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हिन्दी का विकास और विस्तार

Posted On: 15 Sep, 2017 Others में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

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हर हिन्दी–भाषा- भाषी, हिन्दी प्रेमी, हिन्दी साहित्य का अध्येता, इस भाषा के तहत विचारों में डूबने उतराने वाला व्यक्ति हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के विषय में थोड़ा तो अवश्य सोचता है और इनमें सबसे प्रमुख सोच होती है हिन्दी को विश्व पटल पर उचित स्थान दिलाने की। हिन्दी जो हमारे देश की ऐसी राष्ट्रभाषा के रूप में आजादी के इतने सालों बाद भी राष्ट्रभाषा के रूप में उपेक्षा का दंश झेलती है, आये दिनों विरोध के स्वर सुनती है, आहत होती है विदेशों में अपने परचम लहराए तो कैसे?


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मुझे इस भाषा से विशेष लगाव है अतः मैं इसका विकास और विस्तार चाहती हूँ। विकास की परिभाषा बड़ी जटिल है। प्राचीन काल से ही भारतीय आर्य भाषाओं ने अपने विकास की पुरजोर कोशिश की है, पर ये तो प्रवाहमान नदियाँ हैं अपने साथ इर्द गिर्द की मिट्टी ,कांकर पत्थर की सुगंध लेकर चलना नहीं भूलती हैं। यह जिन्दादिली ही इनके अस्तित्व को बनाए रखती हैं। किंचित परिवर्तनों को स्वीकार करती हैं। कहीं क्षेत्रीयता को ग्रहण कर अधिक जीवंत बनती हैं और शब्दों के ह्रास विकास की नयी नयी भंगिमाओं को अपनाकर अपने को समृद्ध और गरिमामय बनाकर लोकप्रिय होती रहती हैं।


अपने आरंभिक रूप से आज के स्वरूप को प्राप्त हुई भाषाओं को कितनी ही बार व्याकररण के बंधनों में बंधकर परिनिष्ठित कहाने का गौरव प्राप्त हुआ। तरह-तरह के साहित्य की रचनाओं से वे समृद्ध हुईं पर वे जनजनार्दन का पल्ला पकड़ टूट फूट के साथ आसपास की भाषाओं के अनुकूल शब्दों को अपने साथ मिलाते हुए आगे बढ़ती गयीं। संस्कृत प्राकृत अपभ्रंश के पड़ावों के बाद ही आधुनिक भातीय भाषाएँ उदित हुईं और एक बहुत बड़े क्षेत्र में विभिन्न तरीके से बोली जाने वाली हिन्दी को उनमें विशेष प्राधान्य मिला।


काल क्रम से प्रभूत साहित्य की रचना हुई पर जरा भारतेन्दु काल से लेकर आज तक की हिन्दी के स्वरूप को देखें तो समझ में सहज ही आ सकता है कि इसकी समृद्धि के पीछे इसकी उदार ग्रहणशीलता है। यही इसके विकसित स्वरूप का रहस्य है जिसमें उसने भारत में आनेवाली, रहनेवाली जातियों की भाषाओं, बोलियों के विभिन्न शब्दों को परम आत्मीय की तरह गले लगा लिया है।


बहुत सारे हिन्दी प्रेमी आज भी हिन्दी को संस्कृत निष्ठता की ओर ढकेलना चाहते हैं। क्या इस तरह वे इसे सहज विकास की गति से वापस मोड़ना नहीं चाहते? संस्कृतनिष्ठता अच्छी चीज है। सरसता भी उत्पन्न कर सकती है पर व्यापकता बाधित हो जाएगी। हिन्दी मात्र साहित्यप्रेमियों के अनुराग के पोषण के लिए हो तो उसके क्षेत्र को हम सीमित कर देंगे। पर इसे तो भारतवर्ष के जन जन की भाषा बनानी है, एक प्रभावशाली सम्पर्क भाषा बनानी है, बिना किसी से प्रतिद्वन्दिता किये सबके दिलों पर छा जाना है। इतना सरल बनाना है कि अपने अंदाज और भंगिमाओं में सभी इसे बोल सकें, समझ सकें।


इसे विस्तार देना है। विस्तार के लिए सभी भाषाओं के हल्के-फुल्के शब्दों को साहित्य के माध्यम से इसमें स्थान देना है। मैं हिन्दी साहित्य की अध्येता भी हूँ। जय शंकर प्रसाद की संस्कृत निष्ठता मुझे बहुत प्रिय है पर सर्व साधारण तो उसमें डूब नहीं सकता। यह तो तब होगा जब सब में हिन्दी के प्रति रुचि जागृत हो जाए। तो रूचि जाग्रत करने के लिये उनके पास तक हिन्दी को पहुँचाना होगा।


हाँ, जिस सन्दर्भ में ये बातें महत्व रखती हैं, वह अपने ही देश के उन राज्यों से जुड़ा है, जो कठिनता के आधार पर हिन्दी से परहेज करते हैं। कम से कम उनका एक तर्क तो यह भी होता ही है। दूसरा तर्क देते हए वे इसे अपनी क्षेत्रीय भाषा के विकास में बाधक समझते हैं। हमारी उदारता यहीं खंडित होती दिखती है, जहाँ हम हिन्दी को विशुद्ध स्वरूप में अंगीकार करने को बाध्य करते हैं।


उन्हें अपने प्रयत्नों से यह समझाने की आवश्यकता है कि हम उनकी भाषा का सम्मान करते हैं और सीखना बोलना भी चाहते हैं। यह समस्या दक्षिण भारतीय भाषाओं से अधिकतर जुड़ी है। वे चूंकि द्रविड़ समुदाय की भाषाएँ हैं हमारी सहज पकड़ में नहीं आतीं पर कुछ प्रचलित शब्दों को, वस्तुओं के नामों को भंगिमाओं से सम्बन्धित शब्दों को हिन्दी वाक्य विन्यास में स्थान देकर हम कुछ उदार बन सकते हैं।


जब अंग्रेजी उर्दू, फारसी शब्दों का धड़ल्ले से अपने हिन्दी लेखन में प्रयोग कर सकते हैं, तो उन भाषाओं के शब्दों का क्यों नहीं अगर अपने क्रियापदों के लिंग वचन से समझौता किए बिना ऐसा होता है तो परम स्वागतयोग्य है। पर ,कभी –कभी बोलचाल की भाषा में तत्सम्बन्धी टूट -फूट भी बर्दाश्त करनी पड़ सकती है। हम अपनी भाषा की व्याकरणसम्मतता को तब तक उन पर नहीं लादें जब तक समुत्सुक हो वे इसके लिए प्रस्तुत न हो जाएँ।


आज एक अखबार में राष्ट्रपति श्री कोविन्द द्वारा ऐसे भावों, विचारों को अभिव्यक्त करने से मेरे विचारों को बल मिला। कितनी आत्मीयता प्रगट हुई जापानी प्रधानमंत्री के द्वारा अपने वक्तव्य के आरम्भ में नमस्कार और अन्त में धन्यवाद शब्द का प्रयोग सुनकर। यही आत्मीयता देश के अन्य राज्यों के साथ हमें प्रदर्शित करनी है। यह भाषाजनित आत्मीयता का आदान प्रदान होगा।


घबराने की बात इसलिए नहीं है कि लिखित रूप मे ऐसा करने से भाषा समृद्ध ही होगी, दीन हीन नहीं। सरकार को भी पुनः इस दिशा में ताजे प्रयत्न करने होंगे। विभिन्न भाषाओं के प्रचलित शब्दों के हिन्दी रूपों या इसके विपरीत स्वरूप के छोटे–छोटे शब्दकोष निकलवाने होंगे। छोटे इसलिये कि उत्सुकतावश और अपनी सामर्थ्यानुसार लोग इन्हें खरीद सकें। छोटे-छोटे स्टालों पर इन्हें उपलब्ध कराए जाएं, तो लोग अनायास आकर्षित होंगे। सिद्धान्तों को व्यवहार रूप में परिणत करने का यह अच्छा तरीका हो सकता है।


अगर अपने प्रयत्नों और भाषाजनित उदारता से अपने देश में अंग्रेजी के समानानतर हिन्दी को हम प्रतिष्ठितकर सकें, तो हिन्दी के विश्व में विस्तार के द्वार खुद ब खुद खुल जाएँगे। तब हमें गिनना नहीं पड़ेगा कि हिन्दी विश्व भाषाओं में कौन से पायदान पर है। बस हमें अपनी भाषा को बदले हुए विचारों के तहत साहित्य से समृद्ध करना है।

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