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आज की आवश्यकता है हम एक हों

Posted On: 22 Apr, 2020 Others,Politics में

चंद लहरेंJust another Jagranjunction Blogs weblog

ashasahay

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सम्पूर्ण विश्व में जाग्रत यह एहसास कि पूरी मानव जाति को सुरक्षा की आज जो आवश्यकता आ पड़ी है उसमे देश की सीमारेखाओं को आड़े नहीं आना चाहिये ,सीमारेखा के अन्दर की प्रयत्नशीलता को सीमारेखा के बाहर की प्रयत्नशीलता के साथ जोड़ना भी उसका कर्तव्य होना चाहिए ,  एक विश्व समुदाय के सदस्य होने नाते समय की निर्णायक आवश्कता बन गयी है। इस भाव की अवहेलना मानव जाति के प्रति घोर अपराध ही माना जा सकता है।

 

 

ऐसी स्थितियाँ, जब भौतिकता पर मानवता की सोच हावी होने लगती है,अपनी लाख स्थितिक विकृतियों के बाद भी मानव जाति के भविष्य के लिए लाभप्रद होती है।आज कोरोना- 19  के प्रहार ने सम्पूर्ण विश्व का परिदृश्य बदल दिया है ।आज वह एक सुरक्षा मंच को बेसब्री से तलाश रहा है जहाँ इमानदारी से वर्तमान संकट निवारण की दिशा में सार्थक प्रयत्न किए जा रहे हों। वे सब हाथ बढ़ाकर मदद करने को उद्यत हैं।यह इसलिए भी कि अन्ततः इसी में उनके अस्तित्व की सार्थकता है और रक्षा भी।अप्रभावित देशों में भी भय है  क्योंकि इस वायरस के बदलते स्वरूपो से कब कौन प्रभावित हो जाय, कहना कठिन है।

 

 

किन्तु इस सामयिक सोच ने अनदेखे ही जिस आध्यात्मिक सोचको अन्दर ही अन्दर विकसित कर देने की कोशिश की है वह किसी एक देश की विरासत नहीं, पूरे विश्व की है।पूरे मानव समाज की है।और, जो अपनी अज्ञानता से इस सत्य से मुँह मोड़अभी भी धर्म जाति के मुद्दे ले विरोधी तेवर दिखाना चाहते हैं वस्तुतः उस निम्न कोटि की मानसिकता का ही परिचायक है,जो अपने मस्तिष्क के दरवाजे खोले बिना ही धर्म की वर्तमान नपुंसकता को ही सिद्ध करते जा रहे हैं।ऐसी स्थिति से भारत ही नहीं , विश्व के बहुत सारे देश दो चार हो रहे हैं जो वर्तमान संकट की गम्भीरता समझे बिना ही उस संकट को बढ़ा रहे हैं, मात्र कुछ दिनों के अपने कष्ट से बचने के लिए लाखों को कष्टापन्न करने की योजना बना रहे हैं। यह मानसिकता निश्चय ही तिरस्करणीय है।यह ऐसी मानसिकता हैजो विश्व की मानवताप्रेमी अन्तर्धारा के निर्बाध बहने मे सदैव बाधा बनती है।धर्म उसका माध्यम है,आतंक उसका सहारा और वह सोच जिसे विश्व की बड़ी सोच मानने का दावा किया जाता है,उसकी प्रकृति की महत्ता को सही ढंग से नहीं समझने की सबसे बड़ी भूल भी।

 

 

आज सारी विश्वजनीन धार्मिक  विचारधाराओं के मध्य मानव जाति सम्बन्धी सोच को रखने की ही आवश्यकता है।प्रकृति और ईश्वर सम्बन्धी व्याख्याएँ, स्वर्ग और नरक सम्ब्न्धी व्याख्याएँ तथा तत्सम्बन्धित परम्परागत सोच पर अमल करने की कोई प्रासंगिकता नही प्रतीत होती।जब मानव समुदाय पर आई घोर विपत्ति विश्व को अशांत कर रही होती हो तो किसी भी तथाकथित धर्म के सैद्धान्तिक पक्ष को समझना और समझाना कोई मायने नहीं रखता। स्वामी विवेकानन्द भारत में  अपने शिष्यों को, सन्यासियों की भूमिका को, हिन्दु धर्म की खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने मे उनके सहयोग के लिएप्रेरित कर रहे थे ,।   उन्नीसवी शती के अन्तिम वर्षों मे देश में प्लेग महामारी का भयंकर रूप प्रगट हो रहा था।  एक सन्यासी द्वारा सन्यासियों के धर्म से सम्बद्ध जिज्ञासा का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था कि अभी तो बस मानव की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।सेवा करो। एक एक मानव को बचाओ।सन्यासियों का भी सबसे बड़ा धर्म यही है।सन्यासी जो मन से जगत्जंजालों से दूर होते है, उनका भी यही धर्म है।

 

 

 

हर काल के लिए प्रासंगिक उनका यह कथन धर्म को सदैव मानव से जोड़ने की बात करता है, ईश्वर अल्ला ,खुदा या गॉड से जोड़ने की नहीं।न ही वह उस चरम सत्य में उलझना चाहता है कि जन्म की चरम    परिणति मृत्यु है और  अनायास उत्पन्न होनेवाली ये स्थितियाँ उसके अनगिनत बहाने हैं।इन अध्यात्मिक तर्कों के सहारे मानव सेवा से हम बच कर निकल जाना चाहें तो यह सर्वथा अमानवीय ही है।विवेकानन्द की बातें इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि आधुनिक और प्राचीन विश्व की विचारधाराओं की यह संक्रांतिकालीन कड़ी है। उन्होंने सभी वैश्विक धर्मों के आलोक मे हिन्दु धर्म कोपरखते हुए उसे प्रतिस्थापित किया था साथ ही अन्य धर्मों  यथा बौद्ध और इस्लाम को भी उस परिप्रेक्ष्य में देखा था।वे जानते थे कि विश्व में कभी एक धर्म नही हो सकता। सभी धर्मों का अपना महत्व है ।फिरभी,आपतकाल में सबका जो एक धर्म हो सकता है वह है मानवधर्म।प्रकारान्तर से मानवीयता।

 

 

 

पूरे विश्व का चिकित्सक समुदायएवं वैज्ञानिक एक महामारी से जूझ रहा है।दवा और टीके की खोज के लिए प्रयासरत है। उनके दिनरात एक हैं। लोगों की सेवा और सुरक्षा की बलिवेदी पर जाने कितने लोग कुर्बान हो रहे हैंकिन्तु अपने देश और देशवासियों के प्रति अपने कर्तव्य पर आँच नहीं आने दे रहे।मानव कल्याण की यह भावना  जिसके तहत संक्रमित व्यक्तियों की पहचान औरचिकित्सा की व्यवस्था  के लिए वे प्रयत्नशील हैं, उसे सम्मान न देकर अगर उनपर आक्रमण किया जाता है, पत्थरों से चोट पहुँचायी जाती है तो यह मात्र निंदनीय ही नहीं, घोर अपराध है। यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है। वे डरते हैं कि उनका रोग कहीं उन्हे अस्पताल न पहुँचा दे, और ये चिकित्सक कहीं उनसे धार्मिक भेदभाव के आधार पर उन्हे जानबूझकर परेशानियों में नडाल दें।  यह एक जहर है जो धार्मिक भेदभाव के नाम पर लोगों केमस्तिष्क में घोला जा चुका है । इन विचारों की नींव गहरी है और नींव के उन पत्थरों को निकाल कर ही इनविचारों को समाप्त किया जा सकता है।

 

 

 

आज इस संकटकाल में एक वैचारिक एकता दीख रही है क्योंकि अभी  इसके सिवा और चारा भी नहीं। काश उसमें स्थायित्व हो।राष्ट्रीय स्तर पर तो  अस्थायित्व के लक्षण अभी से प्रगट होने ही लगे हैं। वर्तमान संकट के खत्म होते ही अपने अस्तित्व की आधारभूमि बनाने की योजना  विभिन्न राजनीतिक संगठनों, दलों मे पलने लगी है।  लोगों के जीवन पर आए इस राष्ट्रीय महासंकट ने स्वर की जिस कटुता को दबा दिया है , वह सम्बद्ध छोटे बड़े वक्तव्यों में अन्दर से झाँकता हुआ सा प्रतीत होता है। ऐसे वक्तव्यों में प्रयत्नों से सहाय्य की भावना कम आलोचनाओं का प्रच्छन्न प्रयत्न अधिक झलकता है।  अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी एक दूसरे पर दोषारोपण की प्रवृति भविष्य के सम्बन्धों को अवश्य ही प्रभावित करनेवाली है।वैचारिक एकताका आधार मानव जाति की सुरक्षा से जुड़ा अवश्य है पर अपनी  अपनी आर्थिक स्थितियों की परेशानियों से निपटने की भिन्न स्थितियाँ अवश्य ही उन्हें पृथक पृथक मंचों पर खड़ा होने को विवश कर देंगी।

 

 

जहाँ तक अभी अपने दे श का प्रश्न है जनता लॉक डाऊन की परिस्थितियों से जूझ रही है। पूरे विश्व में लॉक डाऊन अथवा इससे मिलते जुलते प्रयत्नों को पूर्णतः सफल नहीं हो पाने के पीछे संभवतः ऐसी ही मानसिकता का हाथ है। समस्याएँ तो लॉक डाउन से उत्पन्नहोना स्वाभाविक है। एकबारगी लोगों की सारी गतिविधियाँ अवश्य ही प्रभावित हो गयी हैं।   उनके लिए भी जो घर के अन्दर बैठे हैं और उनके लिए भी जो घर ,गाँव और राज्य से बाहर रोजी रोटी कमाने के लिए गये हैं। वस्तुतः यह राज्यस्तर पर बेरोजगारी और तत्सम्बन्धित पलायन का प्रश्न है पर राष्ट्रीय स्तर पर उनके कहीं भी आजीविका प्राप्त करने का अधिकार उनकी समस्या का समाधान देता है ।

 

 

ऐसी स्थिति मे क्या यह पूछना सही नहीं होगा कि जिनकी कृषि अथवा उद्योग धन्धे ऐसे लोगों पर आधृत हैं, लॉकडाऊन की स्थिति मे उनके जीवन निर्वाह के प्रति उन संस्थाओंका कोई कर्तव्य नहीं होता?वे एकबारगी सड़कों पर कैसे आ जाते हैं।  यह तो कोई मानवीय सोच नहीं। इन नित्य खाने कमानेवालों में आपत्काल के लिए कुछ संग्रह करने की भी प्रवृति नहीं होती। इसके अनगिनत कारणों के पीछे जाने का अभी कोई प्रयोजन नहीं प्रतीत  होता।  कारण चाहे जो हो, पर नियोक्ताओं और राज्यो के द्वारा इस प्रकार अपने कामगारों को अधर में छोड़ देना कृतघ्नता है।ऐसे विचार या ऐसी योजनाएँ जो वर्तमान की समस्याओं में भविष्य के अपने स्वार्थ देखती हैं  वर्तमान को नष्ट कर देती हैं।

 

 

 

वर्तमान काल देश के लिए संक्रमण काल सिद्ध होने जा रहा है।आज की स्थितियाँ देश के आचरण, कार्यशैलियो ,व्यवहारों और मानसिकता में बहुत बड़े बदलाव की आग्रही हैं। जनता का एक वर्ग सबकुछ को देख समझ और परख रहा है।अभी जनता का आग्रह है हम सब एक साथ काम करें। सबों में इस महामारी को समाप्त करने का समान जज़्बा हो।सरकार और जनता की सोच एक हो,सत्तासीन और विरोधी पार्टियों, विभिन्न दलों के आपसी भेद मेटएक साथ एक मंच पर खड़े होने की आवश्यकता है, राजनीति अभी की आवश्यकता नहीं । बस एक ही झंडा एकता का हाथ में लेकर बढ़ना है। राजनीति ,दलनीति मजदूरनीति धर्मनीति आदि के लिए भविष्य में अवसर अवश्य मिलेंगे।आलोचनाओं के तब पर्वत खड़े किए जा सकते हैं।अभी बस एक समतल भूमि पर खड़े हो एक स्वरनाद करना है -हम एक हों।

आशा सहाय

 

 

 

नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं और इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

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