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डर तो अपनों से ही है!

Posted On: 13 Aug, 2019 Politics में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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मैं कोई बड़ी राष्ट्रभक्त नहीं।न ही राष्ट्र की सीमा को मैं अपनी सीमा मानती हूँ।पर राष्ट्रप्रेम ,राष्ट्रभक्तिको सर्वदा ध्वनित भी नहींकिया सकता।वह तो हृदय के अन्दर ही अन्दर पलनेवाली एक ऐसी स्नेहधारा है,जिसे व्यक्ति का ममत्व सहारा देता है।यह मेरा है, इसे कोई मुझसे छीन नहीं सकता,इसकी साज संभार मुझे ही करनी है,कुदृष्टियों से भी बचाना है।ठीक वैसे ही, जैसे एक माँ अपने बच्चे के लिए करती है।अधिकार की भावना, यों जैसे एक संतान अपनी माँ पर रखती है।इस जुड़ाव को पालने की आवश्यकता नहीं होती। एक सरल सच्चे मन में यह अनायास ही पलता रहता है। राष्ट्र के प्रति प्रेम को दिव्य प्रेम की संज्ञा दे सकते हैं जिसे सीमा पर रहनेवाला प्रहरी सर्वाधिक महसूस कर सकता है।

370 और उससे जुड़े 35 ए के प्रावधानो ने कश्मीर की स्थिति जटिल कर दी थी।. इन धाराओं का लाभ उठाकर पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी गुटों ने वहाँ की जनता के मन में अलगाववादी दृष्टि भर दी थी। इस अलगाववाद के जहर ने पूरे भारत में पैर पसारना आरमेभ कर दियाथा। एक संघर्ष का वातावरण चारो ओर व्याप्त हो गया था जिसे राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जगत मे आजादी के संघर्ष से अभिहित किया जाने लगा था । एक भारतविरोधी माहौल का सृजन हो रहा था। भारत की शक्ति दिन रात आतंकियों से निबटने में लग रही थी।

काश्मीर की सामान्य जनता के हिस्से के अधिकारों को कुछ खास लोगों ने छीन लिए थे और उसे बनाए रखने के लिए दुश्मनों का साथ लेने से भी नहीं चूक रहे थे। वहाँ का विकास अवरुद्ध था। बाहर के लोगों का स्थायी निवास वहाँ हो नहीं सकताथा।दलितो और स्त्रियों पर बहुत सारी पाबंदियाँ थीं।

कश्मीर की  यह स्थिति असह्य होती जा रही थीऔर किसी साहसी व्यक्ति के साहसी कदम की प्रतीक्षा मे् थी कि वह उस धारा को हटा दे,साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय जगत कोयह विश्वास दिला दे कि अपनी संवैधानिक सीमा में रहकर अपने देशके अधिकारों की रक्षा की गयी है।देश के अपने अधिकार जिसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की बार बार कोशिश की जा रही थी। इस धारा को अंशतः अथवा सम्पूर्णतः हटाने का साहस करना आसान नहीं था विशेषकर तब जब वहाँ के कुछ प्रभावशाली दल  इसे हटाने को लेकर रक्तरंजित क्रांति की धमकियाँ दे रहेथे। ऐसी स्थिति में  देश का बौद्धिक युवा वर्ग ऐसे ही किसी ठोस कदम की प्रतीक्षा कर रहा था।

यह धारा बहुलाँश में संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए हटा दी गयी।इसे बनाए रखने को बेचैन पाकिस्तान में खलबली मच गयी। अन्तर्राष्ट्रीय जगत कीअबतक की प्रतिक्रियाओं ने विरोध नहीं प्रगट किया है । पर पाकिस्तान के मन की खलबली साजिशें रच रही है आतंक को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया में संलग्न है। उसकी ऐसी प्रतिक्रिया तो अवश्यंभावी और स्वाभाविक  ही है।

सम्पूर्ण देश ने इस बहुप्रतीक्षित क्षण का स्वागत किया।यह वह नासूर था जिसे देश स्वतंत्रता  पश्चात के कबाईलियों के हमले के पश्चात से ही झेल रहा था , । इस का इलाज तत्काल किया जा सकता था पर नेहरु के अंदर छिपे भय और शेख अब्दुल्ला के प्रति उनके अतिशय झुकाव ने ऐसा होने नहीं दिया। इस सम्पूर्ण काश्मीर के विषय को यू एन से जोड़करऔर अधिक जटिल बना दिया ,जिसका खुल्लम खुल्ला लाभ पाकिस्तान ने लेना आरम्भ किया। नेहरु कीयह तात्कालिक राजनीति भय और विश्व समाज को अपनी न्यायप्रियता प्रदर्शित करने एवं तद्जनित छवि बनाने के लोभ की राजनीति थी ।उनकी आँखों के  सामने वहाँ का मुस्लिम बहुल समाज था और देश के बँटवारे के समय का एक वैचारिक बंधन।

आज भी काँग्रेस के उस धड़े का 370 हटाने को स्वीकार नहीं करना ,नेहरु के प्रति वैचारिक वफादारी का सबूत है और मृतप्राय उसकी उपयोगिता को किसी न किसी विध जिलाकर रखने का प्रयास।निरंतर अपने बंधनों में मकड़ी की तरह उलझते जाने की प्रकृति भी। व्याख्यायें बहुत हो सकती हैं पर सैद्धांतिक मतभेद की आड़ में अपनी निरुद्येश्य विरोध को प्रदर्शित कर एक कमजोर सूत्र से पाकिस्तानी विचार से जुड़ने में वे अपनी सार्थकता देख रहे हैं। यह तो स्वयं को किसीविध जिलाए रखने का प्रयत्न मात्र है।एक सीधा और साफ समाधान उन्हें पसंद नहीं।मुद्दाविहीनता की यह पराकाष्ठा है।

नेहरु की तात्कालिक विवशता रही होगी।पर कश्मीरवासियों का दिल जीते जाने काऔरदेश के प्रति वफादार बनाए जाने का उन्हें विश्वास था। स्थितियों को देश के अनुकूल बनाए जाने का भी उन्हें विश्वास था।बहुत मायनों में यह सही थाकिन्तु बाद में पाकिस्तानकी कुचालों मे फँसता हुआ कश्मीर आतंकियों का गढ़ बनता चला गया एक और भारत द्वारा आतंकियों ढूँढ़ ढूँढ कर समाप्त करने की कोशिश और दूसरी ओर पाकिस्तान द्वारा मानवाधिकार के हनन के नाम पर इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश।आतंक को आजादी की लड़ाई की संज्ञा दे स्थिति को अपने पक्ष में करने की कोशिश । देश के अन्दर भी शैक्षणिक संस्थाओं को इस रोग से संक्रमित कर दिया गया। बौद्धिकता और वाक्स्वतंत्रता के नाम पर इसका पोषण किया गया। पूरे  माहौल को नियंत्रित करना देश के अन्दर के वैचारिक युद्ध को नियंत्रित करना था ।यह एक लोकतांत्रित देश  जहाँ अभिव्यक्ति की आजादी हो ,के लिए एक समस्या बनता चला गया। ये स्थितियाँ समय समय पर दे श को आन्दोलित करती ही रहीं।स्थिति को अराजक बनाने में वहाँ के कुछ नेताओं के दोरंगी चेहरे सहायक रहे जिनके महल महलात वहाँ की जनता के शोषण की कहानी अपने आप कहते रहे।  आतंकियों के सफाए की प्रक्रिया में निर्दोष व्यक्तियों को जाने गँवानी पड़ी।सुरक्षाबलों और जवानों के जानों की तो तब कोई कीमत ही नहीं होती।

पर आश्चर्य तो इस बात का है कि आज भी कुछ दल इसदेश के  सीधे से सांवैधानिक समाधान के पक्ष में नहीं हैं। हैं।शायद इसलिए कि इनकी पूर्व सहमति नहीं ली गयी।पर ऐसे प्रयास इस देश में सफल नहीं हो सकते ।योजना जग जाहिर हो जाती।और पाकिस्तान और उसके पिट्ठू नेताओं के स्वर इसे भी सफल नहीं होने देते।कुछ दिनों पूर्व ही चुनावों में ये स्वर स्पष्ट सुनने को मिले थे।अन्तर्राष्ट्रीय जगत की प्रति क्रियाएँ अननुकूल नहीं हैं। पाकिस्तान तो चुप नहीं बैठ सकता वह हर संभव उपाय से भारत को आन्दोलित करने की कोशिश करेगा ही।पर हमें तो देश के अन्दर के विरोधों से खतरा है जिसका सहारा लेकर  कोई भी अनुचि त लाभ उठा सकता है।नौसिखिये विचार हमारी एकता की चट्टान को हिला सकते हैं।

प्रश्न उन नेताओं का है जिनके विरोधी स्वरों के कारण  उन्हें कैद किया गयाहै। यह एक लम्बी लड़ाई होगी और कानून ऐसे लोगों से अवश्य निपटेगा।

हमें देश के अन्दर के ऐसे स्वरों से डर है जो पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते प्रतीत होते हैं और उनके विचारों को बल देते भी प्रतीत होते हैं। हमें इन अपने लोगों से भय है जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिए देशहित से खिलवाड़ करने से भी नहीं चृकते।

पंद्रह अगस्त  देश भर में सिर्फ एक तिरंगे के नीचे राष्ट्रगान करता दिखाई दे। देश की यही कामना है।

आशा सहाय

 

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