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काहे का लोकतंत्र!

Posted On: 10 Aug, 2019 Politics में

एक विश्वासएक विश्वास, दुनिया के बदलने का।

Ashok Srivastava

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इससे बड़ा भारत का दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि यहाँ चुनाव लड़ना तो छोड़िए मंत्री बनने के लिए भी किसी शैक्षिक या अन्य योग्यता की आवश्यकता नहीं है।
कोई जेल से चुनाव लड़ रहा है तो कोई पैसे से वोट खरीद कर और किसी को पता नहीं है कि वो दे किसे रहा है वोट, बस देना है तो दे आए पार्टी या जाति या धर्म देख कर।
कल अगर कोई किसी कुत्ते या सुअर तो चुनाव लड़वाकर उसको जीत हासिल करवा दे कल अगर कोई किसी कुत्ते या सुअर तो चुनाव लड़वाकर उसको जीत हासिल करवा दे तो?
तो क्या भइया, संविधान महीं यह लिखा है क्या कि कुत्ते या सुअर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं?
क्या कर लोगे, सर्वोच्च न्यायालय जाओगे तो जाओ वहाँ से तो डाँट कर भगा दिए जाओगे क्योंकि वहाँ भी तर्क होगा कि संसद और विधान सभाओं में आज बैठे कौन हैं? दो पैर पर चलने से कोई इंसान हो जाता है क्या?
कर्म देखा करे, समान कर्म वालों का अधिकार भी समान होना चाहकर्म देखा करे, समान कर्म वालों का अधिकार भी समान होना चाहिए।
तो फैसला किसके पक्ष में होगा समझ गए न।
जय हिंद।
जय हो अंबेडकर के कापी पेस्ट वाले संविधान महाराज की जो जो सभी जीवों को एक मानता है। सभी सुकर्मी और दुष्कर्मी को बराबर का अधिकार देता है और इससे भी बढ़ कर आम जनता को कूड़ा करकट और आतंकियों को बिरयानी और पुलाव देता है।

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