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बरगद बाबा

Posted On: 6 Dec, 2012 Others में

apneebatमन में आते अनवरत विचारों के प्रवाह जब शब्दों का रूप लेते है तो कलम चलती है (वर्तमान में कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उँगलियाँ) बस इसी विचार प्रवाह का नाम है "अपनी बात"

Ashish Mishra

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बरगद बाबा
वे बरगद के पेड़, मेरे बचपन के साथी, मेरे दोस्त थे और मेरे जैसे न जाने कितने बच्चों की उनसे दोस्ती थी। गांव से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे वह बरगद के पेड़। उन पेड़ों की आपस में दूरी बहुत कम थी। अतः एक बडे़ क्षेत्र मंे उनकी छाया फैली रहती थी। चिडि़यों को आश्रय देते थे वे और बटोहियों को विश्राम करने के लिये ठंडी छांव। वहीं हम अपने जानवर चराने ले जाया करते थे। हमारे जानवर चरते रहते और हम सब बच्चे उन्हीं बरगद के पेड़ों की छांव में खेलते रहते।
शाम होते-होते वहां साधु-संतो की भीड़ लग जाती। भगवान का भजन करते वह। गांव के लोग भी सत्संग भी शामिल हुआ करते थे। गांव में कोई झगड़ा हो जाये तो उन्हीं बरगद के पेड़ों की छांव तले चैपाल लगती, पंचायत होती और झगड़ा निपटाया जाता। अंधेरा होते-होते सत्संग समाप्त हो जाता मगर बरगद के पेड़ अपना कार्य करते रहते। रात में बंजारों का बसेरा स्थल बनते थे वे बरगद के पेड़।
सुबह सात बजे से गांव के मास्टर जी उन्हीं बरगद के पेड़ों के नीचे गांव के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाया करते क्योंकि गांव में उस समय कोई पाठशाला नहीं थी। इसलिये मास्टरजी ने उन्हीं बरगद के पेड़ों को पाठशाला बना लिया था। मास्टरजी को तनख्वाह के नाम पर मिलता था आत्मसंतोष। शायद पुण्य भी। इस तरह शिक्षा भी देते थे वह बरगद के पेड़। यानी अपना सब कुछ देकर भूखों, भटकों, निराश्रितों को तरह-तरह से सुख देते थे। या यूं कहें कि अनगिनत जीवों का पोषण करते थे। हरे-भरे बढ़े-चढ़े थे वह बरगद के पेड़। शायद इन्हीं शदगुणों के कारण उनकी पूजा होती थी। वर अमावस्या के दिन गांव भर की सुहागिने वहां पूजा करतीं थीं। धागों से घिर जाते थे वे बड़े-बड़े बरगद के पेड़। बाबा बताते थे कि इन पेड़ों को उनके पिता ने बचपन में लगाया था। यानी मेरे बाबा से भी बहुत बड़े थे वह पेड़। इसीलिये तो हम बच्चे उन पेड़ों को ‘‘बरगद बाबा’’ कहते थे। अपने आश्रय में विभिन्न जीवों को सुख देने वाले वे बरगद के पेड़। जब उनकी डालियां हिलतीं तो मालूम देता जैसे वह बहुत आनन्दित हो रहे हों।
समय बीता मेरा बचपन न जाने कब चुपके से निकल गया। हम युवा हो गये। रोजगार की तलाश में मैं तथा मेरे साथी अलग-अलग शहरों में चले गये। तमाम कबायद के बाद और माता-पिता के आर्शीवाद से मेरा स्वयं का व्यवसाय जम गया। बचपन के ज्यादातर साथी अब अनजान से हो गये थे। कुछ से मिलना-जुलना तो ज्यादा नहीं, हां फोन पर बातचीत होती रहती। इस बीच मेरी शादी हुई। मां-बाप भी मेरे पास शहर आ गये थे। वक्त बिना रूके चलता रहा। मै दो बच्चों को पिता भी बन गया। इस व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर तीन-चार वर्ष में ही गांव जाना हो पाता था। मगर इस बार अत्यन्त व्यस्तता के कारण आठ वर्ष तक गांव नहीं जा पाया। दोनों बच्चे स्कूल से निकल कर काॅलेज में आ चुके थे। माता-पिता जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे। एक दिन उन्होंने गांव देखने की इच्छा व्यक्त की। गांव और घर देखने से ज्यादा इच्छा मुझे उन बरगद के पेड़ों को देखने की थी। मां-बाप को लेकर अपनी कार द्वारा मैं गांव चल दिया। अब गांव की कच्ची पगडंडी पक्की सड़क में बदल चुके थी। उस सड़क पर कुछ ही दूर चलने के बाद वे बरगद के पेड़ दिखायी देने लगे। सड़क उन पेड़ों के बिल्कुल नजदीक से ही गुजरती थी। अतः मैने कार सड़क पर खड़ी कर दी और उन बरगद के पेड़ों को देखने लगा। पर आश्चय! कितना बदल गये थे, वे बरगद के पेड़।
टी0वी0, इण्टरनेट और कम्प्यूटर के उन्नत युग में बाजों, चीलों और गिद्धों को पनाह दे रहे थे वे बरगद के पेड़। सांडों और कुत्तों को अपनी छाया तले पालते और अपनी जड़ों में चमगादडों और उल्लुओं को आश्रय दे रहे थे वे पेड़। जिन पेड़ों के नीचे सत्संग होता था, जिन पेड़ों के नीचे न्याय होता था, जिन पेड़ों के नीचे बंजारों का रैन बसेरा होता था, जिनकी छांव तले शिक्षा दी जाती थी, उन्हीं बरगद के पेड़ों के नीचे अब गड़रियों तक को ठिकाना नहीं मिलता। अंधेरे में चोर-डाकुओं के पड़ाव होते हैं वहां। गांव की ओर जाने वाली सड़क पर राहगीरों को लूटा जाता है, उन्हीं बरगद के पेड़ों के नीचे और वे बरगद के पेड़ चुप-चाप सब-कुछ देखते रहते हैं। फिर भी तने खड़े हैं वे बरगद के पेड़।
मगर अब वे आनन्दित नहीं होते। जब उनकी डालियां हिलतीं हैं, पत्ते बजते हैं तो मालूम होता है कि बहुत दुःखी हैं वे बरगद के पेड़। खैर! दो दिन गांव में रूकने के बाद अपने मां-बाप के साथ मैं शहर वापस आ गया।
दस वर्ष बाद, अभी पिछले दिनांे उन बरगद के पेड़ों को देखने की इच्छा पुनः जागी। अकेला ही चल दिया गांव की ओर। लगभग छः घंटों के सफर के बाद मुख्य सड़क को छोड़कर गांव की ओर जाने वाले सम्पर्क मार्ग पर मेरी कार दौड़ रही थी, उस सड़क पर जो कभी एक कच्ची पगडंडी थी।
इक्का-दुक्का खेत ही बचे थे। ऊंची-ऊंची इमारतें बन गईं थीं। गाड़ी धीमी कर दी मगर जहां कभी वह बरगद के पेड़ हुआ करते थे, वहाँ वे बरगद के पेड़ अब नहीं थे, बल्कि एक विशाल क्षेत्र में फैली चीनी मिल थी। बाहर ट्रकों की कतारें लगीं थीं। मिल की बाहरी दीवार पर गमलों में रंग-बिरंगे देशी-विदेशी पौधे लगे थे। अचानक दो गमलों पर जाकर मेरी नजर ठहर गई। मैं आँखे फाड़े उन्हें देखता ही रह गया!
क्या इतने विशाल बरगद के पेड़ों के लिये मानवों की भीड़ में सिर्फ गमलों भर की जगह रह गई है? उन गमलों में बरगद के दो छोटे-छोटे बौनसाई थे। उन्हें ज्यादा फैलने की अनुमति नहीं है। उन्हें सिमटकर रहना है, सदा, जीवन पर्यन्त। मगर मैं अब भी समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेरे प्रिय बरगद के वे पेड़ इतने छोटे क्यों हो गये? किससे पूंछूं? कौन बतायेगा? मेरे बचपन के साथी, मेरे दोस्त, कहाँ गये- वे बरगद के पेड़?

वे बरगद के पेड़, मेरे बचपन के साथी, मेरे दोस्त थे और मेरे जैसे न जाने कितने बच्चों की उनसे दोस्ती थी। गांव से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे वह बरगद के पेड़। उन पेड़ों की आपस में दूरी बहुत कम थी। अतः एक बडे़ क्षेत्र मंे उनकी छाया फैली रहती थी। चिडि़यों को आश्रय देते थे वे और बटोहियों को विश्राम करने के लिये ठंडी छांव। वहीं हम अपने जानवर चराने ले जाया करते थे। हमारे जानवर चरते रहते और हम सब बच्चे उन्हीं बरगद के पेड़ों की छांव में खेलते रहते।

शाम होते-होते वहां साधु-संतो की भीड़ लग जाती। भगवान का भजन करते वह। गांव के लोग भी सत्संग भी शामिल हुआ करते थे। गांव में कोई झगड़ा हो जाये तो उन्हीं बरगद के पेड़ों की छांव तले चैपाल लगती, पंचायत होती और झगड़ा निपटाया जाता। अंधेरा होते-होते सत्संग समाप्त हो जाता मगर बरगद के पेड़ अपना कार्य करते रहते। रात में बंजारों का बसेरा स्थल बनते थे वे बरगद के पेड़।

सुबह सात बजे से गांव के मास्टर जी उन्हीं बरगद के पेड़ों के नीचे गांव के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाया करते क्योंकि गांव में उस समय कोई पाठशाला नहीं थी। इसलिये मास्टरजी ने उन्हीं बरगद के पेड़ों को पाठशाला बना लिया था। मास्टरजी को तनख्वाह के नाम पर मिलता था आत्मसंतोष। शायद पुण्य भी। इस तरह शिक्षा भी देते थे वह बरगद के पेड़। यानी अपना सब कुछ देकर भूखों, भटकों, निराश्रितों को तरह-तरह से सुख देते थे। या यूं कहें कि अनगिनत जीवों का पोषण करते थे। हरे-भरे बढ़े-चढ़े थे वह बरगद के पेड़। शायद इन्हीं शदगुणों के कारण उनकी पूजा होती थी। वर अमावस्या के दिन गांव भर की सुहागिने वहां पूजा करतीं थीं। धागों से घिर जाते थे वे बड़े-बड़े बरगद के पेड़। बाबा बताते थे कि इन पेड़ों को उनके पिता ने बचपन में लगाया था। यानी मेरे बाबा से भी बहुत बड़े थे वह पेड़। इसीलिये तो हम बच्चे उन पेड़ों को ‘‘बरगद बाबा’’ कहते थे। अपने आश्रय में विभिन्न जीवों को सुख देने वाले वे बरगद के पेड़। जब उनकी डालियां हिलतीं तो मालूम देता जैसे वह बहुत आनन्दित हो रहे हों।

समय बीता मेरा बचपन न जाने कब चुपके से निकल गया। हम युवा हो गये। रोजगार की तलाश में मैं तथा मेरे साथी अलग-अलग शहरों में चले गये। तमाम कबायद के बाद और माता-पिता के आर्शीवाद से मेरा स्वयं का व्यवसाय जम गया। बचपन के ज्यादातर साथी अब अनजान से हो गये थे। कुछ से मिलना-जुलना तो ज्यादा नहीं, हां फोन पर बातचीत होती रहती। इस बीच मेरी शादी हुई। मां-बाप भी मेरे पास शहर आ गये थे। वक्त बिना रूके चलता रहा। मै दो बच्चों को पिता भी बन गया। इस व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर तीन-चार वर्ष में ही गांव जाना हो पाता था। मगर इस बार अत्यन्त व्यस्तता के कारण आठ वर्ष तक गांव नहीं जा पाया। दोनों बच्चे स्कूल से निकल कर काॅलेज में आ चुके थे। माता-पिता जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे। एक दिन उन्होंने गांव देखने की इच्छा व्यक्त की। गांव और घर देखने से ज्यादा इच्छा मुझे उन बरगद के पेड़ों को देखने की थी। मां-बाप को लेकर अपनी कार द्वारा मैं गांव चल दिया। अब गांव की कच्ची पगडंडी पक्की सड़क में बदल चुके थी। उस सड़क पर कुछ ही दूर चलने के बाद वे बरगद के पेड़ दिखायी देने लगे। सड़क उन पेड़ों के बिल्कुल नजदीक से ही गुजरती थी। अतः मैने कार सड़क पर खड़ी कर दी और उन बरगद के पेड़ों को देखने लगा। पर आश्चय! कितना बदल गये थे, वे बरगद के पेड़।

टी0वी0, इण्टरनेट और कम्प्यूटर के उन्नत युग में बाजों, चीलों और गिद्धों को पनाह दे रहे थे वे बरगद के पेड़। सांडों और कुत्तों को अपनी छाया तले पालते और अपनी जड़ों में चमगादडों और उल्लुओं को आश्रय दे रहे थे वे पेड़। जिन पेड़ों के नीचे सत्संग होता था, जिन पेड़ों के नीचे न्याय होता था, जिन पेड़ों के नीचे बंजारों का रैन बसेरा होता था, जिनकी छांव तले शिक्षा दी जाती थी, उन्हीं बरगद के पेड़ों के नीचे अब गड़रियों तक को ठिकाना नहीं मिलता। अंधेरे में चोर-डाकुओं के पड़ाव होते हैं वहां। गांव की ओर जाने वाली सड़क पर राहगीरों को लूटा जाता है, उन्हीं बरगद के पेड़ों के नीचे और वे बरगद के पेड़ चुप-चाप सब-कुछ देखते रहते हैं। फिर भी तने खड़े हैं वे बरगद के पेड़।

मगर अब वे आनन्दित नहीं होते। जब उनकी डालियां हिलतीं हैं, पत्ते बजते हैं तो मालूम होता है कि बहुत दुःखी हैं वे बरगद के पेड़। खैर! दो दिन गांव में रूकने के बाद अपने मां-बाप के साथ मैं शहर वापस आ गया।

दस वर्ष बाद, अभी पिछले दिनांे उन बरगद के पेड़ों को देखने की इच्छा पुनः जागी। अकेला ही चल दिया गांव की ओर। लगभग छः घंटों के सफर के बाद मुख्य सड़क को छोड़कर गांव की ओर जाने वाले सम्पर्क मार्ग पर मेरी कार दौड़ रही थी, उस सड़क पर जो कभी एक कच्ची पगडंडी थी।

इक्का-दुक्का खेत ही बचे थे। ऊंची-ऊंची इमारतें बन गईं थीं। गाड़ी धीमी कर दी मगर जहां कभी वह बरगद के पेड़ हुआ करते थे, वहाँ वे बरगद के पेड़ अब नहीं थे, बल्कि एक विशाल क्षेत्र में फैली चीनी मिल थी। बाहर ट्रकों की कतारें लगीं थीं। मिल की बाहरी दीवार पर गमलों में रंग-बिरंगे देशी-विदेशी पौधे लगे थे। अचानक दो गमलों पर जाकर मेरी नजर ठहर गई। मैं आँखे फाड़े उन्हें देखता ही रह गया!

क्या इतने विशाल बरगद के पेड़ों के लिये मानवों की भीड़ में सिर्फ गमलों भर की जगह रह गई है? उन गमलों में बरगद के दो छोटे-छोटे बौनसाई थे। उन्हें ज्यादा फैलने की अनुमति नहीं है। उन्हें सिमटकर रहना है, सदा, जीवन पर्यन्त। मगर मैं अब भी समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेरे प्रिय बरगद के वे पेड़ इतने छोटे क्यों हो गये? किससे पूंछूं? कौन बतायेगा? मेरे बचपन के साथी, मेरे दोस्त, कहाँ गये- वे बरगद के पेड़?

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