blogid : 21361 postid : 1012740

स्वतंत्रता तू स्वयं प्रकाश

Posted On: 14 Aug, 2015 Others में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

146 Posts

345 Comments

स्वतंत्रता तू स्वयं प्रकाश
दासता विस्मृत हुई गर
आलोकित कर पुनः विस्मृति
चेतना का कर विकास

लौह बन्धन टूट गये पर
नहींअभी निर्बन्ध मानस
मूढ़ता जड़ता मिटा
नव चेतना का कर विकास
स्वतंत्रता तू स्वयं प्रकाश

दीखता नहीं तम घिरा जो,
मनुज के मन के चतुर्दिक,
घोर ईर्ष्या घोर मद,
घोर मनुज काअहंकार,
आस्था भी हिल गई
शान्ति का था केन्द्र जो,
तीक्ष्ण किरणें भेज हृदय में
आलोकित कर पुण्य विचार
स्वतंत्रता तू स्वयंप्रकाश।

स्वार्थ केन्द्रित हो रहा नर
भोगता अधिकार मात्र,
भूलता, अधिकार तो बस,
,झेलता कर्तव्य भार।
मूल रक्षा मंत्र है यह
मूल मंत्र विकास का
अर्ध जाग्रत मनुज में भर
रजत किरणों का उजास।
स्वतंत्रता तू स्वयं प्रकाश।।

है तेरा आलोक अलौकिक,
आलोकित सम्पूर्ण विश्व,।
अब नहीं कोई शेष स्थिति
रौंद सके कोई मारत-भूमि
क्षुद्र निज प्रयास सेही
तोड दे भारत की भूमि

किन्तु अपनी ही कुनीति
तोड़ न दे कहीं राष्ट्र ऐक्य
भय यही अब शेष है बस
स्वार्थ की बढ़ती कुहा को,
निज प्रभा से नष्ट कर
नव चिंतन को दे दिशा
अब चेतना का कर विकास।
स्वतंत्रता तू स्वयंप्रकाश।।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग