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जल ही जीवन है या जल ही जहर है

Posted On: 22 Aug, 2012 Others में

सुप्रभात

Ashish Shukla

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INDIA-ENVIRONMENT-POLUTIONसदियो पहले नदियो किनारे जो सभ्यताएं बसीं व विकसित हुई थीं वे अब विकास के चरम पर पहुंचकर, अब मिटने के कगार पर पहुंच गई हैं। कारण ये नदियॉ आज जीवन को बीमारियां परोस रही हैं। मनु संहिता के अनुसार अगर कोई मनुष्य नदी के पानी को किसी भी प्रकार से गंदा करता है तो उसे कड़ी सजा दी जानी चाहिए। नदियों के प्रति हमारी आस्थाएं जो कभी हुआ करती थीं, आज वो कहॉ गई किस ओर जा रहा है हमारा समाज और हम ?
जिस पानी को पहले लोग अमृत समझते थे वहीं पानी आज उनके लिए जहर बन गया है। हाल ही में यूनिसेफ की मदद से उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सर्वे करवाया, जिसमें उत्तर प्रदेश के 51 जिलों का भूजल “आर्सेनिक” प्रदूषित पाया गया है। डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार पानी में आर्सेनिक की मात्रा प्रति अरब 10 पार्ट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए या प्रति लीटर में 0.05 माइक्रोग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन शोध बताते हैं कि यह इन क्षेत्रों में 100-150 पार्ट प्रति बिलियन तक पानी में आर्सेनिक पहुंच चुका है। इससे बलिया और लखीमपुर जिले सबसे अधिक प्रभावित पाये गये। एहतिहात के तौर पर सैकड़ों की संख्या में हैण्डपम्प सील कर दिये गये हैं।
राज्य के कई जिलों में भी आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई गई है, मथुरा में बैराज के कारण यमुना का रुका जल स्थानीय भू गर्भ के लिए खतरा बन रहा है तो मथुरा के आसपास के कुछ स्थानों पर बोरिंग के दौरान लाल रंग का पानी निकलने लगा है। 51 जिलों के हैंडपंप और नलों से 93 हजार नमूने लिए गए। इनमें से 14,675 नमूनों में पानी जहरीला पाया गया। पानी में क्रोमियम, आर्सेनिक और लेड जैसे जहरीले तत्व मिले यानि पानी जहर बन चुका है। देश के कई राज्यो मे यही हाल है।
मध्यप्रदेश में रतलाम जिले का भूमिगत पानी पिछले 10 साल में जहरीला हो गया और अब लोग साफ पानी की एक एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। इस इलाके में लगा हैंडपंप अब पानी नहीं लाल रंग का जहर उगल रहा है। इलाके में नगर निगम 7-8 दिन में पीने के पानी की सप्लाई करता है। रतलाम के भूमिगत पानी का प्रदूषित होना पर्यावरण से हो रहे खिलवाड़ का नतीजा है। रतलाम में औद्योगिक विकास के लिए पिछले कई साल से फैक्ट्रियां लगाई जा रही है। इन फैक्ट्रियों में निर्माण प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर औद्योगिक कचरा भी तैयार होता है। औद्योगिक कचरे को खत्म करने और उससे प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी फैक्ट्रियों की होती है। इस काम को फैक्ट्रियां सही तरह से अंजाम दे रही हैं या नहीं ये सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की होती है।
उज्जैन की क्षिप्रा पवित्रता, शुद्धता का पर्याय मानी जाने वाली ये नदी अब एक गंदा नाला बन गई है। इसका पानी इस्तेमाल करना तो दूर छूने लायक भी नहीं बचा है। इसकी हालत के लिए जिम्मेदार और कोई नहीं भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी है। करीब 5 हजार साल पुरानी क्षिप्रा नदी, मालवा इलाके की जीवन रेखा है। इसी नदी से ही उज्जैन शहर में पानी सप्लाई किया जाता है। और इस नदी में शहर भर की हजारों टन गंदगी रोज उड़ेली जाती है। उधर गंगा और यमुना को बचाने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन हालात ज्यों के त्यो हैं। इसी तरह देश में और भी कई नदियां है जो प्रदूषण के साथ-साथ सरकारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है।
गंगा की सहायक नदी के रूप में जानी जाने वाली ‘‘काली नदी‘‘। यह नदी अपने उद्गम स्रोत से मेरठ तक एक छोटे से नाले के रूप में बहती है जबकि आगे चलकर नदी का रूप ले लेती है। हमेशा टेढी-मेढी व लहराकर बहने वाली इस नदी को नागिन के नाम से भी जाना जाता है, जबकि कन्नौज के पास यह कालिन्दी के नाम से मशहूर है। कभी शुद्ध व निर्मल जल लेकर बहने वाली यह नदी आज उद्योगों (शुगर मिलों, पेपर मिल, रासायनिक उद्योग), घरेलू बहिस्राव, मृत पशुओं का नदी में बहिस्राव, शहरों, कस्बों, बूचड़-खानों व कृषि का गैर-शोधित कचरा ढोने का साधन मात्र बनकर रह गई है। है। केंद्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार इस नदी के पानी में अत्यधिक मात्रा में सीसा, मैग्नीज व लोहा जैसे भारी तत्व व प्रतिबंधित कीटनाशक अत्यधिक मात्रा में घुल चुके हैं। इसका पानी वर्तमान में किसी भी प्रयोग का नहीं है। इसके पानी में इतनी भी ऑक्सीजन की मात्रा नहीं बची है जिससे कि मछलियां व अन्य जलीय जीव जीवित रह सकें। नदी के प्रदूषण का आलम यह है कि पहले इसके पानी में सिक्का डालने पर वह तली में पड़ा हुआ चमकता रहता था लेकिन आज उसके पानी को हथेली में लेने से हाथ की रेखाएं भी नहीं दिखती हैं।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग तो जैसे गहरी नींद में है। उद्योगों द्वारा नदी में खुलेआम गैर-शोधित कचरा उड़ेला जा रहा है लेकिन उनके खिलाफ किसी भी कार्यवाही का न होना समझ से परे है। हां, संगम मेले के दौरान जब साधु-संतों ने ऐलान किया था कि वे मैली गंगा में स्नान नहीं करेंगे तो दबाव स्वरूप विभाग द्वारा कुछ उद्योगों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, इसमें मेरठ के भी तीन पेपर मिल शामिल थे। लेकिन आज ये सभी उद्योग पुनः धड़ल्ले से अपना कचरा नदी में डाल रहे हैं।
नदियों के साथ छेड़छाड़ और अपने स्वार्थों के लिए उन्हें समाप्त करने की साजिश निरंतर चल रही है।
बड़ी मात्रा में रेत खनन के चलते जल जीवों के सामने संकट पैदा हो गया है। गंगा की औसत गहराई वर्ष 1996-97 में 15 मीटर थी, जो वर्ष 2004-2005 में घटकर 11 मीटर रह गई। जलस्तर में गिरावट निरंतर जारी है। आईआईटी कानपुर के एक शोध के अनुसार, पूरे प्रवाह में गंगा क़रीब चार मीटर उथली हो चुकी है।
कभी बेतवा नदी का पानी इतना साफ एवं स्वास्थ्यवर्द्धक होता था कि टीबी के मरीज़ इस जल का सेवन करके स्वस्थ हो जाते थे। आज बेतवा के किनारे स्थित बस्ती के लोग उसमें गंदगी डाल रहे हैं। बेतवा में नहाने वाले लोग चर्म रोग का शिकार हो रहे हैं। नदी की सफाई करने वाली मछलियां, घोघे एवं कछुए समाप्त हो गए हैं। यहां लोग पानी का आचमन करने से भी डरते हैं। जल है तो कल है, इस एक शब्द ने सदियों से लोगों को इतना प्रभावित किया है कि हमारी जीवनशैली एवं संस्कृति मानसून और नदियों के इर्द-गिर्द सिमट गई है। नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अनाप-शनाप पैसा फूंक रही हैं।
ललितपुर में बीच शहर से निकलने वाली शहजाद नदी का हाल बेहाल है। प्रदूषण की शिकार इस नदी को लोगों ने अपने आशियाने के रूप में इस्तेमाल करने के लिए आधे से ज़्यादा पाट दिया हैं। यही हाल इससे मिलने वाले नालों का है। उन पर आलीशान मकान खड़े हो गए हैं।
हिंदू पुराणों में शिवपुत्री नर्मदा को गंगा से भी पवित्र नदी माना गया है । पवित्र नदी गंगा वर्ष में एक बार काली गाय के रूप में नर्मदा में स्नान करने आती है और पवित्र होकर श्वेतवर्णी गाय के रूप में फिर से स्वस्थान लौट जाती है । नर्मदा पुराण में कहा गया है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से पापियों के पाप नाश हो जाते है । लेकिन आज कठोर सच यह है कि पवित्र नर्मदा नदी मानव जन्य प्रदूषण के कारण अपवित्र गंदी हो गई हैं और अब कहीं-कहीं तो नर्मदा जल स्नान के लायक भी नहीं बचा है ।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सीहोर जिले में नर्मदा तट के निवासी है और स्वयं को नर्मदा पुत्र बताकर इस क्षेत्र की जनता का भावनात्मक उपयोग करते रहते है, लेकिन औद्योगिक विकास के नाम पर मुख्यमंत्री बिना सोचे समझे नए उद्योग लगाने के लिए नर्मदा तट को प्राथमिकता दे रहे है. सरकार का मानना है कि उदगम स्थल से ही पवित्रता बहाल करके नदी को प्रदूषण मुक्त कराया जा सकता है।
एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार नर्मदा नदी के तट पर बसे नगरों और बड़े गांवों के पास के लगभग 100 नाले नर्मदा नदी में मिलते हैं और इन नालों में प्रदूषित जल के साथ-साथ शहर का गंदा पानी भी बहकर नदी में मिल जाता है। इससे नर्मदा जल प्रदूषित हो रहा है। होशंगाबाद में 29 नाले हैं, मंडला में 16 और जबलपुर ज़िले में 12 बड़े नाले हैं जो नर्मदा को प्रदूषित कर रहे हैं।
लाभकारी खेती के लिए किसान कई प्रकार के रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। एक फसल के दौरान पांच से सात बार सिचाई भी होती है। इसके बाद भी खाद और कीटनाशकों के घातक रसायन खेत की मिट्टी में घुल-मिल जाते हैं जो वर्षाकाल में पानी के साथ बहकर नर्मदा नदी में मिलते हैं और इससे प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है।
भारतीय मानक संस्थान ने पेयजल में पीएच 6.5 से 8.5 तक का स्तर तय किया है, लेकिन अमरकंटक से दाहोद तक नर्मदा में पीएच स्तर 9.02 तक दर्ज किया गया है। इससे स्पष्ट है कि नर्मदाजल पीने योग्य नहीं है और इस प्रदूषित जल को पीने से नर्मदा क्षेत्र में ग़रीब और ग्रामीणों में पेट से संबंधित कई प्रकार की बीमारियां फैल रही है, इसे सरकारी स्वास्थ्य विभाग भी स्वीकार करता है। यहॉ की सरकार, नर्मदा के धार्मिक-सामाजिक महत्व को अपनी राजनीति के लिए तो भुनाती है और नर्मदा जल को प्रदूषण मुक्त करने के नाम पर लाखों करोड़ों खर्च भी करती है, तो दूसरी ओर नगरीय संस्थाएं ग़ैर ज़िम्मेदारी से काम करते हुए गंदे नालों का पानी नर्मदा में बहाकर नदी की पवित्रता को रोज़ नष्ट करती हैं।
कुल मिलाकर प्रकृति के नाम पर करोड़ो मिलते है उसका दषांष खर्च करके बाकी पूर्णाषं जेब मे चली जाती है। बौद्विक क्षमता वाला चिंतनषील मनुष्य आज अपनी आधुनिक विकास प्रक्रिया में अपने थोड़े से लाभ के लिए जल, वायु और पृथ्वी के साथ अनुचित छेड़-छाड़ कर इन प्राकृतिक संसाधनों को जो क्षति पहुंचाई है, इसके दुष्प्रभाव मनुष्य ही नहीं बल्कि जड़ चेतन जीव वनस्पतियों को भी भोगना पड़ रहा है ।

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