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जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से

Posted On: 17 Jul, 2011 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

atharvavedamanoj

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पर, न जाने बात क्या है?

इंद्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है|

सिंह से बांहे मिला कर खेल सकता है|

रूप के आगे वही असहाय हो जाता|

शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता|

बिद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से|

जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से||

मैं कभी भी स्त्री पुरुष के अंतर्संबंधो पर अपनी लेखनी का प्रहार करना ही नहीं चाहता था, किन्तु उद्दाम उच्छरिन्खल और अमर्यादित नारीवाद जब पुरुषत्व को चुनौती देने लगे|उलटी सीधी परिभाषाओं और काल्पनिक मनगढंत कथाओं के माध्यम से धर्म, नीति और सद्गुणों को लांक्षित करने लगे|तब, चुप भी नहीं बैठा जा सकता क्योंकि ऐसा करना अनर्गल लंक्षनाओं को स्वीकार करना है|कहा भी गया है “मौनं स्वीकृति लक्षणं” अर्थात मौन हो जाना अपराध को स्वीकार कर लेना है|

नंगई को सबसे बड़ा आदर्श मानने और कपडे उतार कर नारीमुक्ति की बात कहने वाली निर्बुद्धी लेखिकाओं की पाशविक मानसिकता पर तरस आता है, और जब वे इसके आधार पर विश्व की अन्य सभी सभ्यताओं की तुलना में कहीं अधिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाले उदार हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का खुलेआम मखौल उड़ाती हैं, तब उनकी यह तथाकथित बेहयाई दर्शनीय होती है|वे यह भूल जाती हैं की दुर्गध देने वाले काले कपड़ों में ही सूर्य और चंद्रमा का दर्शन करने वाली वास्तव में शोषित नारियाँ भी इस उन्मुक्तता के साथ सामंती पुरुषवादी मानसिकता का दुराग्रहपूर्ण विरोध नहीं करती, जितना की उनसे अधिक स्वतंत्रता प्राप्त मिनी स्कर्ट पहन कर कालेजों में जाने वाली संभ्रांत घर की हिंदू नारियाँ|वे यह भूल जाती है की गत १९वीं शताब्दी तक स्त्रियों को आत्माविहीन और चेतनाविहीन पशु से भी निकृष्ट स्तर का प्राणी मानने वाली ईसाई विचारधारा से प्रभावित युवतियां भी उन्मुक्त नारीवाद के लिए अपने पथ पर इस क्रूरता से प्रहार नहीं करती|

पता नहीं कहाँ से आजकल एक मिथक का जोर शोर से प्रचार किया जा रहा है|कहा जाता है स्त्रियों का कोई धर्म नहीं होता, उनकी कोई जाती नहीं होती, स्त्रियां सिर्फ स्त्रियां हैं और हमेशा से शोषित होती रही हैं|कोई हमें बताएगा की हिंदू धर्म के किस ग्रन्थ के, किस अध्याय के, किस श्लोक में यह बात कही गयी है की स्त्रियों की कोई जाती नहीं होती अथवा उनका कोई धर्म नहीं होता|यदि इस बात को मान भी लिया जाय तो क्या सारी स्त्रियाँ अधार्मिक और जातिद्रोही होती हैं? और चूँकि धर्म और जाती जैसी अवधारणायें ही राष्ट्रिय चेतना का मूलाधार हैं तो क्या स्त्रियाँ राष्ट्रघाती, देशद्रोही भी होती हैं? कदापि नहीं, इतिहास को छोडिये वर्तमान में भी हमारे पास ऐसे अनेक स्त्रियों के उदहारण है जो राष्ट्र और धर्म के लिए अपना सर्वस्व तक समर्पित कर देती हैं|इसलिए यह मानना की स्त्रियों की कोई जाती अथवा उनका धर्म नहीं होता सिद्धांततः ही गलत है और वासना को ही परम ध्येय मानने वाली मार्क्सवादी रूढ़ीग्रस्त महिलाओं द्वारा फैलाया गया भ्रमजाल है|यह भारत को तोड़ने का एक कुचक्र है जिसमे मार्क्सवादी, समाजवादी, उन्मुक्त नारीवादी और दलितवादी सभी समान रूप से शामिल है|अब एक और दुष्प्रचार पर ध्यान देना मुनासिब होगा यदि सारी स्त्रियाँ महज स्त्रियाँ ही है तो सारे पुरुष महज पुरुष ही होने चाहिए|या फिर दूसरे शब्दों में यदि सारे कुत्ते महज कुत्ते हैं तो सारी कुत्तियां महज कुत्तियां होनी चाहिए?अब आप कहेंगे आपने शब्दों की मर्यादा को भंग किया है|कम से कम आपको तो ऐसा नहीं बोलना चाहिए था|आप नर और नारी की तुलना कुत्ता – कुत्ती से कैसे कर सकते हैं|देखो भाई, बुरा मत मानना हमारा धर्म तो यही सिखाता है, तुम बेशक इसे अधर्म कह सकते हो –

आहार, निद्रा, भय, मैथुनं च, सामान्यमेतत पशुभिर्नराणाम |

धर्मोहितेषामधिको विशेषो, धर्मेंण हीना: पशुभिः समाना: ||

तात्पर्य यह है की भूख कुत्ते को भी लगती है, नींद कुत्ते को भी आती है, डर कुत्ते को भी लगता है और वासना कुत्ते को भी सताती है…यहाँ स्त्री और पुरुष की बात तो की नहीं गयी|फिर आदमी और कुत्ते में क्या अंतर है? रक्त की भी तो एकता है|एक परखनली में आदमी और कुत्ते का रक्त मिला दो, फिर किसी से कहो की वह आदमी और कुत्ते का रक्त अलग अलग करके दिखाए, तो क्या कोई भी व्यक्ति ऐसा कर सकता है? स्पष्ट है मनुष्य का धर्म और कुत्ते का धर्म अलग अलग है और इसीलिए मनुष्य, मनुष्य है और कुत्ता, कुत्ता|ठीक इसी तरह नर और नारी की पृथक पृथक मर्यादा है|यदि कोई पुरुष अपने पुंसत्व को छोड़कर नारी जैसा आचरण करता है तो उसे सम्मान तो नहीं मिलता उल्टा स्त्रैण कह कर संबोधित किया जाता है|नारी अगर पुरुष के क्षेत्र में प्रवेश भी करती है तो उसे तो ऐसा संबोधन नहीं मिलता, क्योंकि सभ्य समाज उससे गरिमामय आचरण की अपेक्षा करता है और मेरा स्वयं का अनुभव है की जहाँ भी नारी ने पुरुष के क्षेत्र में प्रवेश किया है वहाँ शुद्धता आई है|बशर्ते नारी वेश में किसी राक्षसी का प्रवेश न हो गया हो|

नंगई की वकालत करने वाली नारियाँ जरा यह भी तो सोचे की वह एक नारी होने के साथ ही एक माँ, एक पत्नी, एक बहन, एक बेटी बहुत कुछ है|

हमाम में सभी नंगे है इसका यह मतलब तो नहीं की समाज में भी सब नंगे हैं|स्त्री और पुरुष जीवन रूपी गाडी के दो पहिये हैं और दोनों को ही अपनी अपनी मर्यादा में ही रहना चाहिए|अगर आप बलात्कार के लिए प्रेरित नहीं करेंगी तो कोई भी आपका बलात्कार नहीं कर सकता|क्या कभी किसी ने यह भी सुना है की किसी ने किसी साध्वी का बलात्कार किया हो?नहीं|हाँ, आगे भी ऐसा ही होगा की नहीं यह नहीं कहा जा सकता|जिस तरह से समाज में स्खलन आ रहा है..कोई भी कहीं भी पवित्र नहीं रह गया है|भगवा को तो स्पष्ट रूप से लांक्षित करने वाले सत्ता के केन्द्र में ही हैं और मध्य पूर्व तथा पश्चिमी देशों से इन्हें प्रचुर मात्रा में आर्थिक संसाधन भी उपलब्ध कराये जा रहे हैं|शक्तिस्वरूपा जगत जननी महाकालिका सबको सद्बुद्धि दे|

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