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विचारों का व्यक्तित्व से सम्बन्ध

Posted On: 4 Jul, 2019 Spiritual में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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कभी-कभी एकान्त क्षणों मे अपने अस्तित्व पर प्रश्नात्मक  दृष्टि डालने  की इच्छा होती है।आखिर क्यों मैं इनसे, उनसेऔर बहुतों से पृथक हूँ?दुख सुख के उपभोगों में भी पृथक हूँ।यहाँ तक कि अनुभूतियों मे भी औरों से पृथक क्यों हूँ।विचारों के ऐसे एकान्तिक क्षणों में अन्ततः ईश्वरेच्छा को कारण मान लेती हूँ।ऐसा शायद सभी के साथ होता है।ये मानव मन के आदि प्रश्न हैं।वेद वेदाँग और तत्सम्बन्धित साहित्य भी अन्ततः इसी  निष्कर्ष के आसपास पहुँचकर  कर्तव्यमुक्त हो गये हैं।पर मेरे विचार से ईश्वर पर दोषारोपण करना अथवा उसे ही अपने दुख सुख का कारण मान लेना  पूर्णतः गलत है।अपने इस जीबन के निर्माता हम स्वयं हैं।हमारा जीवन हमारे पूर्व कर्मों का प्रतिफल हो सकता है,भाग्य का नहीं।हम अपने कर्मों का निर्माण करते हैं और इसी तरह ठीक विपरीत इसका निर्माण नहीं भी कर सकते।और एक अन्य स्थिति में निर्मित कर्मों को नष्ट भी कर सकते हैं  ठीक एक कैटरपिलर की तरह।वस्तुतः कर्मों के बंधन में इस तरह बँध जाने की विवशता अज्ञानता के कारण है।एक शुद्ध आत्मा का अज्ञानता के बंधन में बँध जाना।प्रत्येक व्यक्ति अपनी शुद्ध प्रकृति में ईश्वर ही है।इस इश्वरत्व का ज्ञान ही सब दुखों का अंत कर देता है। किन्तु अज्ञानता का यह बंधन जन्म जन्मांतरों तक पीछा नही  छोड़ता।जब तक हम अपने को तप योगादि के द्वारा इससे मुक्त नहीं कर लेते। अज्ञानता अथवा ज्ञान की यह स्थिति हमारे उन विचारों के कारणहोती हैं ,जिन्हें हम ग्रहण करते हैं। हमारे ये विचारहमारे पूर्व कर्मों के फल हो सकते हैं पर ये हमारे पूर्वजों की देन नहीं हैं।

ये विचार ही हमारे मूल व्यक्तित्व हैं।या यों कहें कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसके  विचारों से ही जाना जाता है। मनुष्य की पहचान उसके अपने पृथक विचारों से है, उसके रूप रंग आकार प्रकार से नहीं। वे तो उसके वाह्य पहचान हैं ,उससे उसके मनुष्यत्व के आकार प्रकार का कोई लेना देना नहीं।ये विचार उसे जन्म के साथ पिता के द्वारा नहीं मिलते।विचार स्वयं में एक अस्तित्व हैऔर वह उचित शरीर के मन में स्वयं को स्थापित करता है। संभव है कि पिता और माता के विचारों से कुछ साम्य हो पर मौलिकता में वह उसके स्वयं का है।वह मूलतः विचारों का एक पुंज है ,जो उसे दूसरे से भिन्न अथवा अभिन्न कर सकता है।.एक शिशु दुनिया में जिस प्राकृतिक हास्य रुदन को अभिव्यक्त करता है वह उसके जन्म के साथ एक अदृश्य द्वारा आरोपित प्राकृतिक शक्तियाँ हैं।उसकी चेष्टाएँ, उसके क्रोधादि सभी उसमें वायुतत्व  के द्वारा स्वयमेव आते हैं।वह प्रथमतः विचार रूप ही विश्व में आता है।शरीर उसके साथ संयुक्त होकर उसका पोषण करता  हैऔर उसके अनुकूल स्वयं का निर्माण करता है।

हम वह देखते हैं जो हमारे विचार हमें दिखाते हैं। हमारे हाथ वह करते हैं जो हमारे विचार हमें करने को कहते हैं,पैर वहाँ ले जाते हैं जहाँ विचार हमे ले जाने को कहते हैं।यही समस्त इन्द्रियों के साथ सत्य है।उस विचार तत्व को हम अपनी आत्मा के साथ जोड़ सकते हैं।ये विचार हमारे बंधन भी हो सकते हैं और मुक्ति के द्वार भी।अधोमुखी और ऊर्ध्वमुखी व्यक्तित्व का निर्माण ये विचार ही करते हैं।स्व से उपर उठकर पर की चिन्ता विचार है। विचार की यह कोटि भावरूप में जिन शरीरों से जुड़ती है उसे हम परचिन्तक कहकर उसका सम्मान करतेहैं।वह भोगी रूप से ऊपर उठकर  योगी रूप धारण करता है, विश्व की आत्मा के उत्थान का संकल्प लेता है।यह विचार एक के मन मस्तिष्क से दूसरे में प्रवेश करने के लिएस्वयं ही द्वार बना लेता है। बुद्ध , विवेका ,अरविन्द गाँधी जैसे महापुरुषों के विचार आज भी जीवित हैं और एक बृहत जनमानस में अपनी जगह बनाचुके है क्योंकि उनमें संक्रमण की शक्ति है।एक व्यक्ति से दूसरे में घर बनाते हुए युगों युगों तक संक्रमित होतेरहते हैं।,यह तो कुछ युगों पूर्व की ही बात है। आज भी आर्यों के विचार वेदों उपनिषदों के माध्यम सेलोगों के मस्तिष्क मे घर बनाते हैं, स्थिर होते हैं  और पुनः समूचे विश्व में संक्रमण के लिए तैयार होते हैं जैसे सुन्दर अथवा असुन्दर पंखों वाले पक्षी, उपयुक्तऔर अनुकूल आश्रय दे ख वहाँ डेरा डाल उस स्थल को प्रभावित कर उड़ किसी दूसरे अनुकूल आश्रयस्थल की तलाश करते हैं।आश्रय का अनुकूल होना आवश्यक है।

निश्चय ही विचारों का अपना अस्तित्व है। सद् और असद कहकर जिन विचारों को हम वर्गों में बाँटते हैंउन दोनों का ही अपना पृथक अस्तित्व है। असद् विचार जिन्हें अध्यात्मिकता  ज्ञान की निकृष्ट  श्रेणी के रूप में पहचानती है,उसका भी पृथक अस्तित्व है।विश्व से जुड़े रहने के लिए,मात्र विश्व को ही अपना लक्ष्य मान ,भौतिक सुख के लिए जिन विचारों का ताना बाना बनता है,वह भी एक मस्तिष्क से दूसरे में संक्रमित होता है। आधुनिक युग मे व्यक्ति के मस्तिष्क की ग्रहणशक्ति और रुचि जैसी योग्यता को पहचा न विश्वविद्यालय जैसे संस्थान में योग्य संक्रमणकर्ता अथवा प्रोफेसर ये काम करते हैं।वायु तत्व उसका सबसे बड़ा संवाहक है।

हो सकता है कुछ विचारों के उत्स हम पूर्व पुरुषों में ढ़ूढ़ते हों,और व्यक्ति के विचारों में दादा परदादा नाना परनाना  आदि के विचारों से जोड़ते हों,। पर यह पूर्णतः संभव नहीं।व्यक्तित्व के मूल स्वरूप के कुछ अंश  जो उन विचारों को ग्रहण करने मे सक्षम हों , उनसे प्राप्त किये गये हों, ऐसा हो सकता है पर विचार और भाव नहीं।अगर ऐसा नहीं होता तो गाँधी , डॉ राधाकृष्णन, अथवा अन्य महापुरुषों की संतानों में  उनके विचार  ही मिलते।  आज के गुण सूत्रों के सिद्धान्त भी  इसकी वकालत नहीं कर सकते।उनका पृथक विचारों वाला हो सकना भी इस तथ्य की पुष्टि करता है।

कुछ सिद्धान्तवादी विचार ,एक विचारगुच्छ होते हैं जो तर्कों की श्रृंखला से बँधे हुए होते हैं। जो अपने सम्पूर्ण स्वरूप में अपने उपयुक्त व्यक्तित्वो के विचार रूप मे प्रविष्ट होते हैं।आवश्कता है व्यक्तित्व कीजमीन का उसके उपयुक्त होने कीजहाँ वे अपनी जड़ें जमा सकें। सामाजिक सोच से  जुड़े ऐसे विचार गुच्छ विभिन्न विचारधाराओं का नाम प्राप्त करते हैं।  साम्यवादी विचारधारा  भी ऐसा ही एक विचारगुच्छ है। पर कभी कभी बड़े बड़े समुदायों को ये विचार गुच्छ प्रभावित करते हैं।ऐसा इनकी संक्रमण शक्ति के कारण होता है।ये विचारगुच्छ संसार के तमाम महापुरुषों के विशिष्ट व्यक्तित्वों का निर्माण करते हैंचाहे वे व्यक्तित्व राजनीतिक क्षेत्र के हों आर्थिक अथवा सामाजिक क्षेत्र के ही क्यों न हों।

तब प्रश्न उठता है योग्यता का।विचारों को ग्रहण करने के लिए तत्सम्बन्धित मानसिक योग्यता की आवश्यकता है।उन्नत विचारों का ग्रहण उन्नत मस्तिष्क द्वारा ही संभव है।और एक अधोमुखी मस्तिष्क अधोमुखी विचारों को ही ग्रहण कर सकता है।ग्रहण करने की योग्यता विकसित की जा सकती है- ध्यान तप और योग से।

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आशा सहाय    4-7–2019–।

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