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स्वतंत्रता के मायने

Posted On: 14 Dec, 2012 Others में

apneebatमन में आते अनवरत विचारों के प्रवाह जब शब्दों का रूप लेते है तो कलम चलती है (वर्तमान में कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उँगलियाँ) बस इसी विचार प्रवाह का नाम है "अपनी बात"

Ashish Mishra

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स्वतंत्रता के मायने
रमजान के महीने का कुरान में पाक माना गया है, इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है और मुसलमान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों ;फराईज़द्ध का अमल में लाना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित पांच कर्तव्यों में से किसी एक को भी ना मानेए तो वह मुसलमान नहीं हो सकतारू
ये फराईज हैं. ईमान यानी कलिमा तय्यबए जिसमें अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरारए उसके एक होने का यकीन और मोहम्मद साहब के आखिरी नबी ;दूतद्ध होने का यकीन करना शामिल है। इसके अलावा बाकी चार हैं .नमाज़ए रोज़ाए हज और ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों फराईज़ इन्सान को इन्सान से प्रेमए सहानुभूतिए सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। यदि कोई व्यक्ति मुसलमान होकर इस सब पर अमल न करेए तो वह अपने मजहब के लिए झूठा है।
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैंए जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से गलत या बुरा नहीं बोलनाए आंख से गलत नहीं देखनाए कान से गलत नहीं सुननाए हाथ.पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। रोज़े की हालत में किसी व्यक्ति के लिए यह आज्ञा नहीं है कि वह अपनी पत्नी को भी इस नीयत से देखे कि उसके मन में कामवासना जगे। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता हैए जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचताए शोर नहीं मचाताए हाथापाई नहीं करता इत्यादि। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।
जब मुसलमान रोज़ा रखता हैए भूखा.प्यासा रहता है तो उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।
रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा हैए जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेता है।
ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलेगा। इसीलिए मुसलमान इस माह में ज़कात अदा करने का उपक्रम करते हैं। रोजा हमें झूठए हिंसाए बुराईए रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसकी मश्क यानी ;अभ्यासद्ध पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।
ते यह तो हैं कुरान के अनुसार मुसलमानों की परिभाषा फिर उपद्रव करने वाले कौन हैं, दंगा करने, गाडि़यों में तोड़-फोड़ करने, मारपीट करने, दुकाने लूटने वाले कौन हैं? दरअसल दंगाई न हिंदू होते हैं न मुसलमान दंगाई सिर्फ और सिर्फ दंगाई होते हैं। उनका मकसद् समाजिक सौहार्द को बिगाड़ना और अपना उल्लू सीधा करना होता है। दुकानों में लूट-पाट करते वक्त, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते वक्त उनका इरादा इस्लाम का भला करना नहीं वरन मौके का फायदा उठाना होता है।
हां हमारी सरकार (चाहे वह केन्द्र की हो राज्य की) को जरूर दंगाइयों के रूप में धर्म की व्याख्या करना बहुत अच्छी तरह आता है, सरकार के लिये पाक कुरआन के अनुसार ऊपर दिये गये गुणों वाला मुसलमान नहीं है न ही वह मुसलमानों का नुमाइंदा है, सरकार को यह दंगाई ही मुसलमानों के सच्चे नुमाइंदे दिखायी देते हैं और उसको लगता है कि यदि इनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की तो उसका वोट बैंक गड़बड़ा जायेगा। समझ में नहीं आता कि सरकार दंगाइयों के ऊपर सख्त कार्यवाही करते वक्त उन्हें धर्म के चश्मे से क्यों देखती है और जब कभी-कभी दूसरे समुदाय के ओर से भी प्रतिक्रिया होती है तो तमाम राजनैतिक दल, तथाकथित मानवाधिकार समर्थक संगठन आसमान सर पर उठा लेते हैं और जब यह उपद्रवी, दंगाई (सरकारी चश्मे से देखने पर मुसलमान) उपद्रव करते हैं तो इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही क्यों नहीं की जाती? अगर एक दो शहरों में इस तरह की हरकत करने वालों पर सख्त कार्यवाही हो तो दंगे की आग एक-एक कर दूसरे शहरों को भी अपनी चपेट में क्यों ले? क्यों नहीं इस पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जाती है। डर है कहीं वोट बैंक न खिसक जाये!!! मुस्लिमों पर सरकार ने कार्यवाही कर दी!!!!!!!!!!!!!!! क्यों नहीं समझा जाता कि यह सिर्फ उपद्रवी है और एक सच्चे मुसलमान को इनके प्रति हमदर्दी भी हीं होगी न ही होनी चाहिये और जिन्हें है वह किसी दंगाई से कम नहीं है।
हमारे देश में स्वतंत्रता का मतलब क्या है? जब चाहो, जहां चाहो लूटपाट शुरू कर दो, जहां चाहो सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाओ। आखिर लखनऊ के पार्क में तथाकथित मुसलमानों ने जिन महिलाओं के कपड़े फाड़े उनका क्या कसूर था? जिन निर्दोश दुकानदारों की रोजी-रोटी छीनी उनका क्या कसूर था? लेकिन हमारी सरकार है कि उसके लिये यह सब आम घटनायें हैं। उसके लिये खास तब तक नहीं होता जब तक सड़कों पर खून न बहे।
दुनियां में बहुत से देश हैं जहां सभी धर्मों के लोग रहते हैं? मगर क्या किसी देश में किसी धर्म विशेष के लिये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ का प्रावधान है???? यह हमारा देश ही है? क्यों ? क्योंकि हमारे देश के राजनैताओं के लिये देशहित से अधिक स्वयं का हित, सत्ता का सुख महत्व रखता है। उनके लिये इसके कोई मायने नहीं कि देश का क्या होगा? उनके लिये यह मायने है कि कहीं हमारी कुर्सी न चली जाये। क्यों नहीं देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाती? और अगर धर्म के आधार पर ’’पर्सनल लाॅ’’ की इजाजत है तो बाकी धर्मों के भी पर्सनल लाॅ हो सकते हैं। फिर देश का कानून!!! खूंटी पर टाग दिया जाये ना!!! क्यों कि हर धर्म का अपना अलग कानून होगा। अदालतों में हर धर्म के जजों की नियुक्ति की जाये। बार कौसिंल, वकालत बंद कर दी जाये। मुस्जिदों, मंदिरों, गिरजाघरों में तैयार की जाये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ के एडवोकेट।
कितना हास्यापद है इस देश का कानून और इस देश के राजनैतिक दलों का आचरण। शायद इनके लिये स्वतंत्रता के मायने यहीं हैं कि जनता को मरने दो अपनी कुर्सी सुरक्षित रखो।
रमजान के महीने का कुरान में पाक माना गया है, इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है और मुसलमान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों ;फराईज़ का अमल में लाना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित पांच कर्तव्यों में से किसी एक को भी ना माने तो वह मुसलमान नहीं हो सकता.
ये फराईज हैं. ईमान यानी कलिमा तय्यब जिसमें अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरारए उसके एक होने का यकीन और मोहम्मद साहब के आखिरी नबी ;दूत होने का यकीन करना शामिल है। इसके अलावा बाकी चार हैं .नमाज़ रोज़ा हज और ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों फराईज़ इन्सान को इन्सान से प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। यदि कोई व्यक्ति मुसलमान होकर इस सब पर अमल न करे, तो वह अपने मजहब के लिए झूठा है।
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैंए जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से गलत या बुरा नहीं बोलना, आंख से गलत नहीं देखना, कान से गलत नहीं सुनना, हाथ.पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। रोज़े की हालत में किसी व्यक्ति के लिए यह आज्ञा नहीं है कि वह अपनी पत्नी को भी इस नीयत से देखे कि उसके मन में कामवासना जगे। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता हैए जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता, शोर नहीं मचाता, हाथापाई नहीं करता इत्यादि। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।
जब मुसलमान रोज़ा रखता हैए भूखा.प्यासा रहता है तो उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।
रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है, जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेता है।
ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलेगा। इसीलिए मुसलमान इस माह में ज़कात अदा करने का उपक्रम करते हैं। रोजा हमें झूठए हिंसाए बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसकी मश्क यानी , अभ्यासद्, पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।
ते यह तो हैं कुरान के अनुसार मुसलमानों की परिभाषा फिर उपद्रव करने वाले कौन हैं, दंगा करने, गाडि़यों में तोड़-फोड़ करने, मारपीट करने, दुकाने लूटने वाले कौन हैं? दरअसल दंगाई न हिंदू होते हैं न मुसलमान दंगाई सिर्फ और सिर्फ दंगाई होते हैं। उनका मकसद् समाजिक सौहार्द को बिगाड़ना और अपना उल्लू सीधा करना होता है। दुकानों में लूट-पाट करते वक्त, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते वक्त उनका इरादा इस्लाम का भला करना नहीं वरन मौके का फायदा उठाना होता है।
हां हमारी सरकार (चाहे वह केन्द्र की हो राज्य की) को जरूर दंगाइयों के रूप में धर्म की व्याख्या करना बहुत अच्छी तरह आता है, सरकार के लिये पाक कुरआन के अनुसार ऊपर दिये गये गुणों वाला मुसलमान नहीं है न ही वह मुसलमानों का नुमाइंदा है, सरकार को यह दंगाई ही मुसलमानों के सच्चे नुमाइंदे दिखायी देते हैं और उसको लगता है कि यदि इनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की तो उसका वोट बैंक गड़बड़ा जायेगा। समझ में नहीं आता कि सरकार दंगाइयों के ऊपर सख्त कार्यवाही करते वक्त उन्हें धर्म के चश्मे से क्यों देखती है और जब कभी-कभी दूसरे समुदाय के ओर से भी प्रतिक्रिया होती है तो तमाम राजनैतिक दल, तथाकथित मानवाधिकार समर्थक संगठन आसमान सर पर उठा लेते हैं और जब यह उपद्रवी, दंगाई (सरकारी चश्मे से देखने पर मुसलमान) उपद्रव करते हैं तो इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही क्यों नहीं की जाती? अगर एक दो शहरों में इस तरह की हरकत करने वालों पर सख्त कार्यवाही हो तो दंगे की आग एक-एक कर दूसरे शहरों को भी अपनी चपेट में क्यों ले? क्यों नहीं इस पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जाती है। डर है कहीं वोट बैंक न खिसक जाये!!! मुस्लिमों पर सरकार ने कार्यवाही कर दी!!!!!!!!!!!!!!! क्यों नहीं समझा जाता कि यह सिर्फ उपद्रवी है और एक सच्चे मुसलमान को इनके प्रति हमदर्दी भी हीं होगी न ही होनी चाहिये और जिन्हें है वह किसी दंगाई से कम नहीं है।
हमारे देश में स्वतंत्रता का मतलब क्या है? जब चाहो, जहां चाहो लूटपाट शुरू कर दो, जहां चाहो सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाओ। आखिर लखनऊ के पार्क में तथाकथित मुसलमानों ने जिन महिलाओं के कपड़े फाड़े उनका क्या कसूर था? जिन निर्दोश दुकानदारों की रोजी-रोटी छीनी उनका क्या कसूर था? लेकिन हमारी सरकार है कि उसके लिये यह सब आम घटनायें हैं। उसके लिये खास तब तक नहीं होता जब तक सड़कों पर खून न बहे।
दुनियां में बहुत से देश हैं जहां सभी धर्मों के लोग रहते हैं? मगर क्या किसी देश में किसी धर्म विशेष के लिये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ का प्रावधान है???? यह हमारा देश ही है? क्यों ? क्योंकि हमारे देश के राजनैताओं के लिये देशहित से अधिक स्वयं का हित, सत्ता का सुख महत्व रखता है। उनके लिये इसके कोई मायने नहीं कि देश का क्या होगा? उनके लिये यह मायने है कि कहीं हमारी कुर्सी न चली जाये। क्यों नहीं देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाती? और अगर धर्म के आधार पर ’’पर्सनल लाॅ’’ की इजाजत है तो बाकी धर्मों के भी पर्सनल लाॅ हो सकते हैं। फिर देश का कानून!!! खूंटी पर टाग दिया जाये ना!!! क्यों कि हर धर्म का अपना अलग कानून होगा। अदालतों में हर धर्म के जजों की नियुक्ति की जाये। बार कौसिंल, वकालत बंद कर दी जाये। मुस्जिदों, मंदिरों, गिरजाघरों में तैयार की जाये ‘‘पर्सनल लाॅ’’ के एडवोकेट।
कितना हास्यापद है इस देश का कानून और इस देश के राजनैतिक दलों का आचरण। शायद इनके लिये स्वतंत्रता के मायने यहीं हैं कि जनता को मरने दो अपनी कुर्सी सुरक्षित रखो।

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