blogid : 21361 postid : 1389281

समाचार और हमारी प्रतिक्रियाएँ

Posted On: 8 Dec, 2018 Politics में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

158 Posts

345 Comments

देश मे होतीहुई प्रमुख हलचलों की जानकारी कामुख्य श्रोत मीडिया ही है ,वह चाहे प्रिंट हो या विजुअल। हम सामान्य जन तो उसपर अपनी प्रतिक्रियाएँ ही व्यक्त करते हैं।ऐसे ही कुछ समाचार जिन्होंने विचारों को आन्दोलित किया वे  हमारे सम्मुख हैं।

28 नवम्बर–मेरे सामने खुला है टाइम्सऑफ इन्डिया कावह पृष्ठ जिसमे जम्मू और कश्मीर के गवर्नर का वह वक्तव्य प्रकाशित है जिसमें उन्होने स्वीकार किया कि विधान सभा भंग करने के पूर्व उन्होंने केन्द्र सरकार से विचार विमर्श नहीं किया  अगर किया होता तो शायद सज्जाद लोन सी एम के पद पर होता।पर गवर्नर सत्यपाल मल्लिक को यह गवारा नहीं था कि शपथ ले लेने के बाद वह बहुमतसिद्ध करे और विस सदस्यों की खरीद फरोख्त हो।यह एक साहसिक कदम प्रतीत होता है,निर्वाचन के पश्चात कर्नाटक के सम्पूर्ण धटनाक्रम से ली गई सीख के समान।यह एक विवेकपूर्ण निर्णय था जिसे एक झटके में लिया गया।उनके अनुसार भ्रष्टाचार के विरुद्ध लिया गया यह कदम आवश्यक था क्योंकि जम्मू और कश्मीर की मुख्य समस्या वहाँ के नेताओं का भ्रष्टाचार है।नेताओं के पास अकूत सम्पत्ति का होना और ठीक विपरीत साधारण जनता के पास स्वेटर तक नहीं कि वे अमरनाथ की यात्रा कर सकें,इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।।गवर्नर का यह दृष्टिकोण ,जो राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त कर वहाँ सकारात्मक जागृति लानेकी कोशिशहै, राज्य में शान्ति स्थापित करने में सहायक हो सकती है।पंचायत चुनावों में वहाँ की जनता की बढ़ती सहभागिता ,प्रतिशत की बढ़ोतरी, डेमोक्रेटिक पद्धति के प्रति विश्वास उत्पन्न करनेवाला है।जबकि, वहाँ के कतिपय प्रभावशाली नेताओं ने इन चुनावों का बहिष्कार किया था।

गवर्नर का दृष्टिकोण एक वैचारिक संघर्ष से उत्पन्न सकारात्मक दृष्टिकोण है जो सही निर्णय लेने को प्रेरित करता है।

एक उम्मीद जगाती हुई खबर पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्धों को  लेकर भी देखने को मिली।पाकिस्तान सार्क सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री मोदी को आमंत्रित कर सकता है।खबर में कितना दम है इसकी परीक्षा होनी बाकी है पर करतारपुर कॅारीडोर के सिए दोनों देशों की सहमति और पहल सेजुड़ी इस खबर की आशावादिता अधिक दिनों तक टिकनेवाली नहीं।पाकिस्तान के सार्क सम्मेलन का बहिष्कार उरी हमले के बाद भारत ने किया थाऔर साथ में कुछ अन्य देशों नेभी।अगर यह सकारात्मक खबर कुछ रंग लाती तो इमरान की दो आप तो चार कदम मैं की इच्छा को बल मिल सकता था।2016 से लम्बित पाकिस्तान का सार्क सम्मेलन इच्छाशक्ति और विरोधात्मक कदम का द्वन्द्व युद्ध सा प्रतीत होता है। यह निमंत्रण दक्षिण एशियाई देशों में भावनात्मक विचलन पैदा कर सकता हैसाथ ही भारत के लिएआतंक के विरुद्ध लिए गए अपने निर्णय से विचलन की समस्या भी।पर समस्याओं के समाधान के लिए कहीं न कहीं तो लचीलापन प्रदर्शित करने की आवश्यकता है ही। भले ही वर्तमान स्थिति अनुकूल न हो , उसमें अवसरवादिता और अपरिपक्वता  का आभास हो पर हमेशा मुकर जाना हमारे हिस्से का पलायनवाद भी प्रदर्शित करता है।हाँ अभी सोचने का विषय यह अवश्य है किआतंकियों को पाकिस्तान से आर्म्स और आर्थिक सपोर्ट मिलना  बन्द  नहीं हुआ है । अबतक की खबरों के अनुसार उसने तो सदैव आतंक से लड़ने की तत्परता दिखायी है।

किन्तु पाकिस्तान इस मामले में सदैव अविश्वसनीय रहा है। माहौल भी अनुकूल नहीं अतः विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने इस संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है।यह दूसरे दिन के टाईम्स ऑफ इन्डिया का समाचारहै। पूर्व रवैयो को देखते हुए बातचीत का कोई खतरा इमरान खान की सकारात्मक बयानबाजी के बाद भी नहीं लिया जा सकता।सार्क सम्मेलन का वहाँ होना भी संदिग्ध है।दूसरा महत्वपूर्ण साक्ष्य नवजोत सिंह सिद्धू की अविश्वसनीयता  है ।खालिस्तान समर्थक पाकिस्तानी नेता के साथ वाजवा एवं सिद्धू की उपस्थिति हरेक के मंतव्यों पर प्रश्नचिह्न लगाता ही है।भारत जिसे सिखोंके प्रधान तीर्थस्थल ननकाना साहब के लिए कॉरिडोर बनाकर सिखों की बहुत दिनों से लम्बित इच्छा को पूरी करने की उदारता दिखा रहा है ,कहीं यह दोनों ओर की अवसरवादिता न सिद्ध हो जाए। प्रकाशित तौर पर यह पवित्र कार्य कहीं प्रच्छन्न खालिस्तान की इच्छासे जुड़ी तो नहीं। और भारत का लोक सभा चुनाव भी बहुत दूर नहीं। कभी कभी ऐसी स्थितियों मे लोकप्रियता के लिए लिए गए निर्णय भविष्य के लिये समस्या भी सिद्ध हो सकते हैं।साथ ही इमरान खान का सिद्धू को अतिशय महत्व देकर यह कहना कि क्या सिद्धू के प्रधानमंत्री बनने तक उसे प्रतीक्षा करनी होगी?यह षड़यंत्रपूर्ण माहौल का सृजन करता है। ये सारी खबरें2019 के दरवाजे पर सकारात्मकता एवम् विचार शीलता के लिए दस्तक देती हुईं प्रतीत होती हैं।

अब कुछ ऐसे सामान्य मुद्दे जो समाचारपत्रों की सुर्खयों में रहते ही हैंऔर जिनपर विचार कर अपनामंतव्य  प्रगट करना भी जनसामान्य अपना कर्तव्य समझता है वह 2019 के चुनाव के घात प्रतिघातों से सम्बद्ध हो रहे हैं। कहा नहीं जा सकता किअंततः विजय किसकी होगी। क्योंकि चुनाव जीतने के लिए स्वच्छ मतदान की प्रक्रिया के पीछे केछल बल का सहारा लिया जाना ज्यादा महत्व रखता है पुराने सिद्धांतों का टूट जाना, नये सिद्धान्तों का बन जाना आम बात हो जाती है।

अशिक्षित जनता को बहकाना  अभी भी बहुत आसान काम है और वह भी तब जब सबके हाथ में मोबाईल जैसा संगीन अस्त्र हो। तब बड़े बड़ो की मन की बात कारगर नहीं होती। आलोचनात्मक झूठ अगर सौ बार बोला जाय तो वह सच मान लिया जाता है।उन में अगर एक प्रतिशत भी सत्य हो तो वह सौ प्रतिशत का मुकाबला कर लेता है।यह ठीक है कि विरोधी पक्ष मुद्दाविहीनतासे उबरने की कोशिश कर रहा है ।  व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप में राष्ट्रीय मुद्दे त्राण पाने की कोशिश कर रहे हैं। कृषक समस्या जैसे सार्वकालिक मुद्दे उछाले जा रहे हैं जिनका समाधान आसान किसी के लिए नहीं।समस्याओं के समाधान के लिए किए सभी प्रयत्न  नाकाफी होते हैं।

फूट डालकर मन में लालसा और आक्रोश भरने की कला सिर्फ अँग्रेजों के पास ही नहीं थी।यह राजनीति का अभिन्न अंग है।तथाकथित सिद्धांतवादी भारतीय जनता पार्टी भी इससे अछूती नहीं है।महागठबंधन चाहे वह स्थायी हो याभविष्य में अस्थायी,एक बार तो किसी भी सरकार को डरा ही सकती है।प्नधान मंत्री मोदी का  हैदराबाद में दिए गये भाषण में माया ममताऔर अखिलेश को अपने स्वाभिमान और शक्ति के प्रति सचेत करनाऔर काँग्रेस को सहन नहीं करने की बात कहना इसी तथ्य का अँग है।उनके मन के नेतृत्व की भावना को हवा देना है।

न्यूज चैनल से प्राप्त समाचार और समाचार पत्रों के द्वारापुष्ट किए समाचारों से दिनाँक 29 नवम्बर को महाराष्ट्र विधानसभा ने एकमत से मराठा आरक्षण बिल पास कर दिया।नौकरी और शिक्षा में16 प्रतिशत आरक्षण उन्हें दे दिया गया है।

शुक्रवार 30 को उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लिए भी संभावित आरक्षण के द्वार खोल दिए।

आरक्षण का शब्द अब तीर कीतरह नहीं चुभता।धुर विरोधी दल भी जब ताबड़तोड़ आरक्षण दिए जा रहे हैंं तो इस नीति की सर्वमान्यता पर अब कोई शक नहीं।इसके विरोध में सबों को टॉंय टाँय फिस्स होना ही है।अलोकप्रियता का खतरा कोई दल नहीं ले सकता विशेष कर जब चुनाव सन्निकट हों।यह भी सत्य है कि समाज में सहभागिता और आवश्यकताओं के आधार पर जब सभी वर्गों ,जातियों उपजातियों को आरक्षण मिल जाता है , और उच्च तबकों को आर्थिक आधार पर आरक्षण प्राप्त हो जाता है तो  आरक्षण मूल्यहीन हो जाता है।यह समानता की उलटी ओर से की गयी परिभाषा  होगी।वर्गभेद मेटने का यह अनूठा तरीका होगा। आरक्षण पर अब कभी कोई विशेष दल तीखा रुख नहीं अपना सकेगा।

अन्त में, कुछ राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणाम आनेवाले हैं। भविष्य के गर्भ में सत्तापक्ष या विपक्ष है ,इसकी एक झलक देखने को मिलेगी।

 

आशा सहाय –8–12 -2018

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग