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नैतिकता—अनिवार्य शिक्षण

Posted On: 27 Jul, 2015 Others में

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ashasahay

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मैने समाचारपत्र ” हिन्दुस्तान” में सम्पादकीय पढ़ा।सम्पादकीय को हम हम हमेशा से महत्व देते हैं। सम्पादकीय को एक विद्वान व्यक्ति का वक्तव्य मानते रहे हैं ,और उसकी निष्पक्षता पर ऊँगली उठाना नहीं चाहते।देश की समस्याओं का वह जागरुक और खुली निगाहों से आकलन करता है। एक युग में यही निष्पक्षता बुद्धिजीवियों का अस्त्र और शस्त्र हुआ करती थी जिससे वे सही जनमत का निर्माण किया करते थे।मैं भूतकालिक क्रिया का प्रयोग कर रही हूँ क्यों कि आज हालात काफी बदल चुके हैं और हर समाचारपत्र अलग अलग सिद्धान्तों की भाषा बोलते हैं। निष्पक्षता कहीं गुम हो गयी लगती है और वे किसी विशेष पार्टी के विचारों से अपने लेखन को प्रभावित करने से नहीं चूकते।यह अजीब बेमानी बात है ,फिर भी सम्पादकीय में कुछ सार तो रहता ही है।
हाँ,तो सम्पादकीय मे आजकल चल रहे संसदीय गतिरोध की चर्चा थी, आलोचना थी कि जनता के बहुमूल्य पैसों का अपमान हो रहा है और वह भी उस बड़ी पार्टी के द्वारा जो सर्वप्रथम सत्ता में आई थी इस भाव के साथ कि जनता का उससे बड़ा हितैषी कोई नहीं कि जनता ने स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर देश के विकास तक की जिम्मेदारी उसी को दी है और लोकतांत्रिक ढंग से जिम्मेदारी के निर्वाह का काम भी उसी ने किया है।और यह भी कि जब कभी उसके द्वारा संचालित संसद की कार्यवाहियों में अन्य दलों ने गतिरोध पैदा करने की कोशिश की है,जनता के पैसों केअपव्यय और अपमान का हवाला भी उसने दिया है।
अगर ऐसा है तो आज गतिरोध क्यों? क्या सारे सिद्धान्त स्वार्थ के ही मुखापेक्षी होते है? सिद्धांत –काल और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तनशील अवश्य होते हैंमगर इतने भी नहीं कि सिद्धान्तों के शाश्वत मूल्य ही समाप्त हो जाएँ।स्वतंत्रता की लड़ाई जिन मूल्यों के आधार पर लड़ी गयी,और जिनका साथ देने के लिए सारा देश स्वतंत्रता प्राप्ति को आतुर हो उठा,जलने मरने कटने और फाँसी को गले लगाने को तैयार हो गया ,एक नेता के आह्वान पर सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो गया, उन्ही मूल्यों को बनाए रखकर क्या आज देश के विकास केसंकल्पों को हम पूर्ण नहीं कर सकते थे? प्रतिद्वन्दिता औरअकारण विरोध की गंदी और गलीज राजनीति ने अपने सारे सिद्धांतों को भुला दिया। याद रखा तो सिर्फ अवसरवादिता को,गले सड़े हुए नारों को,और उनके माध्यम से देश के विकास को नही उसके विकास के स्थगन के प्रयत्नों को।
विरोध , प्रतिद्वन्दिता स्वार्थ आदि मानव मन की कमजोरियाँ हैं और स्वतंत्रत पूर्व ये कमजोरियाँ नेताओं के मन मे नहीं रही होंगी ,यह कहना सत्य नहीं पर उस समय सारी जनता ने ,सभी दलों ने उसपर कमोवेश विजय प्राप्त किया था।
इस देश की जनता बड़ी सहिष्णु है।हो सकता है यह यहाँ की जलवायु या सांस्कृतिक प्रभावो का प्रतिफल हो,पर अन्याय के विरुद्ध जब यह असहिष्णु हो जाती है तो एकजुटता प्रदर्शित कर समस्त अनाचारो का बदला भी लेती है।
हमने देखा है कि आंतरिक अशांति की कल्पना अथवा अन्य किन्हीं वांछित ,अवांछित कारणों से देश मेंआपतकाल लगाए जाने पर या विदेशी आक्रमणों की स्थिति में किस प्रकार देश एकजुट हो गया है,। अत्यंत संवेदनशील है यहाँ की जनता। अपने अनाप शनाप बातों, व्यवहारों से इसे मूर्ख बनाना इतना आसान नहीं। चुप होकर वह सबों को समझने की कोशिश करती है,और आने वाले चुनावौं की प्रतीक्षा भी करती है।
आज भी विभिन्न नेताओं के द्वारा किए गए हजारों हजार वादों,गतिविधियों, विकास कार्यक्रमों कावह मन ही मन आकलन कर रही है।लिखित आँकड़ों पर विश्वास न कर वह दृश्य स्थितियों पर विश्वास करना चाहती है। क्या पार्टियों के जिम्मेदार नेता इस बात को नहीं समझते ? मुझे याद है, बिहार मे चारा घोटाला आदि की स्थितियों को किस तरह जनता आकलित करती थी। बाहुबलियों के आगे परास्त होने वाली जनता मन से परास्त नही होती , बदला तो वह लेती है पर जनतांत्रिक ढंग से। अगर कोई जनतांत्रिक पद्धतियों में आज भी विश्वास कर उसकी मुखापेक्षी है तो वह है जनता।
विभिन्न पार्टियों से जनतांत्रिक सिद्धांतों की मर्यादा की रक्षा की उम्मीद करना एक व्यर्थता है।अवसरवादी, शासन के लोभ से मुक्त नहीं हो सकते,लोक की परवा किसे है।देश हित गौण दिखता है। अगर ऐसा नहीं होता तो संसद में गतिरोध उत्पन्न करनेवाली कोई भी पार्टी इस तरह नैतिकता से शून्य नहीं दिखती।विपक्ष में बैठनेवाली हर पार्टीउसकी महत्वपूर्ण भूमिका को विस्मृत कर दिया करती है।

अन्ततः प्रश्न उठता है नैतिकता का।लगता है नैतिकता भारतीय जन मानस पटल से विलुप्त होती जा रही है।पुरानी पीढियाँ किसी तरह अभी भी उसका हवाला देती रहती हैं।बुद्धीजीवी निर्लोभी व्यक्तित्वों के मुख से उसका गुणगान सुना जा सकता है पर स्वतंत्रता पश्चात् लगभग साठ वर्षों में इसका निरंतर ह्रास होता जा रहा है।ऐसा क्यों?भारत अपपने आध्यात्मिक मूल्यों के लिए सम्पूर्ण विश्व में जाना जाता रहा है।आखिर इतना शीघ्र ,इतने कम वर्षों में इसका अवमूल्यन क्यों होता जा रहा है ? क्यों?

पहले बड़े बूढ़े बच्चों को प्रभावित करते थे। कुछ नीतिगत बातें और कुछ नैतिकता की बातें सिखाते थे। मूल्यों के लिए किसी के सम्मुख समझौता करने की सीख नहीं देते थे। पर आज कुछ विपरीत हो रहा है। आज बच्चे अपने क्यों , किसलिए आदि प्रश्नों से माँ –बाप ,बड़े-बूढ़ों को प्रभावित कर रहे हैं।माँ- बाप उनके आगे परास्त हो रहे हैं।अनुशासनहीनता इसका बहुत बड़ा कारण है।

एक दूसरा केन्द्र है विद्यालय, जहाँ बच्चे अपना अधिकांश समय बिताते हैं,जहाँ शिक्षक उनके नायक होते हैं,–हीरो-पथप्रदर्शक और सबकुछ।पर विद्यालय शिक्षकों की भूमिका भी आजबहुत सराहनीय नहीं दिखती। प्राचीन गुरुकुलों मे गुरुओं की भूमिका पवित्र होती थी,आज स्थिति वैसी नहीं है इसके कारणो का विशलेषण हम करना नहीं चाहते।विषयान्तर होगा।परिणामतः अपने आचरणों ,क्रियाकलापों से वे बच्चों को नैतिकता का पाठ शायद ही पढ़ा सकते हैं।
अब प्रश्न हे कि पाठ्यक्रमोंमें नैतिक शिक्षा अनिवार्य क्यों नहीं किया गया।व्यक्तित्व विकास में नैतिकता बाधक तो नहीं हो सकती।देश विदेश के विद्वानों के सम्मुख जब भारत जैसे देश में नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आई तो सबों ने इसे शिक्षकों की समवेत जिम्मेवारी माना और अलग सेइस विषय की शिक्षा को अप्रभावी मान लिया जब कि बहुत सारे देशों में धार्मिक शिक्षा के माध्यम से नैतिक शिक्षा का स्पष्ट प्रावधान है।
जब देश में ,लगभग सभी राज्यों मेंएन सी.ई .आर .टी का पाठ्यक्रमलागू हो गया तो इससे सम्बन्धित नीति वही रही।किन्तु बहुत सारे राज्यों यथा हरियाणा ,गोआ, तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश ,उत्तर प्रदेश आदि ने स्वतंत्र विषय के रूप में पाठ्यक्रम में स्थान दिया यह मानकर कि मात्र शिक्षकों की चेष्टाओं से यह शिक्षा नाकाफी होगी, पर अन्य राज्यों की स्थिति लगभग वही रही।दूसरे विषयों यथा साहित्य नागरिक शास्त्र आदि के जरिये इसे देने की कोशिश की गयी पर इसका प्राधान्य नहीं रहा।
धर्म एक बहुत बड़ा माध्यम है जिसके जरिये सामान्य तबके के लोगों अथवा बच्चों को प्रभावित किया जा सकता है पर आज के प्रबुद्ध वर्ग को यह स्वीकार नहीं हो सकता। एक धर्म निरपेक्ष राज्य मेंकिसी एक धर्म से जोड़कर नैतिकता की शिक्षा तो कदापि नहीं दी जा सकती पर सभी धर्मों के सार और निचोड़ के माध्यम से ,मानव धर्म के माध्यम से तो नैतिक शिक्षा दी ही जा सकती है।इस विधि से एक विशेष पाठ्यक्रम बनाया जा सकता है जिसमें बुनियादी नैतिक गुणों की बातें बतायी जा सकें और उसे समय-समय पर परीक्षित भी किया जा सके।इससे धर्म निरपेक्षता के साथ-साथ नैतिकता का विकास होगा। नैतिकता मनुष्य की मूल आदर्श भावना से जुड़ी होती है।पशुता रहित मनुष्यों के लिए मानवता से जुड़ी यह भावना सहज ही ग्राह्य हो सकेगी।
आशा की जा सकती है कि भावी नयी पीढ़ी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के निर्वाह में नैतिकता को कभी विस्मृत नहीं करेगी

आशा सहाय—27 -7-2015

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