की बात उठती है तो वह गलत तो नहीं ही है।अगर वेजीवन रथ के दो पहिए हैं तोदोनों ही समान विकास केअधिकारी हैंऔर मार्ग मेंआती बाधाओं को दूर करने का अधिकार भी दोनों को ही मिलना चाहिए।
राजनीतिक स्तर पर इस बात की स्वीकृति विश्व भर में मिल चुकी है पर हम भारतीय सामाजिक स्तर पर अपनी सोच बदलना नही चाहते।नारियों को पुरुष अहं का शिकार होनापड़ता है। यही कारण है कि उनककी सररलता निश्छलता और सहज ही भयभीत हो जाना कभी तो उन्हें क्रय विक्रय की वस्तु बना डलता है,कभी बलात्कार का शिकार और कभी घर की चहारदारों में बन्द कर बच्चे पैदा करने की मशीन बना डालना चाहता है।आज की जागरुक नारियाँ देश की समस्याओं से दिन रात रूबरू हो एक से अधिक बच्चे कीमाँ नहीं बनना चाहती हैं तो देशकाल जनित आवश्यकताओं को देखते हुए स्वागत योग्य कदम है कोख उधार लेने के पीछे की उनकी शारीरिक विवशता होती है नकि सन्तान पैदा नकरने की आधुनिक सौन्दर्य प्रियता।.अपवाद हो सकते हैं पर अपवादों के लिए पूरी आधुनिकताको दोषी सिद्ध नहीं कियाजा सकता।यह सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास नही वरन विकास माना जाना चाहिए अगर वे अनाथ बच्चों को गोद ले अपनी गोद भर लें।आज वे देशहित में ऐसेबहुत सारे कदम उठा रही हैं जो हर दृष्टि से प्रशंसनीय हैं। ये कदम सामाजिक रूप से अत्यंत प्राचीन काल से मान्यता प्राप्त हैं । महाभारत काल मे ऐसे उदाहरण तो मिलते ही हैं।अगर सार्वकालिक आदर्शों से टकराव न उत्पन्न हों तो देशकाल जन्यपरिवर्तित मूल्यों को हमें स्वीकारना होगा। आज अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए वे अपनी सामर्थ्य केआधार पर विदेश जाती हैं तो सामाजिक दृष्टि से तबतक गलत नहीं होता जबतक वे अपने आश्रितों को असुरक्षित ही न छोड़ जाएँ। देशके विकास में उनकी सहभागिता उनके सम्पूर्ण विकास में सन्निहित है ।ऊँचे ऊँचे पदोंपर समासीन होकर भी वे आज जागरुक होकर परिवार का संचालन करती हैं विवशता के डंडे खाकर नहीं।इसमे कहीं कोइ दो मत नहीं कि वे दोहरी भूमिका का निर्वाह भी करती हैं। आवश्यकता पड़ने परपरिवार का आर्थिक बोझ का वहन करघरेलू जीवन का निर्वाह भी करती हैं। हर क्षेत्र में उनकी सक्रियता ,कार्यकुशलता और संलग्नता किसी प्रकार कम नहीं होती।आज उनके विचार ,उनका विकास देश केलिए मायने रखते हैं।
देश काल के अनुसार मर्यादाएँ और मूल्य बदलते रहते हैं।आज नारियाँ न पर्दे मे रह सकती हैं,न विकास का कोई पहलू उनसे अनछुआ ही रह सकता है।अन्याय और अत्याचार वे सहन नहीं कर सकतीं। युग बहुत तेजी से बदल रहा है हमें अपनी मानसिकता भी जो बार बार पीछे देखने कीआदीहै, बदलनी होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उनकी प्रतिभा को पहचानें,उसकी कद्र कर उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा करें,।उन्हें विकास के समुचित अवसर प्रदान करेंऔर उनके सम्बन्ध में मध्ययुगीन विचार धारा का परित्याग करें।

आशा सहाय—-7-8-2015—।

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