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देश की गंभीर समस्याएँ

Posted On: 25 Jul, 2018 Politics में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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अभी अभी देश की वर्तमान सरकार के सम्मुख वर्षाकालीन सत्र में एक समस्या आई थी, अविश्वास प्रस्ताव झेलने की समस्या- इसके निराकरण में सरकार को परेशानी नहीं हुयी ,संसद का वक्त अवश्य ही बर्बाद हुआ।वस्तुतः यह कोई समस्या नही थी एक मंच था जहाँ अपनी अपनी प्रस्तुतियों को आँक अपनी ही आँखे खोलनी थी।नाटककार के निर्देशन मे अपनी भूमिकाओं के अनुसार अभिनययुक्त संवाद कहने थे। सांसदोंने और लाईव प्रसारण देखनेवाली जनता ने इसे देखा और शक्तिपरीक्षण का आनन्द लिया। यहाँ सम्पूर्ण देश की कोई ऐसी न तो स्थिति थी न राष्ट्रव्यापी समस्या जिसके कारण केन्द्रीय सत्ता डाँवाडोल हो रही हो।

—- हाँ तो , आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री ने सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार पर आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिये जाने से सम्बद्ध केन्द्र की वादाखिलाफी की शिकायत की।  यही उनका उद्येश्य था और अन्य दलों को अपनअपमी बातों को कहने का मंच मिला। मोदी विरोधी महागठबंधन के नायकत्व की भी शक्तिपरीक्षण की दबी महत्वाकाँक्षा भी लक्षित हो रही थी। इस तरह दो बातें स्पष्ट हुईं। तत्काल महागठबंधन की अक्षमता और प्रधानमंत्री मोदी कोअपने पुराने साथियों के द्वारा मुख मोड़ लेने की आशंकाभी। वस्तुतः इन दोनो ही स्थितियों का पूर्वाभास तो इन्हें था ही। प्रश्न है कि ऐसे शक्तिपरीक्षण के लिए ,जिसका परिणाम पूर्वज्ञात हो, संसद का महत्वपूर्ण समय और धन का अपव्यय क्या उचित था। एक साधारण नागरिक भी इसके प्रति आक्रोश ही व्यक्त करेगा।ऐसे में महत्वपूर्ण लम्बितसमस्याएँ और समसामयिक समस्याएँ कहीं फिर धरी की धरी ही न रहजाएँ।

—-प्रस्तुत नाटकीय प्रस्तुतीकरण मे विरोधी पक्ष के नायकत्व का दावा करनेवाले श्री राहुल गाँधी के अभिनय ने सबको चकित कर उनकी क्षमताओं का खुलकर प्रदर्शन किया । राहुल गाँधी ने मोदी को राजनीतिक गुरु स्वीकार किया और उनसे  गले भी मिले । यहाँ तक तो ठीक हो सकता था यद्यपि यह भी असंसदीय कृत्य था। किन्तु गले मिलने से पहले प्रधान मंत्री को उठने का संकेत करना एवम बाद में अपनी जगह जाकर सांसदों को देख एक आँख दबा देना,या तो उनके बचकामे व्यवहार की गवाही देता सा जान पड़ा या एक सांकेतिक भाषा प्रतीत हुई । कुर्सी से उठाने का संकेत कहीं प्नधानमंत्रित्व छोड़नेके बलात् आग्रह  और 2009 की उनकी संकल्पबद्धता से तो नहीं जुडा था औऱ, गले मिलना कही राष्ट्राध्यक्षों से मोदी के गले मिलने जैसी क्रिया  का व्यंग्यात्मक अनुकरण तो नहीं!। जो भी हो, संसद के अन्दर की यह शिष्टाचारहीनता भविष्य के लिए  कहीं एक समस्या न बन जाए।संभव है वे स्वयं अपने इन बचकाने व्यवहार पर लज्जित हों और अपनी झेंप मिटाने के लिए आँख दबाईहो। तरह तरह के अनुमान लगाए जा सकते हैं ।संभव है काँग्रेस अध्यक्ष के इस व्यवहार पर काँग्रेस अचम्भित रह गयी हो , अगर यह पूर्वयोजना नहीं हो तो।संभव है राफेल डील के एक फ्राँस राष्ट्राध्यक्ष केबयान के वावजूद  अपने मत पर अडिग रहने की कोशिश में किया गया यह कृत्य हो।

–जोभीहो, राजनीति मे अगर राहुल वर्तमान परिस्थितियों में जनता का दिल जीतने के प्रयास में कुछ कदम भी आगे बढ़ सके तो यह मोदी का अप्पत्यक्ष गुरुमंत्र ही रहा। मंदिर मंदिर जाना, जनेऊ धारण करना ,संघ सेप्रेरित शिवभक्ति आदि उस अप्रत्यक्ष प्रभाव की स्वीकृति सी लगी, पर गले मिलना उसका परिणाम तो कदापि नहीं हो सकता। ये सारे कृत्य एक बार पुनः उनकी अपरिपक्वता का प्रमाण दे गये।ये सारे कृत्य विपक्ष के नेतृत्व की उनकी उम्मीदपर पानी फेर सकते हैं।

यों भी देश शिष्टाचारहीनता की समस्या से जूझ ही रहा है। चुनावपूर्व यह अपनेचरमोत्कर्ष पर रहा करती है। भाषणों में विपक्षी दलों के प्रति आग उगलने के दौरान इसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हुआ करता है। पर संसद के अंदर ऐसा प्रदर्शन ग्राह्य नहीं होना चाहिए।

— एक अन्य समस्या देश की , जिस ओर बार बार ध्यान आकर्षित करने की जोरदार चेष्टा की जा रही है वह है मॉब लिंचिंग की। भीड़ अपने हाथों मे कानून ले लेती है जिसकी इजाजत कानून नहीं देता।भीड़ की मानसिकता यह कोई नयी नहीं है।पहले हम इसे समाज द्वारा किया गया न्याय मानते थे । चोरी , अतिचार , डायनगिरी जैसे मुद्दे को लेकर भीड़ तथाकथित अपराधी को पीट देना अपना अधिकार समझती है यह तत्काल गुस्से का प्रदर्शन है।हाँ समाज की यह दंड व्यवस्था हत्या तक नहीं पहुँचती। अगर यह हत्या तक पहुँच जाती है तो यह भीड़ के द्वारा किया गया महत अपराध है।आज  यह अधिक हो रहा है और इसके पीछे सही ,गलत अफवाहें काम कर रही हैं। यह समस्या का स्वरूप तब धारण कर रहा है जब तथाकथित गोरक्षकों के द्वार किसी मुस्लिम की पिटाई की जाती है और पिटाई इतनी की अस्पताल पहुँचाने की स्थिति आती है। अभी मुस्लिम नेताओं का यह कथन कि गाय को जीने का हक है परमुसलमान को जीने का हक नहीं ,पुलिस की शिथिलता और अमानवीय सोच को लक्ष्य कर कही जा रही।   अन्य स्थितियाँ  प्रचार में नहीं आ रहीं।   वस्तुतः गोरक्षकों द्वारा अमानुषिक व्यवहार संवेदनशील मामला तो है ही और यह 2019 के चुनावों तक संवेदनशील बनी ही रहेगी।  सुप्रीम कोर्ट भी  अफवाहों को फैलने से रोकने और मॉब लिंचिंग न होने देने की जिम्मेवारी राज्य सरकारों कोदी है । आवश्यकता पड़ने पर तत्सम्बन्धित कानून बनाने की बात हमारे गृह मंत्री करते हैं। पर अफवाहों को रोकना इतना आसान नहीं और भीड़ का शान्त बने रहना भी असंभव है पर प्रशासन को सतर्क रहने कीआवश्यकता है और पुलिस कीतत्परता तथा मनुष्य जीवन के महत्व को समझने की आवश्यकता है चाहॆ वे किसी जाति व धर्म के हों। एक धर्म निरपेक्ष शासन व्यवस्था में उनकी इस मायने में महत्वपूर्ण भागीदारी होनी चाहिए।

–देश में समस्याओं का अभाव नहीं। यह अलग बात है कि सारी समस्याएँ एक दूसरी से जुड़ी हैं । सबसे बड़ी समस्या हैबढ़ती हुई जनसंख्या की। आवश्यकता है अशिक्षा दूर करने की, जागरुकता लाने की और समान नागरिक संहिता की । ताकि देश में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को अपने समान अधिकारों और कर्तव्यों का बोध हो,वे चाहे जिस जाति धर्म संप्रदाय के हों।समस्या है बेरोजगारी दूर करने की । बढ़ती जनसंख्या से जुड़ी इस समस्या का पूर्ण समाधान कोई सरकार नहीं कर सकती। स्वरोजगार जिसका एकमात्र समाधान है। और देश को रह रह कर आन्दोलित करनेवाली सबसे बड़ी समस्या है आरक्षण के माँगों की। किसी सरकार में वह शक्ति नीं,इच्छाशक्ति नहीं कि इस समस्या को जड़ से समाप्त कर देश को लूला लँगड़ा होने से बचा ले। सम्पूर्ण देश को अगर बचाना है तो इनका समाधान ढूढ़ ना है, देश को सही मायने में जागरुक करना है ।

आशा सहाय।

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