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ई हौ रजा इंटरनेशनल होली - Holi Contest

Posted On: 22 Mar, 2011 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

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नारद गुरु, मटरू गुरु के साथ अस्सी चौराहे पर मुंह में पान जमाए राजनैतिक चकल्लस में मस्त थे|उनकी पवित्र शिखा – नारायण, नारायण|जैसे सावन में इठला – इठला कर झूला झुलती कोई षोडशी|गुरु होली की तरंग है, सो बनारस का आम आदमी भी बहुरुपिया बन जाता है|नारद एक पौराणिक जीव ठहरे – परम वैष्णव|गौरांग, लकदक सफ़ेद धोती, गले में तुलसी की माला, भाल पर श्वेत चन्दन, एक तानपुरा और सबसे बढ़कर उनका ट्रेडमार्क (जिसके बारे में ऊपर बताया जा चुका है)|कहते हैं नारद को तीनों लोकों की सब बातें पता रहती हैं|बी.एस.एन.एल. के ३ जी की तरह उनका इन्फार्मेशन सिस्टम लाइटनिंग फास्ट होता है|दीपिका पदुकोने को भी शायद इस बात का पता नहीं होगा|खैर, नारद को फेसबूकिया मिसिर (मिश्र) और लीबिया से लेकर जापान के ताजातरीन भूकंप और विकिलिक्स तक की सब खबर है|नारद गुरु अपनी चुंडी हिला हिला कर एक एक घटना का इस खूबसूरती से वर्णन कर रहें थे की चक्ल्ल्सानुरागी समस्त टूंटपुजिये आम छाप नेता और अनार छाप कवियों का समूह राजनैतिक सत्संग रूपी मकरंद का पान करने के लिए मधुमक्खियों की तरह भनभनाने लगा|नारद गुरु परम योगी सो अपनी ही हांके जा रहे हैं –

नारद गुरु – अरे मटरू गुरु! भउजियो का कुछ खबर – ओवर है?

(मटरू गुरु पशोपेश में|नारद को खबर सुनाये की ओवर सुनाये, ससुरा विश्वो कप तो चालू है अउर पता नहीं नारद कउने भउजी की बात कर रहे हैं? खैर, सकपकाते हुए पूछ ही लिया )

मटरू गुरु – गुरु! तोहार बतिया त तुमहि जानौं|अब तुमही बतावों की भउजी कउन हैं अउर कहाँ गयी हैं?

नारद गुरु – अरे उहै राजीवप्रिया, तोहके नाहीं पता का मटरू?

मटरू गुरु – पगलाई गये हो का, या फिर भंग की तरंग में हो? भला अघोषित राष्ट्र्नायिका भउजी कैसे हुई?

नारद गुरु – गुरु! हम मोहनदास को राष्ट्रपिता कहते हैं न? अउर राष्ट्रपत्नी को राष्ट्रपति? जवाहर को चच्चा नहीं बोलते? अउर राजीव भैया को स्वर्गीय राजीव भैया ही तो कह कर पुकारते हैं? अब भईया की मेहरारू भउजी नही होंगी तो अउर कौन होगा? सुना है आजकल लंदन गयी हैं?

मटरू इतना सुनते ही जोर जोर से नाचने लगा|

होलिया में उड़ेला गुलाल, म्हारो मन लंदन गो|

म्हारो कतरोची पांच, छह मिलियन –

यूरो की करेला बौछार| म्हारो मन लंदन गो|

म्हारो राहुल छैल – छबीलो,

कलावती को गुहार| म्हारो मन लंदन गो|

म्हारो बढेरो ढेरो ढेरो –

ले के आयो माल| म्हारो मन लंदन गो|

स्वामी म्हारो जी को दुश्मन,

रोज चले इक चाल| म्हारो मन लंदन गो|

मनमोहन को बात निरालो,

पगड़ी पानीदार| म्हारो मन लंदन गो|

म्हारो राजा, दो गलों (2G) वाला,

जे पी सी जी को जवाल| म्हारो मन लंदन गो|

म्हारो कलमाड़ी, खेल, खिलाडी,

हँसे फुलाए गाल| म्हारो मन लंदन गो|

म्हारो अडवाणी,बिलाग (Blog)धारी|

विकी की गले नहीं दाल| म्हारो मन लंदन गो|

गाना खत्म हुआ|मटरू ने आँखे खोली|सामने देखा तो नारद खिसक चुके थे|मटरू को गुस्सा आया|उसने जोर से आवाज लगाई – अरे ओ नारद! कितने घोटाले हैं रे? ऊपर से आवाज आई ,” हुजूर! अभी गिन रहा हूँ|” नारद एक बार फिर से मटरू के सामने थे|मटरू ने झुंझला कर कहा,” कहाँ चले गये थे?”

नारद गुरु – गुरु! तुम्हारा गाना इतना मस्त था कि सुनते सुनते समाधिस्थ होकर अद्वितीय भाव जगत में विचरण करने लगा था और तुम तो जानते ही हो कि अप्रतिहत गति होने के कारण मैं भावलोक में भी विचरण करने लगता हूँ|

मटरू अब मायूस हो गया|नारद समझ गये कि मटरू भी अप्रतिहत गति वाली सिद्धि चाहता है|नारद ने मटरू से कहा|

नारद गुरु – गुरु! तुम जो चाहते हो वह है तो जी का जंजाल लेकिन एवमस्तु|

नारद के इतना कहते ही एक बिजली कड़की और मटरू अंतर्ध्यान|नारद मुस्काए – नारायण, नारायण|

दुपहरिया से शुरु हुई नारद लीला अचानक ठहर गई|गुरु, अब तो होलिका में भी आग लगाने का समय हो गया है और मटरू का कहीं अता पता ही नहीं |नारद व्यग्र हो उठे, होली की हुड़दंग अपने पूरे शबाब पर थी|हर हर महादेव के नारे से पूरी काशी शिवमय हो रही थी|नारद समाधिस्थ होना चाहते थे|दिव्य दृष्टि का प्रयोग कर मटरू की स्थिति का पता लगाना चाहते थे|इसके लिए उन्हें कोलाहल मुक्त स्थान की आवश्यकता थी|नारद ने काशी का चप्पा चप्पा छान मारा|हर जगह उन्हें भीड़ ही भीड़ नजर आई|कहीं नंग धण्ग भंगेड़ी हुल्लारे|कहीं चित्र विचित्र वेषधारी ट्रेडिशनल काशीपुत्र|कहीं आधुनिकता के रंग से सराबोर टेक्नोसेवी युवावर्ग|कहीं वैभव का प्रदर्शन करते नवधनाढ्य|विकास के नाम पर पूरे शहर को गडहा बना दिया गया है|नारद अकुलाने लगे|गंगा पार रेती पर उन्हें कुछ सुकून मिला तो वह धड़ाम से गिर पड़े और रेत पर ही लोटने पोटने लगे|हे गंगाधर! हे शिवशंकर! हे विश्वनाथ! कहाँ हो प्रभु?विश्व की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी काशी भी मुम्बईया बुखार की शिकार हो गई है|अब तो आँखे खोलो|हे त्रिपुरान्तक! अब तो मंदिरों में भी लोग तुम्हारा दर्शन नहीं अपना प्रदर्शन करने जाने लगे हैं|

नारद इन्ही विचारों में खोये हुए थे कि सामने, गंगा उस पार काशी में गंगा आरती के दीप, पुन्य सलिला कि धारा में तिरने लगे थे|नारद वैचारिक जगत से पुनः यथार्थ के धरातल पर खड़े थे|उन्हें मटरू कि चिंता सताने लगी थी|उन्होंने ध्यान लगाया और मटरू का आह्वान किया|मटरू तत्क्षण ही नारद के सामने था|”त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या, विश्वस्य बीजं परमासी माया”

नारद गुरु – आंय मटरू, अरे गुरु! नवरात्री अभी दूर है और तुम दुर्गा सप्तशती पढने लगे? कउनो विशेष बात है का?

मटरू गुरु – हाँ, है तो, पहले तुम यह बताओ कि तुमने मुझे डिस्टर्ब क्यों किया?

नारद गुरु – यह लो कर लो बात, अरे भई अप्रतिहत गति भी मैंने ही तुम्हे दी  अउर तुम मुझसे ही लाल पीला होने लगे|कउनो इम्पोर्टेड रम चढ़ाई लिए हो का ?

मटरू गुरु – बतिये कुछ ऐसी है|अब का बताये, पहिली बार तो स्वर्ग का सुख मिला था, वह भी सशरीर अउर तुम इंद्र देवता बन कर त्रिशंकु कि तरह लटकाई दिए|

नारद गुरु – अब खुल कर भी बताओगे कि भूमिके बाँधते रहोगे?

मटरू गुरु – अब का बताएं गुरु! जब तुमने मुझे सिद्धि दी तो मेरे ऊपर लंदन का नशा चढा हुआ था|बस फट से दाखिल हो गये नीरा मैडम द्वारा आयोजित वैष्णवी होली ग्रुप में|का बताएं गुरुं, वह, बस पूछो मत|

नारद गुरु – ऐसा क्या हुआ मटरू? तुम तो मेरी जिज्ञासा बढ़ाये जा रहे हो|

मटरू गुरु – अब पूछ ही लिया है तो सुन लो –

सबके हाँथ में अपने अपने देश की पिचकारी थी|

भारतीय रंग से पूंजीपतियों को नहलाने की तैयारी थी|

एक बड़े से ड्रम में घोल कर रखा गया था रंग|

राजा इंटरनेशनल होली की चउचक हुड़दंग|

सभी हस्तियाँ थी चाहे ओसामा या ओबामा|

ढूंढे से भी नहीं मिला कोई नाचीज सुदामा|

गोरी गोरी गालों वाली बालीवुड की हूरें|

अपने सल्लू भाई लेकिन हालीवुड को घूरें|

डालर के स्विमिंग पुल में क्या कांग्रेसी भजपाई|

शिवसेना का धनुष उठाकर पहुंचे थे बसपाई|

अम्बानी,टाटा के संग पूर्वांचल राज्य बनाने|

अमर, मुलायम सब पहुंचे मैडम के पाँव दबाने|

अउर सुनो एक फैशन शो था उहाँ जोगीरा भाई|

मटक मटक कर रैम्प पर चलती थी अपनी भौजाई|

टीम इंडिया देख वहाँ पर अपना माथा ठनका|

संता बंता जोक हो गई अपने देश की जनता |

आते आते एक दृश्य था बहुत कारुणिक भाई |

रोक रहा हूँ लेकिन अपनी रूकती नहीं रुलाई |

दिव्य शक्ति संपन्न कुछेक चेहरे थे अंधियारे में|

जैसे उनको डर लगता हो नारद उजियारे से |

घुटन और पीड़ा ले मन में सिसक सिसक कर रोते|

लंदन की बंजर धरती पर अपना मोती बोते|

पास गया तो ठेस लगी, उफ़, कैसे तुम्हे बताऊँ?

इससे अच्छा होता गंगा मैया में मिल जाऊं|

अपना नेता बोस वहाँ पर बुक्का फाड के रोता|

सावरकर जी लगा रहें थे अश्रु सिंधु में गोता |

मैडम कामा और पटेल चिथडों में लाज बचाते|

भगतसिंह, सुखदेव भीड़ से अपना नयन चुराते |


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