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चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका

Posted On: 4 Aug, 2015 Others में

aarthik asmanta ke khilaf ek aawajLOKTANTR

ashokkumardubey

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कहने के लिए तो अपने देश में एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव आयोग है जिसकी जिम्मेवारी देश में फ्री और फेयर इलेक्शन करवाने की जिम्मेवारी है , पर क्या सचमुच चुनाव आयोग चुनाव के दौरान विभिन्न पार्टी के नेताओं द्वारा आचार संहिता का उल्लंघन करने पर कुछ क़ानूनी पाबन्दी लगा पाता है नहीं ना ! ऐसा क्यों है ? जब अपने देश में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और संविधान के तहत उसे अधिकार भी प्राप्त है इतना सब कुछ होने के बावजूद भी चुनाव आयोग इतना असहाय क्यों दीखता है . विगत ६३ सालों से चुनाव आयोग काम करता आ रहा है और चुनाव दर चुनाव उसको नित नए अनुभव भी प्राप्त होते आये हैं फिर भी चुनाव आयोग नेताओं द्वारा झूठे वायदे करना जनता को बेहतरीन सपने दिखाना “अच्छे दिन आनेवाले हैं ” कहते रहना और चुनाव में जीत हासिल होने के बाद यह कहना की वह तो चुनावी जुमला था, काम कर रहें हैं और समय चाहिए वगैरह- वगैरह ऐसा कहकर समय बिताते जाना और तो और संसद में बैठकर केवल हल्ला हंगामा करना जनता का कोई काम नहीं करना और काम नहीं करने पर भी भत्ता एवं अन्य खर्च लेना संसद की कैंटीन में सब्सिडी वाला भोजन करना इत्यादि-इत्यादि कहने का मतलब है की सांसद होने के नाते वह सब सुविधाएँ लेना जो उनको क़ानूनी तौर पर मिला हुवा है बस कानून केवल इसके लिए ही नहीं नहीं बना की बेशक उन्होंने जनता का कोई काम नहीं किया , उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान जो जनता से वायदे किये उनको पूरा क्यों? नहीं किया इस पर कोई चर्चा विचार भी नहीं करना . ऐसे में देश की जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है
अब थोड़े ही दिनों में बिहार में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं और फिर वही वादों और सपनों का दौर शुरू हो गया है बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैंजिनमें तरह तरह के नारे लिखे गए हैं , होर्डिंग लगाने में भो होड़ मची हुयी है किसका होर्डिंग कितना बड़ा और कितना ऊँचा होगा इसकी अंधी दौड़ भी मची हुयी है बेहिसाब धन लुटाया जा रहा है और लुटाएं भी क्यों ना , इस धन को कमाने के लिए उनको पसीना तो बहाना नहीं पड़ा है यह धन तो उनको ठेकेदारों उद्योगपतियों से मिला है जिनको इन नेताओं ने माला माल कर रखा है इतना ही नहीं जिस किसी ने भी पैसा देने से मना किया उसका क्या हश्र होता है यह तो वही जानते हैं अतः इन सब बातों पर गौर करने के बाद मेरे मन में एक सुझाव आया है की चुनाव आयोग को जल्द से जल्द यह कानून पास करना चाहिए की आने वाले चुनावों में नेता अपने धन का पूरा ब्यौरा देंगे और उसको आयकर विभाग सत्यापित करेगा तथा नेता कोई वायदा नहीं कर सकते इस पर फ़ौरन रोक लगनी चाहिए और उनके लिए यह निर्देश जारी की जानी चाहिए की नेता गण चुनाव प्रचार के दौरान जनता को यह बताएँगे की बीते ५ सालों में उन्होंने जनता के लिए कौन से काम किये कितनी योजनाएं पूरी कीं और उसके खर्च का ब्यौरा भी जनता को बताएं की उस योजना की प्रकालित राशि कितनी थी और कितने में पूरी की गयी क्यूंकि अक्सर ऐसा ही होता है जब केंद्र और राज्यों में अलग अलग पार्टियों की सरकार होती है तो राज्य सरकार केंद्र को दोषी ठहराती है और केंद्र सरकार राज्य को केंद्र की सरकार कहती है की उन्होंने तो पैसा भेजा राज्य सरकार ने उसको योजना पर खर्च नहीं किया और इन्हीं आरोप प्रत्यारोप में उनका कार्यकाल बीत जाता है और जनता मूक दर्शक बानी रहती है इसलिए अब जनता से नेताओं को अपने काम का खुलासा करना होगा और योजनाओं को पूरा करने में जो ज्यादा धन लगा वह नेताओं को भरपाई करनी होगी तभी वे अगले चुनाव में हिस्सा ले सकेंगे आज देश में क्या हो रहा है नेता लोग राजा की तरह रहते हैं जब मर्जी अपने वेतन भत्तों को बढ़ा लेते हैं सब्सिडी वाला भोजन भी करते हैं उनका परिवार सैर सपाटेकरता है और कहता है हम गरीबों दलितों के नेता हैं और उनके लिए काम कर रहें हैं .
इस सन्दर्भ में एक बात और जोड़ना चाहूंगा बीते दिनों में जागरण के मुद्दा कालम में एक प्रश्न आया था क्या “विधान सभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ किये जाने चाहिए ” यह बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है और निश्चित तौर पर इस पर गहन चर्चा टेलीविजन के माध्यम से होनी चाहिए . चुनाव में देश का बहुत सारा पैसा बर्बाद होता है अतः मेरी राय में पूरे देश में विधान सभा और लोकसभा चुनाव एक ही साथ कराये जाने इससे देश का काफी धन बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा चाहिए और उस धन को किसी लाभकारी योजना मद में खरच किया जा सकेगा आज नेता चुनाव जीत कर क्या तमाशा कर रहें हैं जनता और दुनिया देख रही है की किस तरह हल्ला हंगामा करके सांसद लोग संसद को नहीं चलने दे रहे हैं
संसद में कोई काम काज हो ही नहीं रहा है बिलकुल ठप्प है एक सप्ताह तो हंगामे के भेंट चला गया अगर चुनाव के दौरान नेताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च हुवा होता तो क्या तब भी ये नेता ऐसा ही ब्यवहार करते जो आज कर रहें हैं इनको तो लूट का धन मिला हुवा है जो लोग समाज को लूटते हैं वही आज हमारे नेता बने बैठे हैं नताओं की कमाई का जरिया क्या है, इसका खुलासा कभी इन्होने किया हर ५ साल बाद उनकी संपत्ति कई गुना बड़ी हुयी दिखती है किसी ने इस पर सवाल किया एक अच्छी नौकरी करने वाले पर तो आयकर का सिकंजा हमेशा कसा रहता है और ये नेता जो जनता के कमाए धन को अपना बनाये बैठे हैं कितना आयकर देते हैं इसका खुलासा हुवा इन नेताओं ने तो इस देश का धन काला धन बनाकर विदेश के बैंकों में रख आये हैं किसी पर कोई क़ानूनी कार्रवाई हुयी कहाँ है कानून क्या इस देश में कानून का राज है अगर कानून का राज होता तो एक आतंकवादी जिसने २५७ लोगों का कतल कर दिया जब उसको फांसी दी जाती है तो उसकी चरचा टेलीविजन पर हप्तों चलती है आखिर टेलीविजन चलाने वाले चैनलों को हुवा क्या है? या तो दुष्कर्म की घटना को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं या ये नेताओं की बकवास जनता को सुनाते हैं और इतना महत्वपूर्ण विषय चुनाव के बारे में है उस पर चरचा करने की भी नहीं सोंचते मेरा अनुरोध कभी देशहित वाले विषयों पर भी चरचा चलाये और मेहरबानी करके धार्मिक उन्माद पैदा करनेवाले विषयों पर कोई चर्चा ना करें उससे समाज में समरसता की कमी आती है
अंत में मैं यही कहूँगा चुनाव आयोग जल्द से जल्द ऐसा कानून बनाये की नेता लोग जनता से चुनाव प्रचार के दौरान केवल अपनी उोपलब्धियाँ गिनवाए बताएं, नाकि झूठे वायदे करें नाहीं जनता को झूठे सपने दिखाएँ और चुनाव जीत जाने के बाद जनता को ठेंगा दिखाएँ

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