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सशक्तिकरण –नारी का।

Posted On: 20 Feb, 2017 Others में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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नारियाँ अशक्त हैं अतः सशक्तिकरण की आवश्यकता है। तात्पर्य यह कि अधिकार और शक्तिविहीन नारी को शक्ति प्रदान करना।शक्ति प्रदान करने की यह बात वाह्य प्रयत्न से जुड़ी हैऔर नारियों की हरक्षेत्र की वर्तमान स्थिति से उपर उठाने के संकल्प से भी जुड़ी है।आधुनिक काल का इतिहास और हमारी प्राचीन सभ्यता बताती हैकि समाज के एक तबके की नारियाँ शक्तिहीन नहींबल्कि सशक्त थीं।युद्धक्षेत्र में प्रदर्शन करती नारियों को हम शक्तिहीन नहीं कह सकते।कुछ आध्यात्मिक क्षेत्र की नारियों ने अपनी शक्ति से समाज में अपनी पहचान बनायी थी और अपने आत्मिक बल सेवंदनीय भी बनी थीं। अपने काल की जानकारियों से युक्त हो बहुतों ने समाज का नायकत्व भी किया।वैदिक काल में नारियाँ सशक्त थीं ।समाज के सभी कार्यों मे वे पुरुषों के समकक्ष थीं यज्ञों मेउनकी भागीदारी पुरुषों के समकक्ष थी।वे वेदपाठ करती थीं।हम विदुषी गार्गी का उदाहरण ले सकते हैं जिन्होंन् ऋषि याज्ञवल्क्य को तर्कों से परास्त किया था ।लोपामुद्रा ने ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं का भी प्रणयन किया था।इसी तरह मैत्रेयी,घोषा अदिति आदि का नाम भी वैदिक ज्ञान के क्षेत्र मे ससम्मान लिया जाता है। पर्दा की आवश्यकता नहीं थी उन्हे और अपने लिए पति चुनने को वे स्वतंत्र थीं।पर उस युग में भी जब उन्हे सारे सामाजिक अधिकार प्राप्त थे, पुरुषों की समकक्षता प्राप्त थी, समान रूप से शिक्षित हो सकती थीं, कुछ ही नारियों ने सशक्त हो आगे बढ़ने की कोशिश की। मानसिक रूप से सशक्त स्त्रियाँ ही इस अधिकार का सम्पूर्ण लाभ लेसकती थीं ।शेष स्त्रियाँ तत्सामयिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु गृहस्थी से सम्बद्ध कार्यों यथा कृषि ,वस्त्र बुनने, भोजन, यज्ञादि की तैयारियों में ही जीवन को समर्पित करने को ही जीवन का ध्येय बनाया था।सन्तान के पालन पोषण की सम्पूर्ण जिम्मेवारी स्वभावतः उनकी ही होती थी । प्रत्येक युगमे एक विशेष समुन्नत वर्ग की नारियों ने अपने बल पर,समाज की सहमति अथवा असहमति के बिना भी हरक्षेत्र में अपनी शक्ति प्रद्रशित की और शेष न इसके प्रति जागरूक रहीं न समाज ने उन्हे जागरु क करने का प्रयत्न किया।मनु स्मृति के विधानों ने इसीलिये नारियों की स्वाधीनता को बंधक बना पशु के समान उन्हें ताड़न का अधिकारी बना दिया।तुलसीदास ने नारियों की इसस्थिति को ध्यान में रखकर ही– ढोलगँवार शूद्र पशु नारी ,ये सब ताड़न के अधिकारी –पंक्तियों की रचना की थी।ये उसी सामाजिक स्थिति की परिचायक थीं।उनके महाकाव्य के प्रधान चरित्रों से इसे जोड़कर देखने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वे सब सामान्य नारियाँ नही थीं।यह स्थिति मध्यकाल की स्त्रियों की थी जिसने उन्हेंशक्तिहीन बनाकर एक ओर तो उन्हें मात्र भोगवासना का साधन बना दिया थासाथ ही सम्पत्तिके अधिकार से वंचित कर उन्हें पूरी तरह परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर बना दिया। वे वेद ज्ञान की अधिकारिणी भी नहीं रह गयी थीं । शिक्षा उनसे दूर हो गयी थी।परिणामतः कुछेक को छोड़ सारा स्त्री समाज अज्ञानता के अँधकार मे भटकता रहा।सामाजिक परंपरम्पराओं तक ही उनका ज्ञान सीमित रहा।
किन्तु आधुनिक युग मेजब स्त्रियों ने पुरुषों के हर कार्य मे भागीदारी निभानी आरम्भ की, स्वतंत्रता संग्राम में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया लक्ष्मीबाई जैसी युद्धक्षेत्र मे नायकत्व करनेवाली स्त्रियों के ओजस्वी चरित्र सामने आए ,तो शनैःशनैः उनहें अपनी शक्ति का एहसास हुआ।और शिक्षा के क्षेत्रमें पुरुषों की समकक्षता प्राप्त करने की स्थिति नेउन्हें रुषों के समकक्ष लादिया। यह देखा गया कि बुद्धि के क्षेत्र में स्त्रियाँ पुरुषों की प्रतियगिता मे कम नहीं बल्कि कुछ अधिक ही सम्पन्न रहीं परिणामतः प्रयत्नशील और सुविधा सम्पन्न स्त्रियों ज्ञान विज्ञान के हर क्षेत्र में सशक्त कदमरखनाआरंभ किया।शक्ति के इस एहसास ने जहाँ उनमें अंतरिक्ष मे जाने की भी लालसा पैदा कर दी,ज्ञान विज्ञान के सारे दरवाजे उनके लिए खुल गये।शिक्षण चिकित्सा,कला विज्ञान के हर क्षेत्र,मीडिया,प्रशासन इंजीनियरिंग आदि सभी क्षेत्रों में उन्होंने अपनी प्रतिभा पूरा परिचय दिया है।सामाजिक और राष्ट्रीय नेतृत्व के क्षेत्र में जो भूमिका उन्होंने निभायी है वह आद्वितीय है। यह स्थिति स्त्रियों के विकास क्रम की यह गाथा कमोवेश पूरे विश्व की नारियों की विकास गाथा है. ।विश्व ने नारियों की शक्ति को पहचान लिया है फिर भी हम उन्हें पूरी सवतंत्रता देने से कतरा रहे हैं।यह पुरुष प्रधान मानसिकता का परिचायक है।अदिकाल से जिस मानसिकता को पुरुषों नेभोगा है ,उसे छोड़ना या उसके साथ समझौता करना इतना सरल भी नहीं है पर हर युग में बौद्धिकता और अबौद्धिकता का फर्क तो होता ही है।
सशक्तिकरण स्वातंत्र्य का अनुगामी होता है।किसी क्षेत्र को सशक्त करने के लिए प्रथमतः उसे सभी बाधाओं और अवाँछित बंधनों से मुक्त करने की आवश्यकता होती है।मार्ग की अड़चनें राह देकर जबतक किनारे नहीं हो जातीं तबतक विकास का पथ प्रशस्त नहीं होता।नारी सशक्तिकरण नारी विकास पथ का उत्तर भाग हैजब वह मुक्त होकरअपनी शक्ति को विकसित करने में समर्थ होने लगती है।कई मायनों में यह सशक्तिकरण उसके सतत विकास की कहानी है। सामाजिक तौर पर ,रूढ़ियों, परम्पराओं ,गृह और सामाजिक बंधनों को तोड़कर पुरुषों की भाँति घर के बाहर कदम रख शिक्षा के वातावरण में प्रवेश करना ही सीढ़ी का प्रथम पायदान है।
सबसे कठिन समस्या आज भी इसीलिए गाँवों देहातों मे रहनेवाली बच्चियों किशोरियों और युवतियों के लिए है जिन्हें बहुत कठिनाई से ही ऐसा वातावरण मिलपाता है । इच्छाशक्ति की कमी भी उनमें कभी कभी होती है।किन्तु किसी भी स्थिति में शिक्षा ही वह पहली शर्त है जो उनमें प्रतियोगिता की भावना जाग्रत करतीहै। स्वाभिमान की रक्षा करना सिखाती है और अधिकारों की बातें करना भी सिखाती है।अपने आयुवर्ग के विद्यार्थियों के मध्य जाग्रत प्रतियोगिता की यही भावनाएँ भविष्य मे अन्य प्रतियोगिताओं की आकाँ क्षा पालने मे उनकी मदद भी करती है।इन सबों केलिए अभिभावकों एवम् समाज के अन्य सदस्यों की जागरुकता विशेष महत्व रखती है।
यह एक अच्छी बात है कि देश के बहुत सारे राज्यों में स्त्री भ्रूण हत्या की घटनाओं में कमी आरही है।इसतरह सामाजिक स्तर परउनको स्वीकार्यता मिलती है।शिक्षा के दोरान और पश्चात उन्हें उनके सांवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।जीने काअधिकार एवम शोषण के विरुद्ध आवाज उठानेके अधिकारों केप्रति विशेष जागरुकता की आवश्यकता है। घरेलु हो या सामाजिक—शोषण के स्वरूप को समझनाऔर पुरुषो की समकक्षता का सम्पूर्ण लाभ उठाने के प्रति जागरुक होना भी आवश्यक है ताकि वे हीन भावना से ग्रस्त नहो पाएँ।यह बराबरी की दृष्टि ही सामाजिक स्वतंत्रता है जो विवेक आधारित है।परिवार में स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचार रखना एवम घर के कार्यों में अपनी सहभागिता को स्वतंत्रतापूर्वक दिखा सकें,विवशता और लाचारी के साथ नही,–आत्मसम्मान की भावना मे वृद्धि करता है जो सशक्तिकरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।इस स्वतःस्फूर्त पारिवारिक सम्मान का सम्बल ले नारियाँ आज तक आगेबढ़ सकी हैं।
अभी भी जमीनी स्तर पर स्त्रियों की संप्रभुता को रोकने के लिए तरह तरह के उपाय किए जाते हैं।उन्हें अपनी उन्नति का साधन बनाने की भी कोशिश की जाती है।उच्च पदों परआसीन होने के पश्चात भी स्वतंत्र निर्णय लेने से उन्हें रोका जाता है।शिक्षित समुदाय को छोड़ दें तो अशिक्षित समुदाय ,चाहे वे महलों में ही क्यों न रह रहे हों ,ने अपनी मानसिकता नहीं बदली है।यहीं नारियाँ अशक्त हो जाती हैं। शारीरिक शक्ति के बल पर वह घर बाहर के बड़े -बड़े कार्यों को अंजाम देती हैं किन्तु समुदाय के बड़े मुद्दे पर निर्णय लेने के प्रश्न पर उन्हें पीछे ढकेल दिया जाता है।स्त्रियों को स्त्री कहकर भी अपमानित किया जाता है।शिक्षाका शतप्रतिशत प्रावधान और उच्चतर शिक्षा का निःशुल्क होना उनकी स्थिति को सुधारने में मददगार हो सकता है।समाज मे जागरुकता पैदा करने के प्रयास अभी नाकाफी हैं। शिक्षा ही उन्हे इस अंधकार से उबार कर अपने बल बूते आगे बढ्ने मे मदद कर सकती है।
आज विकास को हासिल करने के लिए आरक्षण को बड़ा महत्वपूर्ण साधन मान लिया गया है,किन्तु महिलाओं को आगेबढ़ने के लिए संभवतःआरक्षण का सहारा नहीं चाहिए। महिलाएँ बुद्धि मे पिछड़ी नहीं वरन् बहुत क्षेत्रों मे बढ़चढअपनी बुद्धि का प्रदर्शन कर चुकीहैं,। आरक्षित होनेपर उनमें स्पर्धा और मनोबल की कमी हो सकती है और आगे चलकर इसका अभ्यस्त होना उन्हे भी राजनीतिक चालों का मोहरा बना सकताहै।यहउनके उन्नयन नहीं अवनयन का कारण बन सकता है।
महिलाओं ने अब आगे बढ़कर बहुत सारे सामजिक सुधारों से सम्बन्धित कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी दिखानी आरंभ कर दी है।नशाबंती शराबबंदी जैसे आंदोलन उनकी सक्रियता की माँग करते हैं और भुक्तभोगी महिलाएँ अब अपनी वाँछित भूमिका का महत्व समझने लगीहैं।
महिलाएँ स्वावलंबन का महत्व समझने लगी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों मे इस से सम्बद्ध जागरूकता काप्रवेश सशक्तिकरण की दिशा में अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम है।अपनी जरूरतों के लिए महिला समितियाँ बनाकर योजनानुसार पैसे इकट्ठे करनाऔर अपने और अपने परिवार की जरूरतों की पूर्ति के लिए आगे बढ्कर हिस्सा लेना उनमें सकारात्मक सोच भरने की स्थिति है ।इससे परिवार में उनका कद बढ़ता है।पुरूषों पर निर्भरता में कमी उनके स्वाभिमान की रक्षा करता है।
आज जब नारियों को संवैधानिक रूप से सामाजिक ,राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में अधिकार दे दिये गए हैं तो आवश्यकता है उन अधिकारों के संरक्षण एवम् सही ढंग से अनुपालन की और इसमे समाज के बौद्धिक वर्ग की जागरुकता और निर्देशन की आवश्यकता तो है ही, प्रशासन के हर तबके के निष्पक्ष सहयोग की भी अनिवार्यता है। क्योंकि सारी समस्याएँ इन्ही दोनों की निष्क्रियता से उत्पन्न होती हैं।
महिलाएँ चाहे जिस जाति धर्म की हों ,उनकेसामाजिक अधिकार व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े होते हैं, अतः समाज को लिंग भेद के आधार पर शोषण करने की मनोवृति त्यागनी होगी।आर्थिक अधिकारों की रक्षा तो कानून की शरण में जाने से हो सकता है परसामाजिक रूप से अंदर ही अंदर प्रताड़ित, बंधक बनी महिलाओं पर दृष्टि रखनी कठिन है। अतः चेतना फैलाने की आवश्यकता है।
किसी भी जाति धर्म की स्त्रियों पर विचार करते हुए अनायास ही ट्रिपल तलाक जैसा नारी विरोधी मुद्दा सामने आजाता है। सम्बन्धित प्रकरण पर आवाज उठाना निश्चय ही नारी सशक्तिकरण का प्रमाण है।इस सम्बन्ध में अवश्य ही उनके अनूकूल निर्णय होने चाहिए।
— हर विषय के दो पहलू होते हैं।आगे बढ़ती हुई महिलाएँ,सशक्त होती हुई महिलाएँ बाहर अपनी जगह बनाने के मद में ,भौतिकवादी युग के प्रलोभनों में पुरुषों की तरह ही,गाँव घर परिवारऔर समाज की अवहेलना और उपेक्षा भी करती हैं ।टूटता परिवार, टूटती शादियाँ,तलाक कीबढ़ती घटनाएँ,और बच्चों के लिए माता पिता दोनों के संरक्षण का अभाव आदि ऐसी स्थितियाँ भी उत्पन्न हो रही हैं।आत्मनिर्भर महिलाएँ दो तरह की मानसिकता से ग्रस्त हो सकती हैंजो उनके मूल स्वभाव सॆ प्रभावित होती है।कुछ तो अपनी दुहरी जिम्मेदारी के निर्वहन को प्रयत्नशील होती हैं ,और कुछजिम्मेदारियों से पूर्णतः मुक्त होने को प्रयत्नशील।नारी सशक्तिकरण की दिशा में विशेषकर परिवार के पुरुषों की मानसिकता मे आमूल परिवर्तन की अपेक्षा है तभी संतुलित विकास भी संभव है। विश्व जनसंख्या की पचास प्रतिशत स्त्रियों की स्थिति विकास मे पचास प्रतिशत की भागीदारी के रूप में हो और सहायक हों शेषपचास प्रतिशत पुरुष ।तभी सशक्तिकरण का निहित उद्देश्य पूर्ण हो सकता है।
धीर-धीरे स्थिति में अनुकूलता आरही है। दृष्टिकोण भी बदल रहे हैं और नारियो को दी जाने वाली सुविधाओं का सही लाभ लेकर वे परिवार समाज ,राष्ट्र केविकास में अधिक भागीदारी निभा सकेंगीं ऐसाविश्वास करना उचित ही है।

आशा सहाय।20 -2- 2017–।

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