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तूने शब्दों की मर्यादा भंग किया है

Posted On: 15 Dec, 2010 Others में

मनोज कुमार सिँह 'मयंक'राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर कोई समझौता स्वीकार नही है। भारत माँ के विद्रोही को जीने का अधिकार नही है॥

atharvavedamanoj

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माना  है दुष्प्राप्य लक्ष्य पर नहीं असंभव|

परमपिता की इस धरती पर सब कुछ संभव|

मूर्ख है जो कहता अस्तित्व तुम्हारा कम है|

अखिल विश्व संस्कृति तरु के जड़ में ही हम है|

हम हिंदू हैं जड़ चेतन को अपना माना|

माया ममता भस्म पहन केसरिया बाना |

हमीं सनातन सत्य सदा उद्घाटित करते |

हमीं विश्व में नयी चेतना का स्वर भरते |

हम आलोक पुत्र, अमर संस्कृति संवाहक

और सनातन धारा के हम ही तो वाहक |

हम तम के मस्तक पर चढ ब्रम्हास्त्र चलाते |

असुरों की छाती पर भगवा ध्वज फहराते |

हम आसेतु हिमालय भारत माँ के बेटे |

विधि के लिखे लेख अटल भी हमने मेटे |

खेल खेल में केहरी के दांतों को तोड़ा |

कालीदह को भी विषहीन बना कर छोड़ा |

देवतुल्य थे जो उन आर्यों के ही वंशज |

सबसे पहले हम आयें वसुधा के अग्रज |

और ब्र्म्ह्वादी तू क्या उल्टा कहता है |

महासती माता को ही कुल्टा कहता है |

हाय सनातन संस्कृति को शतखंड किया है |

तूने शब्दों की मर्यादा भंग किया है |

हम दिति और अदिति के सुत वसुधा के मुख हैं |

हमको पाकर इस दुनिया में सुख ही सुख है |

हमने कब मक्का को शोणित से नहलाया ?

अथवा जेरूसलम में भगवा ध्वज फहराया ?

हमने हृदयों को जीता जब भूमि जीतते थे वे |

महाबुद्ध को अपनाया जब अस्थि सींचते थे वे |

महावीर जिन कहलाये भावों को जीता |

युद्धभूमि में श्रीहरी के मुख निकली गीता |

वाही अमरवाणी गुरुओं के मुख से गूँजी |
वेदवाणी सारंग ग्रन्थ साहिब में कूकी |

सुनो वही हिंदू है जो प्रणवाक्षर जपता |

एक उसी सतनाम में हरपल रमता रहता |

अरिहंताणं णमों भाव में रत रहता है |

महाबुद्ध के श्रीचरणों में नत रहता है |
जो गीता, गंगा, गायत्री का साधक है |
कण कण शंकर, भारत माँ का आराधक है |

अग्निपंथ का अनुयायी जो सार भस्म करता है |

महानिशा में महाचिता पर महारास रचता है |

जो किन्नर के स्वर में गाता, तांडव भी करता है |

और अधर्मी के तन से तत्काल प्राण हरता है  |

और धर्म भी कहाँ व्यक्तिगत, वही पद्यति अब भी |

हाँथ जोड़ पूजा करने की सतत संस्कृति अब भी |

क्या तुम गुदा द्वार से खाते, जब हम मुख से खाते ?

फिर बोलो इस दुनिया को तुम उल्टा क्यों बतलाते ?

कहाँ मुखौटा है हिंदू , किस मुख ने यह पहना है ?

यह मेरी भारत माता का सर्वोत्तम गहना है |

परमपिता ही पति जिसके, सिंदूर स्वर्ण हिंदू है |

भारत माता के मस्तक पर शोभित शुभ बिंदु है |
चलो मुखौटा ही अच्छा तुम सनातनी हम हिंदू |

तुममे हिंदू नहीं बिंदु पर हम तो शाश्वत सिंधु |

तुमने छोड़ा हम अपनाएं, हम छोड़े तुम गाओ |

आओ हम भी जूठा खाएं तुम भी जूठा खाओ |

मुझको जूठन भी मंगल पर तेरा तो नाजिस है |

समझ गया मैं भी असमझ अब, यह किसकी साजिश है |

किन्तु चक्र, दुष्चक्र, कुचक्रों की भी गति होती है |

भले कहें हम जड़ पत्थर को उनमे मति होती है |

इसीलिए तो अनगढ़ में भी प्रभु मूरत बन जाती |

तुम सूरा कहते ही रहते वह सूरत बन जाती |
अंतरग्रही प्राणियों ने जो ब्रम्ह वमन अपनाया |

वह सब कुछ भी तो मंगल है, धन्य देव की माया |

अभी शैशवावस्था में पर कलियुग तो कलियुग है |

पर असत्य के साथ विभव है, इसी बात का दुःख है |

करुणा, मैत्री और उपेक्षा, मुदिता मंगलकारी |

चलो बुद्ध की सहज मान्यता भी मैंने स्वीकारी |

वज्रपाणि श्रीमहाबुद्ध ने गीता ही तो गाया |
वेद लवेद बना कर छोड़ा, वेदों को अपनाया |

निर्ग्रंथों ने उसी मनीषा को स्वीकार किया है |

जिस पर दश के दश गुरुओं ने अपना प्राण दिया है |
भारत की यह चिंतन धारा अविछिन्न हिंदू है |

राजनीती के समरांगण में छिन्न भिन्न हिंदू है |

शून्यवाद, दशमलव दिया इस हेतु चलो गरियायें |

हमको गणित नहीं आता तो रोमन ही अपनाएं |

किन्तु जहाँ भी दीप जलेगा, ज्योतित तो हिंदू है |
यही नींव में और शिखर पर शोभित तो हिंदू है |

कोख लजाते धिक् धिक् भारत  तुझको लाज नहीं आती ?

माँ को माँ कहने से हटते नहीं  फट रही क्यों छाती ?

हिंदू ही सारा भारत, यह भारत ही हिंदू है  |

मानवता का शीर्ष मुकुट मणि, इंदु शिखर इंदु है |

और व्युत्पति हिंदू की, शुभ हनद पारसी भाषा |

नष्ट हो गया, शेष किन्तु हम, खोज रहा है नासा |

हमने सेतु बनाकर बाँधा, देशों को जोड़ा है |

तू तो उनका अनुगामी, केवल जिसने तोड़ा है |

राणा, शिवा, दधिची, इंद्र और रामकृष्ण से ज्ञानी |

बाली, बलि, महाबली, बालक अभिमन्यु का पानी –

आज नीलाम हुआ देखो, कितने मुख बने मुखौटे ?

पिता हमारे पूर्वज अब भी हिंदू ही कहलाते |

उदधि दुह्नेवालों ने जो रत्न चतुर्दश पाया |

जिसको वेदों, उपनिषदों ने मुक्त कंठ से गाया |
राग, रागिनी, ताल, छंद, स्वर, अक्षर सब हिंदू है |
हम पर निर्भर है जग सारा, कब निर्भर हिंदू है ?

हम उदात शिव भाव से जगती से जो कुछ लेते हैं |

यग्य याग अपना सहस्त्र गुण कर इसको देते हैं |

अंधाधुंध विदोहन करने में रत दुनिया सारी |

प्रलयंकर से खेल रही बस प्रलय की है तैयारी|

प्रकृति प्रदूषित कर डाला है सारा मनुपुत्रों ने |

यही सिखाया है क्या हमको ब्रम्ह, धर्मसूत्रों ने ?

नहीं नहीं विघटन की बेला पर अब पुनः विचारें |

विकृति त्याग माँ को अपनाएं संस्कृति को स्वीकारें |

किन्तु विकृति को संस्कृति कहना कहाँ न्यायसंगत है ?

यहाँ वहाँ हर जगह भयावह दहशत ही दहशत है |

दहशतगर्दी के विरुद्ध अब शस्त्र उठाना होगा |
स्वयं विष्णु बनकर असुरों पर चक्र चलाना होगा |

और हमें यह उर्जा भी तो हिंदू शब्द ही देगा |

विधि आधारित इस जगती से न्यायोचित हक लेगा |
बौद्ध, जैन, सिख, शैव, शाक्त और सनातनी सब हिंदू |

एक एक जन हिंदू ही हैं बोलो कितने गिन दूँ ?

जहाँ कहीं भी न्याय हेतु प्रतिरोध दिखाई पडता |

मानवता के हेतु कहीं भी रोष दिखाई पडता |
और विवेक की अग्नि में जल कर क्षार व्यर्थ परिभाषा |

विश्व प्रेम की राह  चले जन कहीं न तिरछी भाषा |

वहाँ वहाँ हिंदू स्थापित, हिंदू मानवता है |

इसे मिटा देने को तत्पर, आतुर दानवता है |

द्वैत मानता है जग तो अद्वैत मानते है हम |

तुमको भी तो कहाँ पृथक विद्वेष मानते हैं हम ?

हम तो बस उनके विरुद्ध जो द्वेष कर रहे हमसे |

ग्रन्थ ही जो उल्टा सिखलाता, व्यर्थ जल रहे हमसे |

और सुनो यह धर्म ही है जो एकसूत्र करता है |

कारण और निवारण कर्ता, भर्ता, संहर्ता है |

तुम भी इसे मानते हो पर स्वयं भ्रमित, भ्रम रचते |

मैं क्या तुम्हे फसाउंगा तुम खुद ही जाते फंसते |

ब्रम्ह निवारण है भ्रम का तुम भ्रम को देव बताते |

और समर्थन में जाने कितने यायावर आते |

जो बल को कमियां कहते, कमियों को बल  बतलाते|

धूप-छाँव का खेल परस्पर, इंद्रजाल दिखलाते |

हा हा यह माया का दर्शन, जृम्भणअस्त्र स्वागत है |

इससे ऊपर भी कुछ है जो आगत और विगत है |

उसी तत्व की शपथ मुखौटा नहीं वदन है हिंदू |

स्थापित ब्रम्हांड जहाँ वह दिव्य सदन है हिंदू |

इससे रौरव भी रोता हर नरक त्रस्त रहता है |

इसका शरणागत हो करके स्वर्ग स्वस्थ रहता है |

हिंदू भाव धरी विरंचि जब चौदह तल रचता है |

उसी भाव को धार विष्णु रज गुण लेकर रमता है |

और भाव में कमी हुई तो रूद्र कुपित हो जाते |

इंद्र श्रृंखला तोड़ गगन में संवर्तक छा  जाते |

मुझे करो मत विवश करूँ मैं आवाहन रुद्रों का |

नंदिकेश, शिव, वीरेश्वर का अनबंगी क्रुद्धों का |
कृत्या इसके पास भयावह दिवारात्रि रहती है |

इसका इंगित पाकर सोती इंगित पा जगती है |

यह अथर्व ब्रम्हास्त्र भूर्भुवः स्वः में प्रलय मचेगा |

डामर के हांथों में डमरू, डिंडिम नाद करेगा |

फिर मत कहना हिंदू सर्वदा आतंकी होते है |

मुझे सांत्वना दो लोगों अब देखो हम रोते हैं |
प्रतिरक्षा की तैयारी करना कुछ गलत नहीं है |

सुन लो जो सामर्थ्यवान है, प्रतिपल वही सही है |
इसीलिए श्री राम कालिका की पूजा करते हैं |
धनुष बाण लेकर हांथों में क्रीं काली कहते हैं |

वन्देमातरम इसका बोधक क्रीं काली फट स्वाहा |

किन्तु शक्तिमानों ने भी कब संस्कृति ग्रसना चाहा |
आज इसे ग्रसने की कोशिश करते इसके सुत हैं |
बुत से नफरत करने वाले मंदिर में कुछ बुत है |

इन्ही बुतों को खंडित करने दयानंद आये थे |

इन्हीं के लिए पुनर्जागरण में माँ ने जाए थे |

किन्तु किसी ने भी तो इसको नहीं मुखौटा बोला |
गंगा माँ की जलधारा में नहीं जहर था घोला |
आज हुआ जो पाप भयानक तुमसे अनजाने में |
शायद मैं भी इसका भागी हूँ किंचित माने में |
अगर तुम्हे कुछ कहना ही था मुझको बोला होता |
एक मंच क्या तेरी बलि मैं यह जग ही तज देता |
किन्तु सतत जीवन पद्यति को तूने गाली दी है |
कह डालो जो भी कहना है अब भी अगर कमी है |
चलो तुम्हारे ही स्वर में कुछ और कह रहा हूँ मैं |
कवितायें खुद ही बहती तुम कहो रच रहा हूँ मैं |
और तुम्हारे स्वर में हिंदू आतंकी, पापी है |
जब देखो उत्पात मचाने वाला अपराधी है |
भ्रष्ट कर दिया इसने पावन  पथ उस पैगम्बर का |
जो मरियम का पति जन्नत में, यीशु जिसके दर का |
इसके सारे संत सदा रमणी में ही रमते हैं |
झूठ बोलते हैं मर्यादा भंग किया करते हैं |
हर हिंदू के प्रति कुछ  गाली क्रतिधार्मिता होती |

हिंदू पथ पर चल जन्नत में नहीं मिलेगा मोती |
इसके ठेकेदार चुनिन्दा, कुछेक संगठन ही हैं |
और इसे प्रोत्साहित करने के भी अपराधी हैं |
सदा मार खाना और पिटना नियति हिंदुओं का हो |
कभी फैलना नहीं, सिमटना नियति हिंदुओं का हो |

किन्तु हमारे मत में धर्मविरोधी कब हिंदू है ?

प्रगतिशीलता, नवाचार प्रतिरोधी कब हिंदू है ?

नहीं कभी संकीर्ण रहा अब भी उदार यह ही है |

रूढ़ी और पाखण्ड विरोधी नवाचार यह ही है |

इस उदारता का प्रतिफल भी इसने खूब चुकाया |

अपनी सब सीमायें खोईं टूटा फूटा पाया |

चलो मिला जो भी अच्छा है, वह भी टूट रहा है |
देखो कितना क्षेत्र हमारा हमसे छूट रहा है |

इस पर रुकने और विचार करने का समय नहीं है |
अब तो किंचित भी विलाप करने का समय नहीं है |

पांचजन्य के हांथो को गांडीव उठाना होगा |

अगर हमें जिन्दा रहना है उन्हें सुलाना होगा |

नहीं तो फिर आने वाली पीढियां हमें कोसेंगी |

नहीं सोचने को कुछ होगा जब भी वे सोचेंगी |

इसीलिए पुरखों की तुमको शपथ सुनो, अब जागो |

चाहे कोई कुछ भी बोले डटे रहो, मत भागो |

तुमको बहकाने को पग पग पर दानव मायावी |
किसकी ममता में खोए, क्षणभंगुर सब दुनियावी |
सुनो मोक्ष पाने का पथ बस शरशय्या पर सोना |
अगर नहीं इसको मानोगे, व्यर्थ पड़ेगा खोना |
यह दुर्लभ मानव तन केवल कुरुक्षेत्र ही तो है |

और तुम्हारी कीर्ति रश्मियाँ यत्र तत्र ही तो है |

चलो, उठो, लपको सूरज को यह मीठा फल तेरा |

तुमको भडकाने का किंचित नहीं स्वार्थ कुछ मेरा |

बस मैं यही कहूँगा अपनी ताकत को पहचानो |

बजरंगी के ब्रम्हचर्य हिंदू की ताकत जानो |
कितने जामवंत आयेंगे बोलो तुम्हे उठाने ?

कुम्भकर्ण बन कर सोये हो भेजूं किसे जगाने ?

पहचानों इन शब्दों में ही वेदमंत्र है प्राणी |

संसृति रवि किरणों ने पहले सुनी वेद की वाणी |

उसे सरल करने को उपनिषदों ने जोर लगाया |

व्यर्थ हुआ जब इतिहासों ने छंद बद्ध कर गाया |
महाकाव्य भी जब थक बैठे तुम्हे जागते मानव |
गुरुवाणी में गीता गूंजी, वही रूद्र का तांडव |
नेति नेति का अंत नहीं है कोई अंतिम भू पर |

ऐसा कोई शब्द नहीं जो नहीं गया हो छू कर |

तुम हो राम कृष्ण के वंशज, रोम रोम में रमता |

तुम ही उसको तज देते हो, वह तुमको कब तजता ?

जो तेरे भीतर बाहर है, उसको नमन हमारा |
ब्रम्ह कहे या ईश्वर बोले, एक वेद की धारा |
इसी सत्य की चिर शाश्वत धारा हिंदू है |

हमको तो प्राणों से भी प्यारा हिंदू है |

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