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ये हाय तौबा क्यों?

Posted On: 8 Jun, 2018 Politics में

एक विश्वासएक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

Ashok Srivastava

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पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का नागपुर जाना और उसपर देश का दो फाँट हो जाना मुझे तो बकवास ही लगा। प्रणव का अपना विशेषाधिकार है कि वो कहाँ जाएँ और क्या सोचें या बोले। यही सबसे दुखद पहलू है कि अभिव्यक्ति की आजादी माँगने वाला लकड़बग्घा समूह भी आज प्रणव मुखर्जी की घोर आलोचना कर रहा है। आरएसएस कोई सिमी या अलकायदा या आईएसआईएस जैसा समूह नहीं है परन्तु सेकुलर मुस्लिम दलित और ईसाई इसको उसी के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं। यह उनका मौलिक अधिकार है क्योंकि हमारे देश का अपवित्र व पक्षपाती संविधान इसकी इजाज़त उनको देता है। परन्तु कभी तो हम संविधान के ऊपर उठें धर्म जाति को भूलें और देश की बात करें। मैं यह बात महज इसलिए कह रहा हूँ कि यही गैंग है जो आतंकवादी संगठनों के लिए रात को कोर्ट इसी घटिया संविधान की दुहाई देकर खुलवाता है और कोर्ट के वही जज आतंकियों के लिए अविलंब हाजिर भी हो जाते हैं बिना यह सोचे कि गरीब के मुकदमे पच्चीसों साल लटका कर मार देने से संविधान पर खतरा नहीं आता तो आतंकियों के लिए रात को कोर्ट नहीं खोलने पर भला क्या गाज गिर प्रणव का अपना विशेषाधिकार है कि वो कहाँ जाएँ और क्या सोचें या बोले।

 

 

यही सबसे दुखद पहलू है कि अभिव्यक्ति की आजादी माँगने वाला लकड़बग्घा समूह भी आज प्रणव मुखर्जी की घोर आलोचना कर रहा है। आरएसएस कोई सिमी या अलकायदा या आईएसआईएस जैसा समूह नहीं है परन्तु सेकुलर मुस्लिम दलित और ईसाई इसको उसी के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं। यह उनका मौलिक अधिकार है क्योंकि हमारे देश का अपवित्र व पक्षपाती संविधान इसकी इजाज़त उनको देता है। परन्तु कभी तो हम संविधान के ऊपर उठें धर्म जाति को भूलें और देश की बात करें। मैं यह बात महज इसलिए कह रहा हूँ कि यही गैंग है जो आतंकवादी संगठनों के लिए रात को कोर्ट इसी घटिया संविधान की दुहाई देकर खुलवाता है और कोर्ट के वही जज आतंकियों के लिए अविलंब हाजिर भी हो जाते हैं बिना यह सोचे कि गरीब के मुकदमे पच्चीसों साल लटका कर मार देने से संविधान पर खतरा नहीं आता तो आतंकियों के लिए रात को कोर्ट नहीं खोलने पर भला क्या गाज गिर जाएगी।

यही जज जिनको लोकतंत्र और संविधान खतरे में नजर आ रहा होता है कभी यह नहीं सोचते कि न्याय में देरी करना न्याय न देने के बराबर ही है। वैसे भी सब कुछ लुटने के बाद मिलने वाला न्याय किस काम का? परन्तु यह बाते वो नहीं समझ सकते हैं जो माँ बहन को भी बाजारवादी रिश्ते से देखते हैं क्योंकि जब इनके लिए अपने खून के रिश्तों की ही कीमत नहीं है तो ये देश से कभी रिश्ता रख ही नहीं सकते हैं। यह लोग नितांत भौतिकवादी हैं और भोग विलास युक्त जीवन के आगे यह वर्ग कुछ और सोच भी नहीं सकता है। यह वर्ग उस अंधे के समान होता है जो महज एक निवाले के लिए अपना सर्वस्व दाव पर लगा देता है। आज यही सबकुछ हमारे सामने है। ये दोहरी मानसिकता के लोग जो करें वही सही बाकी सब गलत है। इनके नेता पाकिस्तान से सरकार बदलवाने की सुपारी की बात करें तो ठीक मगर इनका नेता अपने स्वाभिमान की बात करे तो गलत क्योंकि इनके यहाँ तो माई बाप देश नहीं वो है जो पार्टी या गैंग का सबसे बड़ा गुंडा है।

यहीं पर बात खत्म समझिए या कहिए बात तो शुरू ही यहीं से होती है। चलिए फिर छेड़ेगे कोई मुद्दा। परन्तु यह जरूर कहेंगे कि प्रणव मुखर्जी की नागपुर यात्रा के निहितार्थ क्या हैं यह तो भविष्य ही बताएगा पर इतना याद रखिए कि सब खेल है समय का।
कब किसको कहाँ कैसी ठोकर लगे कि वो सबकुछ बदल कर रख दे कोई नहीं जानता है। कभी ठोकर लगने के बाद लोग तुरंत बदलते हैं तो कभी समय भी लग जाता है और जिनको मिटना होता है वो तो बदलता भी नहीं है।
यह सब तो वक्त का तकाजा है।
बदला तो जिया वरना जनाज़ा है।

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