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सुरक्षात्मक माहौल

Posted On: 30 Jan, 2019 Common Man Issues में

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ashasahay

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अक्सर पत्र पत्रिकाओं मे महिलाओं की समस्याओं पर महिलाओं द्वारालिखित रचनाएँ पढ़ने को मिलती हैं। जिनमे नारियों के अधिकारों से उनकी पहचान कराने की चेष्टा की जाती है। ऐसे ही एक लेख में पढ़ने को मिला कि वर्किंग महिलाओं को  सुरक्षात्मक माहौल काअधिकार चाहिए।

प्रत्यक दिन   नारी सशक्तिकरण की हम चर्चा करते हैं,नारी को शक्तिशाली बनाने की योजनाएँ बनातेहैं,वे पुरुष आधृत न हों,समाज में अपनी जगह स्वयं बना सकें,अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें,इसके लिए सरकारी गैर सरकारी स्तर पर प्रयास भी निरंतर किए जा रहे हैं  इनप्रयासों की सार्थकता  भी निस्संग्दिग्ध है पर अपने लिए नारी को स्वयं विचार करना होगा कि क्या वे यही चाहती हैं ?क्या इसी तरह वे शक्ति सम्पन्नता की गरिमा से युक्त हो सकती हैं?अब ,जब कि नारियाँ देश विदेश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन विश्व ज्ञान विज्ञान और राजनीति को दिशा देने मे निरंतर सचेष्ट हैं ;हमारे देश की नारियाँ अभी भी सुरक्षात्मक माहौल की खोज कर रहीहैं, इसे वे अपना अधिकार मानती हैं।प्रश्न है कि सुरक्षा किससे? सुरक्षा कौन देगा?सरकार? वह संस्था जहाँ वे सौभाग्यवश काम करती है? किन्तु सड़क , चौराहे,बस, रेल के डब्बे?कौन कहाँ कहाँ सुरक्षा देगा?सब जगह पुलिस?पर पुलिस ही कौन सी बड़ी चरित्रवान है जिसपर सम्पूर्णतः निर्भर रहा जाए?आए दिन उसके कारनामों की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं।कुल मिलाकर ऐसी सुरक्षा तो आज से पचास -साठ वर्ष पूर्व लड़कियाँ ढूँढ़ती थीं।अकेले कहीं आना जाना नहीं , स्कूल कॉलेज भी आना जाना हो तो माता पिता अभिभावक की दिन भर की चिन्ता ।वे लड़कियों की शादी करके ही निश्चिन्त होते थे। पर उस समय भी एक वर्ग इन चिन्ताओं से मुक्त होना चाहता था ।यह समाज का प्रगतिशील वर्ग था। स्त्रियो के मनोबल को निरन्तर बढ़ानेवाली सोच तब भी समाज के एक तबके में वर्तमान थी।  आज इस विचारधारा को आगे बढ़ाने मे समाज और राज्य का भरपूर सहयोग जहाँ मिलना चाहिए वहीं ऐसा प्रतीत होता हैकि वे इस भावना का सम्पूर्णतः वपन समाज की नारियों में नहीं कर सके। बार बार अन्यथा उन्हें अपने अबलापन का एहसास नहीं होता, निरंतर सहाय्य की माँग वे नहीं करती।

यह सही है कि एक व्यक्ति के रूप में नारियाँ स्वतंत्र रहना चाहती हैं,आत्म निर्भरता भी चाहती हैं।नौकरी उनकी विवशता होती है जहाँ वे सुरक्षात्मक माहौल की माँग करती हैं।

दुर्भाग्य से शिक्षा अभी तक लड़कियों की शत प्रतिशत नहीं है नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी भी पचास प्रतिशत नहीं ,जिसकी वे हकदार होती हैं,परिणामतः इक्की दुक्की या अल्प संख्या में काम करने वाली महिलाएँ संस्थानों में पुरुषों के तथाकथित अत्याचार , गलत द़ृष्टि  या व्यवहार की शिकार हो जाती हैं,शब्दवाण झेलती हैं, सेक्सी टिप्पणियाँ झेलती हैं, कभी कभी यौन प्रताड़ना की शिकार भी हो सकती हैं।अतः इन सबसे सुरक्षा का अधिकार उन्हें चाहिए। यह अधिकार किस रूप मे?यह सोचने का विषय है। इनकी शिकायतों को सुन उसपर कारवाई करने वाली समीतियाँ हर स्तर पर हों और उनकी सुरक्षात्मक समस्याओं का निदान प्रस्तुत कर सकें।यह सही है कि एक अच्छी शासन व्यवस्था में प्रशासन का यह दायित्व होना चाहिए।

प्रश्न है कि नारियों की सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं का क्या  यही सही हल है?क्या इन वाह्य सुरक्षात्मक पद्धतियों से नारी अपनी महत्ता बनाए रख सकेगी?क्या इस तरह वह अपनी आधी जिंदगी दरिंगदियों, पुरुषों के घृणात्मक रवैयों से लड़ने में ही नहीं गुजार देगी?स्पष्ट ही यह शत प्रतिशत समाधान नहीं हो सकता।

यह मूलतः एक सामाजिक समस्या है।जन्म से ही बालिकाओं को हीन भावनाओं से युक्त कर देने की समाज की सोच उन्हें पुरुषों केी वरावरी करने से रोक देती है। परिवार के साथ समाज भी इसके लिए समान रूप से उत्तरदायी है।

आज भी, जब हर क्षेत्र में स्त्रियाँ पुरुषों की  समकक्षता ही नहीं,उनसे अपनी श्रेष्ठता भी सिद्ध कर रही हैं, समाज उनके साथ भेदभाव करने से नहीं चूकता।यह मध्यकालीन सोच है,जब यह देश मुगलों से आक्रांत रहा था।उस सभ्यता की सोच हमारी सभ्यता में जगह बनाने लगी ,परिणामतः स्त्रियों को विशेष सुरक्षा की आवश्यकता पड़ने लगी।हमारी प्राचीन आर्य सभ्यता में नारियाँ संपूज्य थी , स्वतंत्र थीं । उनपर ऐसी बंदिशें नहीं थी।पर हावी होती मध्यकालीन सोच ने उन्हें पराश्रयी बना दिया।हमारी वेदकालीन मौलिक चिन्तन में स्त्रियाँ भार स्वरूपा नहीं थीं।यह लादा हुआ चिन्तन हैजिससे आजतक विशेषकरहमारा निम्नमध्यवर्गीय समाज पीछा नहीं छुड़ा सका है । स्त्रियों के गौरवशाली व्यक्तित्व को इस चिन्तन ने बहुत हानि पहुँचाई है।यह चिन्तन निम्न मध्यवर्गीय ही है पर आर्थिक रूप से सम्पन्नलोगों की सोच भी ऐसी हो सकती है जो अपनी सुसम्पन्नता के बल पर स्त्रियों कोस्वतंत्रता नहीं देकर उन्हें सातपर्दों में रखना चाहते हैं।आज देश स्त्रियों को समानता के मंच पर पुरुषों के साथ खड़ा देखना चाहता है पर शताब्दियों से चली आती इस सोच से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है।इस चिन्तन को बदलना एवं स्त्रियों को मानसिक और शारीरिक रूप से सशक्त करने की आवश्यकता है ताकि वे ऐसी असुरक्षा से भयभीत न होकर उनका जमकर सामना करें।

हमें समाज की सोच को बदलने की आवश्यकता है ।.यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य तो है ही ,समय माँगनेवाला है।सबसे बड़ी बाथा उनका मिथ्या परंपराप्रेम है।इस से ही लड़ना आवश्यक है। या तो यह सोच धीरे धीरे बदलेगी या आज की युवा पीढ़ी के प्रौढ़ हो जाने तक हमें प्रतीक्षा करनी होगी.ताकि समाज और परिवार का नेतृत्व कर वह इस सोच को बदलने में सक्षम हो।

एक अन्य महत्वपूर्ण विचारणीय समस्या समाज की उस विकृत मानसिकता से जुड़ी है जिसका स्तर व्यक्ति व्यक्ति में अलग अलग होता है।कुछ अधिक विकृत मानसिकता वाले लोगों के लिए दंड व्यवस्था अनिवार्य है। पर दंड कौन दे? अवश्य हीवयह अधिकार मुख्य रूप से न्यायालय को है पर समीतियाँ इन मसलों को न्यायालय तक ले जाएँ और न्यायालय  न्याय करे तबतक काफी विलम्ब हो जाता है।विलम्ब से किया गया न्याय अपनी गरिमा कम कर देता है।कभी कभी लोग ऐसे प्रसंगों का न्याय समूह के हाथों में दे देते हैं। यह अल्प समय का समाधान तो होता है पर स्वयं एक अपराध बन जाता है।यह विकृत मानसिकता अवश्य ही मनःविकृति की मनोवैज्ञानिक समस्या है पर इतने बड़े स्तर पर उत्पन्न होनेवाली  इस समस्या का कोई सामूहिक निदान नहीं हो सकता । प्रश्न है किउपरोक्त स्थितियों में आखिर इस समस्या से कैसे निपटा जाय।

मेरी समझ से इन समस्याओं का निदान स्वयं नारियों के हाथों में ही है। उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से सशक्त होना पड़ेगा, वह भी इतना कि ऐसी विकृत मानसिकता के लोग उन तक फटक भी न पाएँ। स्वयं को दीन हीन और अशक्त मानकर सहकर्मियों से पेश आना, उनके लिए कदापि सुरक्षित नहीं।जहाँ उनके साथ अन्याय होता हो ,उस अन्याय का विरोध मुखर होकर करना,जहाँ उनकी प्रतिभा का शोषण होता हो, उसका विरोध सामाजिक रूप से मुखर होकर करना आवश्यक है।इसके अतिरिक्त भी कार्यक्षेत्र की पेचीदगियों को सुलझाने का स्वयम प्रयत्न करना,पुरुषों के सामने गिड़गिड़ाने से बचनाऔर अपनी कार्यक्षमता को निरंतर बढ़ाते जाना  आदि  ऐसे  प्रयत्न होंगे जो उनके कार्यक्षेत्र में स्वयं उनको प्रभावी बनाएंगे।संयत व्यवहार और संयत वेश विन्यास की भी आवश्यकता है।

वस्तुतः उन्हें सुरक्षात्मक माहौल के अधिकार की  नहीं, स्वयं सुरक्षात्मक माहौल बनाने की आवश्यकता है।

यह नारी सशक्तिकरण का युग है।हर क्षेत्र में नारियाँ प्रतियोगात्मक भाव से आगे बढ़ रही हैं।अपने चतुर्दिक वह किससे सुरक्षात्मक माहौल बनाने की प्रतिपल अपील करना चाहती हैं? वे तो देश की रक्षा के लिए फ्रंट पर सेना के रूप में अवतरित हो रही हैं।उन्हें अपनी आत्मशक्ति को जागृत करना होगा। वह शक्तिरूपा है । अपने इस रूप का वह आह्वान करे, सुरक्षात्मक माहौल तो अपने आप उत्पन्न होगा।

 

आशा सहाय –30–1–2019–।

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