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परंपराएँ रक्षणीय भी होती हैं

Posted On: 1 Mar, 2018 Others में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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अभी हाल में भारतीय समुदाय ने कई प्रकार से परम्पराओं के पक्ष और विपक्ष मे तर्क दिये है। परम्पराओं को लेकर पूरे देश में अक्सर संघर्ष का माहौल बन जाया करता है,और आधुनिक होते भारत मेयह एक विचार णीय विषय भी कि हम परम्पराओं का क्या करें- कितना छोड़ें और कितना ढोएँ। वस्तुतः यह सोचने का विषय है।

ऐसा लगता है किपरंपराओं का विरोध तबतक उचित नहींजबतक वे राष्ट्र जीवन को नकारात्मक ढंग से प्रभावित नहीं करते हों।मात्र अपनी आधुनिकता के रक्षण के लिए परम्पराओं का तिरस्कार कर देना सदैव उचित प्रतीत नहीं होता।कभी कभी कुछ देशी अथवा विदेशी परम्पराओं, नैतिकता और आधुनिकता की लहरों में टकराहट हो जाती है तब जनेच्छा और नैतिकता में शक्तिपरीक्षण की स्थितियाँ सामने आ जाती हैं।उदाहरण के लिए विश्व में संक्रामक होती जा रही वैलेंटाइन डे की परम्परा कहीं ग्राह्य कहीं अग्राह्य और कहीं अर्धग्राह्य भी हो रही है। परिणामतः बहुत सारी सभ्यताओं में इस संदर्भ में की गयी आलोचनाएँ आधुनिकता विरोधी प्रतीत होती हैं।यह एक आधुनिक लहर जो पश्चिमी सभ्यता की देन हैऔर लोगों ले लव से सम्बन्धित इमोशन्स के मुक्त प्रदर्शन का जरिया बन जाती है ,को पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम दे शों ने सकारात्मक ढंग से नहीं लिया क्योंकि यह उनकी सभ्यता के बिल्कुल विरुद्ध है। उनका अनुमति न देनाउनके कट्टर धार्मिक भावनाओं का ही समर्थन है चूँकि यही उनके अस्तित्व का मूल भी है।परन्तु भारत में इसका विरोध अधिक नहीं हो सकता क्योंकि भारत धार्मिक कट्टरता में विश्वास नहीं रखताया कम से कम सिद्धांततः नहीं रखना चाहता । किन्तु  इस परम्परा के तहत मात्र उपहारों का आदान प्नदान ही नहीं व्यवहारों मे भावनाओं की नग्नता का और अत्यधिक उच्छृंखलताओं का समावेश होता जा रहा है  ।अनैतिक कार्यों को प्रश्रय मिल जा रहा है जिसके विरूद्ध यह देश निरंतर संघर्ष में लगा है।अतः इन अनैतिक स्थितियों की रोकथाम की व्यवस्था तो अनिवार्य है ही।मूलतःजहाँ की यहपरम्परा है ,वहाँ लव और सेक्स एक दूसरे के पर्याय से बन कर रह गए हैंअतः वहाँ के व्यवहारों को अनैतिक और उच्छृं खल कोटि में नहीं रखा जाता  किन्तु भारत इस व्याख्या के लिए कभी भी तैयार नहीं है। वर्तमान संदर्भ में यह उदाहृत किया जाने योग्य प्रसंग है ।

किन्तु हम दे श के अन्दर की कुछ विषयेतर परम्पराओं की चर्चा करना चाह रहे हैं जिसके संरक्षण के प्रति जातियाँ सचेत हैं और सुधारों के नाम पर उन्हें समाप्त करने की चेष्टाओं में विश्वास नहीं रखतीं। अभी देश के कुछ राज्य अपने खान पान, पूजा पाठ तथा रीति रिवाजों को लेकर काफी चौकन्ने हैं और केन्द्र अथवा राज्य प्रशासन की उसमे दखलन्दाजी नहीं चाहते ।कुछ अन्य आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की आड़ में वेसशस्त्र विरोध तक करने को आमादा हैं , हमें उनके दृष्टिकोण से सोचने की आवश्यकता है।अभी अभी झारखंड प्रदेश के कुछ आदिवासी बहुल ग्रामो की ओर  ध्यान आकृष्ट हो रहा है जिन्होंने एक आन्दोलन छेड़ रखा है जो अधिक मुखर होता हुआ है ,क्यों कि विकास की वे किरणें उन तक नहीं पहुँची ,साथ ही आ धुनिकता के नाम पर उनकी  रूढ़ियों और पम्पराओं को निर्रथक सिद्ध करने की साजिश रची जा रही है।उनके तथाकथित अधिकारों को छीनने का प्रयत्न हो रहा है। वे इस देश के मूल निवासी हैं,उनकी संस्कृति सबसे पुरानी और सार्थक है ऐसा उनका विश्वास है।स्पष्ट है उपरोक्त दो शसिकातें ही सरकारी कामकाज के प्ति उनमें अविश्वास उत्मन्न करता है और राज्य द्वारा प्रदत्त  संवैधानिकअधिकारों की मनमानी व्याख्या कर  गाव का विकास अपने हाथ में  लेना चाहते हैं,किन्तु प्रयासों में सम्पूर्ण इमानदारी का अभाव तो झलकेगा ही क्यों इस प्रकार वे अवैध कार्यों की ओर भी प्रेरित हो सकते हैं।

किन्तु इस देश की भौगोलिक ,सांस्कृतिक  विविधता ही आज इस देश की पहचान बन चुकी है।यही इसका आकर्षण भी है औरऔर आंतरिक अशांति का कारण भी।अगर संघीय ढाँचे को बनाए रखना है और संघर्षों से बचाकर देश को आगे बढ़ाना हैतो इसे सम्पूर्णतः आधुनिक अथवा सम्पूर्णतः परंपरागत बनाने का कोई भीप्रयत्न छोड़ना ही होगा।देश की जैविक विविधता की सुरक्षा,उपयोगी जीव जन्तुओं की सुरक्षा से सम्बन्धित कानून कारगर हो सकते हैं बशर्ते.सभी राज्य और समुदाय राजी हों।

व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास पर जोर दिया जाता है किन्तु व्यक्तित्वों में विविधता होती है,जो उनकी सोच,भावनाओं और अवधारणाओं पर निर्भर करतीहै।ये अवधारणाएँ भिन्न हो सकती हैं, यानि ये सामाजिक संरचना और धार्मिकविचारधाराओं पर आधारित होती  हैं और – जैसे जैसे व्यक्तित्व में बौद्धिकता का विकास होता है कालक्रम से परिष्कृत होती हीरहती हैं।ईसी बौद्धिक विकास की हर कहीं अपेक्षा हैताकि चिन्तन के साथ- साथ तर्क के तराजू पर उचित अनुचित का निर्णय किया जाए। यह चिंतन स्वयंभू होना चाहिए।लादा हुआ नहीं।शिक्षा –दीक्षा का उद्येश्य आरम्भ से हीइसी स्वयंभू चिन्तन का विकास करना रहा है।

इस स्वयंभू चिंतन के विकास पर बल देने केउद्येश्य से सरकारों ने भी प्रयास किए पर कोई भी प्रयास उसके दार्शनिक उद्ये श्यों तक पहुँ च नहीं पाया औरसब  प्राचीन पाश्चात्य शैली के  आव भाव ताव में ही विलीन होते गये।बातें हम व्यक्तित्व में छिपे कौशलके विकास  की करते हैं,पर उसकी पहचान करने का प्रयास नहीं करते जब कि  यह  आज के  युग की आवश्यकता है।सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में नौकरियाँ पा ,कुर्सियों पर बैठकर जीवन गुजार देने के दिन समाप्त हो गए हैं।.स्वतंत्र व्यवसाय और उसमें कौशल प्रदर्शित करने का समय ही आता हुआ प्रतीत होता है।.कौशल प्रदर्शन की बात तो छोड़ें  वित्त मंत्री ने  जिस एकलव्य विद्यालय  की योजना की बात की है, निज कौशल विकास और स्वयंभू चिंतना से सम्बन्धित यह योजना यदि आदिवासी क्षेत्रों मे विस्तार पा सके तो   काफी प्रभावी हो सकता है।आवश्यकता है सही कार्यान्वयन की।.  काफी लम्बी अवधि तक इन शिशुक्षुओं के साथ अध्यापन जीवन में समय बिताकरउनकी वर्तमान ढंग की शिक्षा के प्रति उनकी अरुचि को हमने भाँपा है।  थोपी हुई भाषा में लिखना पढ़ना उन्हें रुचिकर नहीं प्रतीत होता , क्षेत्र की आदिवासी भाषाओं में उन्हें पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।जितनी शीघ्रता से यह कार्य हो सकेगा ,इस समुदाय के सामान्य प्रतिभावाले छात्रों की रुचि भी पढ़ने मे  जग सकती है।राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी औरर संपर्क भाषा के  रूप में  अंग्रेजी का अल्प ज्ञान होना  भी आवश्यक है।

तात्पर्य यह कि जिस रोजगार की खोज उनकी प्राथमिक आवश्यकता है  उसके लिए तैयार करने में  ,शिक्षा की ओर प्रवृत करनेमें विशेष प्रयत्नशील होने की आवश्यकता है।स्वरोजगार की ओर प्रेरित करनेके लिए उन्हें स्वयं प्रयत्नशील होने की आवश्यकता है।रोजगारोन्मुख शिक्षा की ओर प्रेरित करने के लिए एकलव्य विद्यालयों का अगर सहारा लिया जाय तो वे विद्यालय न जाने की अपनी संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकल सकते हैं।

विषय के अंतर्गत ही विशेषकर  आदिवासियों के रहन सहन जीवन शैली पर विचार करना यह कहना इसलिए उचित जान पड़ता है कि परंपरागत ढंग से ये नशा करने के आदी हैं। नशा उन्मूलन के तहत हम इनकी इस आदत पर प्रहार करना चाहते हैं पर घर घर शराब बनाए जाने वाली मनोवृति ,जिसे अपनी जीवनी शक्ति का सहारा मान लिया है, उससे छुटकारापाना इतना आसान नहीं है । यह एक लम्बी प्रक्रिया होगी, और तभी संभव होगा जब अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करने के लिये आवश्यक पोषक तत्व अन्य माध्यमों से उन्हें प्राप्त हो जाए।ये अधिकांशतः कुपोषण के शिकार हैं।मोटा खाना और  घरेलु शराब इनके जीवनाधार हैं।छिपे छिपे कई जगह अफीम उगाए जाते हैं जिसके लिए अवश्य ही अफीम माफिया का संरक्षण इन्हें प्राप्त होता होगा।

अन्य ऊँचे तबके , जिनके पास भूमि है,सरकारी अथवा सार्वजनिक कार्यों के लिए अपनी भूमि छीने जाने के भय से अपने आक्रोश  को सदैव  व्यक्त करने को तत्पर रहते हैं ।इनका विरोध इन्हीं मूल भावनाओं को स्पष्ट करता है।उनका यह कहना कि नौकरी मिल सकती है जमीन के एवज में ,पर जमीन का छिन जाना उन्हें पसंद नहीं।यह उनके जमीनी अस्तित्व पर प्रहार है।अगर इनकी मौलिक आवश्यकताएँ और युवाओं की महत्वाकाँक्षाएँ सरकारी अथवा  गैर सरकारी संस्थाओं के  प्रयत्नों से पूरी होती हैं तो इनके जीवन को नयी दिशा दी जा सकती है।

जहाँ तक परम्पराओं का प्रश्न है वह उनके आत्मसम्मान से जुड़ा है।यह उनकी जातिगत विशेषताओं  के संरक्षण और उनके विशिष्ट सोचों से सम्बन्धित हैं ।वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का अल्प अभाव होते हुए भी वे निन्दनीय नहीं हैं।उनके पारंपरिक दृष्टिकोणों को हमें ही समझने की जरूरत है। वे प्रकृतिपूजक हैं और उनकी रीतियाँ और रिवाज भी उसी से जुड़ी हैं।  हो सकता है उनपर आदिम काल का प्रभाव कुछ ज्यादा हो परवे उसे लेकर चलना चाहते हैं तब भी, जब शायद उनका वास्तविक अर्थ और प्रयोजन वे भूल चुके हों। भारत के प्रत्येक राज्य के निवासियों की अपनी परम्पराएँ हैं इसी, प्रकार इनकी भी हैं।अगर सब रक्षणीय हैं तो ये भी।इनके नृत्य गीत ,कला कौशल मात्र प्रदर्शन की वस्तु नहीं, आश्चर्य से निहारने के विषय नहीं , इनके संघर्ष  की कहानी बयाँ करते प्रतीत होते हैं। जंगली जीवन की गाथा प्रस्तुत करते हैं।  इन्हें बेशक जीवन की सुविधाएँ चाहिए पर अपनी परम्पराएँ ,कला कौशल रीति रिवाज इन्हें संरक्षित चाहिये जिनमे हम अपने आदिम जीवन की भी झलक पाते हैं। तत्सम्बन्धित साहित्य  पुराणादि भी इस जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं। फिर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं किवे अगर वर्तमान समाजऔर राष्ट्र के लिए हानिकारक नहीं तो उन्हें आधुनिक सोचों से जोड़कर भी देखने की आवश्यकता है।उनमें सामंजस्य बैठाने की आवश्यकता है।

उनकी परम्पराओं में बुरी आत्माओं को भगाने के लिए झाड़फूँक तंत्र मंत्र के प्रयोग को अंधविश्वास का दर्जा दे उसे निम्न श्रेणी का करार दिया जाता है पर सम्पूर्णतः ऐसा नहीं है।तंत्र मंत्र आध्यात्मिक सोचों से जुड़ा हुआ है। यह साधना से जुड़ी शक्ति है।हाँ जब इसके साधनात्मक आधार की समाप्ति हो जाती हैतो यह मात्र अंधविश्वास बनकर रह जाता है।अपनी हर भारतीय सोच की पाश्चात्य सोच से तुलना कर उसे हेय करार देना उचित नहीं।पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान के अंध बहाव में बहे हुए हम भारतीयों को अब अपनी प्राचीन वैद्यस चिकित्सा प्रणाली की ओर मुड़ने की आवश्यकता महसूस हो रही है।मंत्रों के साथ यज्ञ में हम भी आहुतियाँ देते हैं।आवाहन ,विसर्जन,जप,आदि पूजन की विधियों में मंत्रों का उपयोग करते हैं।इसी प्रकार तंत्र साधना का भी अपना महत्व है।बौद्ध धर्म की महायान शाखा के वज्रयानी सिद्ध तांत्रिक साधना में विश्वास करते थे ,यह एक उच्च स्तर की साधना थी उनके लिए।यह कत्य को जानने की एक दुर्बोध प्रक्रिया थी।  पर  कालांतरमें इसमें कावासना जनित विकृतियाँ आती गयींऔर  भावनाओं की पवित्रता समाप्त हो गयी   तो वह समाज के लिए हानिकारक बन गयी  और मात्र आडम्बर बन कर रह गयी।

रीति रिवाज अपने अर्थ को खो देने के बाद निष्प्रभावी हो जाते है । ऐसा हीउनके साथ भी हुआ है। उसको पुनर्जीवित कर उसमें निहित वैज्ञानिक सोच  के साथ तारतम्य बैठाने की आवश्यकता है। यह कार्य कुछ अधिक परिश्रम और लगन के द्वारा ही संभव है।

मात्र पुलिस बल का भय दिखा हम उन्हें अपने अनुकूल नहीं कर सकते।वे उस भय से छुटकारा पाने के लिए अपने हरवे हथियारों कासहारा लेने की धमकी भी देते हैं।भय अपनीसीमा पार करने पर पूर्ण निर्भयता का सहारा ले लेता है।उनके लिए पुलिस ,प्रशासन का भय कोई मायने नहीं रखता।

अतः उनके संदर्भ में पुनः कहने की आवश्यकता महसूस होती हैकि उनके रीति रिवाज, उनके अलौकिक रिश्ते, जादू टोनो का मर्म हम समझें,। पहाड़ी अंचलों की उनकी सहूलियतों से अलग कर स्वयं से तुलना न करें । उनकी कलाओं की पहचान उनके परम्परागत विचारों से करेंऔर उसमें उनके विकास के चरणों को ढूँढ़ें।उनकी संस्कृति उनकी विशेष सोच पर आधारित है  उनकी परम्पराओं में उसे ढूँढ़ें तभीहम उन्हें आधुनिक विचारधाराओं से जोड़ सकेंगे।

आशा सहाय  1—3-2018   ।

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