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मध्यप्रदेश की जीवनधारा - पवित्र नर्मदा

Posted On: 8 Aug, 2011 Others में

सुप्रभात

Ashish Shukla

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स्दियों पहले हमारे ऋषि – मुनियों ने प्रकृति को संरक्षित करने के उद्ेश्य से, मनुष्य को एक ‘‘मनोबैज्ञानिक आचार संहिता‘‘ में बांध दिया था। जिसमें हम नदियों को ‘‘मॉ‘‘ के रूप में और वृक्षों और पहाड़ों को ‘‘देवता‘‘ के रूप में मानकर उनकी पूजा करते चले आ रहे है। तब से लेकर आज तक मनुष्यों के आचरण, इस संस्कृति के प्रति अनुशासित हो गये है। अगर हम किसी बरगद, नीम ,पीपल आदि के वृक्ष को देखते है तो तुरंत हमारे ‘‘सिर‘‘ उनके सामने ‘‘नतमस्तक‘‘ हो उठते हैं। ऐसे ही हम किसी नदी के तट पर पहुॅचते है तो उसके शीतल ‘‘जल‘‘ को अपने सिर से लगा कर ‘‘मॉ‘‘ के रूप में उनसे प्रार्थना करके उनका आर्शीवाद मॉगते हैं।
हमारे धर्म – शास्त्रों में भी इनका उल्लेख मॉ और देवता के रूप में होने के कारण, ये आचरण हमारे स्वभाव में बस गये है। शायद इसी का यह कारण है कि आज भी हम इनको गंदा नही देख सक्ते या इनके प्रति किसी भी प्रकार की क्षति को हम सहन नहीे कर पाते है। और इसीलिये हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में भी इनको संरक्षित करने के लिये कानून बनाये गये है।
मध्यप्रदेश की ‘‘गंगा‘‘ कही जाने वाली ‘‘नर्मदा‘‘ देश की ‘पॉचवी‘ प्रमुख नदी है, इसे मध्यप्रदेश की ‘‘जीवनधारा‘‘ भी कहते है। नर्मदा ,गंगा के समान पवित्र मानी जाती है। नर्मदा का उद्गम स्थल ‘‘अमरकंटक‘‘ नामक स्थान में है जहॉ वह ‘‘विन्ध्याचल पर्वत श्रेणियों‘‘ से प्रारंभ होकर गुजरात के ‘‘खंभात की खाड़ी‘‘ { अरब सागर} में जाकर समाप्त होती है। यह ‘पश्चिम‘ की ओर बहने वाली नदियों में से एक है यह कहीं पर भी ‘डेल्टा‘ नही बनाती है ,जो कि पश्चिम की ओर बहाव वाली नदियों की यह एक खास विशेषता है। ‘‘नर्मदा‘‘ नदी का ‘‘उत्तरी‘‘ भाग सिंचाई और नौकायन योग्य नहीं है। इसकी कुल लंम्बाई 1312 किमी है तथा मप्र में बहाव 1077 किमी है। इसकी कुल 7 सहायक नदियॉ है – कुन्दी ,शेर, हिरन ,तवा ,हथिनी बंजर ,दुधी ,शक्कर है। यह मध्यप्रदेश में 15 जिलो से होकर गुजरती है। प्रख्यात भूगोलविद् ‘‘टॉलमी‘‘ ने इस नदी को ‘‘नामादोस‘‘ कहा है। इसके अन्य प्रमुख नाम – मैकल सुता ,सोमो देवी तथा रेवा है। रानी अवन्तीबाई परियोजना ,सरदार सरोवर परियोजना और इंदिरागांधी नर्मदा सागर परियोजना इसी नदी पर स्थित है। इसके अलावा 29 बड़ी ,135 मध्यम व 3000 छोटी योजनाऐ भी चल रही है।
नर्मदा पर दर्शनीय स्थल भी है यह अमरकण्टक में स्थित ‘‘कपिलधारा और दुग्धधारा सहस्त्रधारा नामक जलप्रपात है ,जो कि 3500 फिट ऊॅचाई पर स्थित हिल स्टेशन है , यह प्रपात 6 किमी तक तेज प्रवाह बनकर गिरता है। अमरकंटक में ‘‘नर्मदा कुण्ड‘‘ और ‘‘नर्मदा माई की बगिया‘‘ नामक दर्शनीय स्थल भी है जो यहॉ की दृश्यों को मनोरम बनाते है। इसी कारण से वर्ष 2005 में अमरकंटक को ‘‘पवित्र नगर‘‘ घोषित किया गया, और फरवरी 2011 में ‘‘मण्डला‘‘ में नर्मदा पर पहली बार कुम्भ का मेला लगा। ‘‘भेड़ाघाट‘‘ जबलपुर से 22 किमी दूर है यहॉ पर ‘‘धंुऑधार‘‘ नामक जलप्रपात है। नर्मदा यहॉ पर 60 फुट की ऊॅचाई से नीचे गिरती है। मन को लुभाने वाली दूधियाधार में धुॅआ की तरह उड़ने वाली पानी की बौछार ,यह प्राकृतिक दृश्य बड़ा ही मनोरम है। यहॉ नर्मदा का बहाव संगमरमरी चट्टानों के बीच से होकर गुजरता है जो इसके सौंदर्य में चार चॉद लगाती है।‘‘पंचवटी‘‘ से ‘‘बंदरकूदनी‘‘ तक नौकाबिहार कर यहॉ की संगमरमरी चट्टानों का आनंद लिया जा सक्ता है। ‘‘भृंगु ऋषि‘‘ ने यहीं तपस्या की थी, और चौसठ योगिनी मंदिर भी यही पर है।
सौभाग्यशाली है वे शहर जो नदियों के तट पर बसे है। प्राचीनकाल में अनेक धार्मिक ,सांस्कृतिक एवं ब्यापारिक केन्द्र नदियों के किनारे स्थापित किये जाते थे ,यहॉ तक कि ‘‘मेले‘‘ भी नदियों किनारे ही लगा करते थे। जिससे नदियों का किनारा एक ब्यवसायिक रूप लेता गया और धीरे – धीरे हमारे रहन – सहन में शहरीकरण का उदय हुआ। आज उन शहरों को ‘नदियों का किनारा‘ प्रकृति द्धारा दिया गया एक वरदान शाबित हुआ। जीवन की प्रथम आवश्यक्ता ‘‘जल‘‘ को पाने के लिये, वे नदियों के कितने करीब बसे है। मध्य प्रदेश के पॉच महत्वपूर्ण नगर जैसे – जबलपुर ,होशंगाबाद ,बड़वाह , महेश्वर ,आंेकारेश्वर आदि नर्मदा के किनारे बसे हैं। इसी तरह नर्मदा के बॉऐ और दॉऐ तट पर मिलने वाली भी कुछ सहायक नदियॉ इस प्रकार है। जिसमें बॉऐ तट पर मिलने वाली प्रमुख नदियों में बरनार ,बंजर ,शेर ,शक्कर ,दूधी ,तवा ,गजाल ,दोटी तवा ,कुन्दी ,देव और गोई है। जबकि दॉऐ तट पर मिलने वाली नदियों में हिरन ,तिनदोनी ,बरना ,चन्द्रकेशर ,कानर ,मान ,ऊटी एवं हथनी हैं।
किसी भी राज्य की सभ्यता ,संस्कृति एवं आर्थिक विकास में नदियों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। भोर की लालिमा ज्यों ही नर्मदा में फूटती हुई सी दिखती है मानों सूरज ,मॉ नर्मदा के शीतल जल को आईना समझ कर उसमें अपना चेहरा देखकर प्रसन्न हो रहा हो। नर्मदा किनारे बने हुऐ घाट ,ऊॅचे – ऊॅचे पहाड़ों की तरह सुन्दर लग रहे थे। कही पर ‘‘कुटिया‘‘ तो कही पर ‘‘छपरिया‘‘ बनीं हुई थी। जो मन को मोहित करने के लिये प्रतीक्षा सी करती दिखाई पड़ रही थीं। चारों ओर बने हुऐ मंदिरो पर फहरे हुऐ झण्डे दिख रहे थे और घंटों की आवाज गूॅज रही थी ,कही दूर नगाड़ों ,मृदंग की थाप सुनाई दे रही थी कि एकाएक ऑखों के सम्मुख स्पष्ट दृश्य दिखाई दिये – एक घाट पर मॉ नर्मदा की ‘‘महाआरती‘‘ हो रही थी।
नर्मदा स्नान के बाद कुछ लोग ‘‘पंडों‘‘ से तिलक लगवाकर पूजा अर्चना कर रहे थे, तो कुछ वापस लौट रहे थे ,कि उनसे ‘‘दान‘‘ की आस लगाऐ बैठे भिखरियों ,की एक टोली उस वापस लौटते शख्स के दोनों हॉथों के सामने तक ‘‘कटोरों‘‘ का एक समूह टूट सा पड़ा। उन कटोरों की कड़कड़ाहट में वह शख्स एैसा खोया कि उसके पास दानस्वरूप चंद सिक्कों की खनखनाहट उसे समझ में नही आई ,कि हमने किसके कटोरे में कितने सिक्के छोड़े। जब वह आगे बढ़ता है तो उसे भिक्षा मॉगता हुआ एक विकलांग दिखा ,जो उस भीड़ में शामिल होने के लायक वह नहीं था। उस शख्स ने अपने जेब में इधर उधर टटोला तो एक सिक्का मिला, उसको दे दिया, और आगे बढ़ चला ही था कि पीछे से पुनः वही भिखारियों की टोली उसे चारों तरफ से घेरने लगी वह शख्स दॉऐ – बॉऐ कटता हुआ वहॉ से ‘‘नर्मदे हर‘‘ के स्वर में अपने गंतव्य को चल पड़ा। सूरज के डूबते ही मॉ नर्मदा में लोग दीपदान करने आते हैं। अॅधेरे मे दीपों की तैरती वह लड़ियॉ मानों शीतल जल में असंख्य ‘‘तारों‘‘ की तरह टिमटिमाते हुये से प्रतीत होते रहते है। यह द्श्य मन को सुकून और शांति देने वाला होता है।
प्रगति के इस अंधी दौड़ में आज ‘मानव‘ ने ‘मानव‘ के अंदर जो ‘‘विष‘‘ घोला है। उससे जीवन की ‘‘मूल शंाति‘‘ नष्ट हो गई है। जीवन का एक ही मार्ग रह गया है – अज्ञानता एवं अपराध। हम नदियों को ‘‘मॉ‘‘ पहाड़ों एवं वृक्षों को ‘‘देवता‘‘ मानकर पूजा करने वाली संस्कृति के अनुयाई तो है, लेकिन हम अपनी नमर््ादा मॉ को मैला और र्जरर्जर होने से नहीं बचा सकें। आज उसे जरूरत है हर घाट पर एक सफाई अभियान की, जो लोगों में बिना जगरूकता अभियान के संभव नहीं हो सक्ता। जबलपुर के घाटों पर तो सफाई अभियान की कारसेवा प्रारंभ है। सवाल उठता है बाकी शहरों के लोग क्या अपनी मॉ नर्मदा को साफ सुथरा नहीं देखना चाहते । भारतीय परंपरा एवं संस्कृति में जीवन का जो मूल तत्व है, वह है – जीवन का आधार व्यवस्थित रहे। नदियो के प्रति हमारे ऋषि – मुनियों की मान्यता ‘‘मॉ‘‘ के रूप में रही है लेकिन आज हमारे आचरण उसे संजोने में पुत्रवत नहीं है।

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